-दीपक दुआ...
घूमना भला किसे अच्छा नहीं लगता। शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसे नई-नई जगहों पर जाना और वहां की यादों को सीने में,
आंखों में और कैमरों में संजो कर लाना न भाता हो। किसी जगह से लौट कर दूसरों को उसके बारे में बताने का आनंद भी कम नहीं होता। अपनी इस किताब ‘घुमक्कड़ी दिल से’ में अलका कौशिक इस आनंद को जी भर कर लूटती हैं।
घूमना भला किसे अच्छा नहीं लगता। शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसे नई-नई जगहों पर जाना और वहां की यादों को सीने में,
आंखों में और कैमरों में संजो कर लाना न भाता हो। किसी जगह से लौट कर दूसरों को उसके बारे में बताने का आनंद भी कम नहीं होता। अपनी इस किताब ‘घुमक्कड़ी दिल से’ में अलका कौशिक इस आनंद को जी भर कर लूटती हैं।
अलका कौशिक-देश की ख्यात घुमक्कड़ और ट्रैवल-लेखिका, जिन्होंने घूमने और लिखने के अपने शौक पूरे करने के लिए अच्छी-खासी सरकारी नौकरी छोड़ दी ताकि उन कामों को कर सकें जो उनके दिल के करीब हैं। अलका की इस किताब की गलियों से होकर गुज़रें तो लगता है कि इतनी सारी और इस किस्म की घुमक्कड़ी सचमुच दिल से ही की जा सकती है, दिमाग से नहीं। दिमाग तो किंतु-परंतु में उलझाए रखने वाली मशीन है, यह तो दिल ही है जो इंसान को सारे बंधनों से परे आड़ी-टेढ़ी राहों पर ले जाने का साहस कर लेता है। और वहां से लौटने के बाद फिर ऐसी ही कहानियां सामने आती हैं जो अलका हमें इस किताब में सुनाती हैं।