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Friday, 4 August 2017

शंकर जय किशन-हंसी की तिगुनी डोज


-दीपक दुआ...

शंकर, जय और किशन, तीन भाई, जुड़वा नहीं तुड़वा। बाढ़ आई और शंकर जय बह गए। बाकी बचा किशन यह बात अपनी विधवा और अपाहिज मां को कैसे बताए? लेकिन रियल एस्टेट एजेंट का काम करने वाला किशन पक्का जुगाड़ूकिस्म का है। सो उसने यह जुगाड़ निकाला और अपने डॉक्टर व पुलिस इंस्पैक्टर भाइयों की यूनीफॉर्म पहन कर वह कभी शंकर तो कभी जय बन बैठा। लेकिन दिक्कत तब आई जब उसकी मां ने इन तीनों के लिए ट्विंक्ल, सिंपल और डिंपल को अपनी बहू बनाने का फैसला किया। अब बेचारा अकेला किशन तीन-तीन किरदार एक साथ निभा रहा है। इस दुविधा में उसकी मदद करता है उसका साईंटिस्ट दोस्त बाबर।

8 अगस्त से सब टी.वी. पर हर सोमवार से शुक्रवार रात 10 बजे रहे इस शो शंकर जय किशन-3 इन 1’ में केतन सिंह, फलक नाज, कीर्तिदा मिस्त्री, चित्राशी रावत, आसावरी जोशी, हेमंत पांडेय जैसे कलाकार हैं। सब टी.वी. के नए हैड नीरज व्यास कहते हैं, ‘भारतीय टेलीविजन पर हम पहली बार ऐसा ट्रिपल भूमिका वाला शो लेकर रहे हैं। यह शो कॉमेडी, शरारतों और ड्रामा का सही मिश्रण है। जब नायक जूझता हुआ और तीन किरदारों को संभालता हुआ नजर आता है, उससे उत्पन्न होने वाली मजाकिया स्थितियां देखने लायक हैं। यह कहानी बिल्कुल नई है और लोगों को बांधने वाली है। मुझे उम्मीद है कि दर्शकों को भी यह पसंद आएगी।
 (दीपक दुआ फिल्म समीक्षक पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने सिनेयात्राब्लॉग के अलावा समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

Friday, 23 September 2016

रिव्यू-वाह ताज-उम्दा कहानी पर बनी औसत फिल्म

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
महाराष्ट्र का एक किसान अपने परिवार समेत बोरिया-बिस्तर लेक आगरा जा पहुंचे और दावा करे कि ताजमहल उसके पुरखों की जमीन पर बना है। मामला कोर्ट में जा और वह किसान सारे सबूत भी ले आए तो सोचिए क्या हो?

कहानी दिलचस्प है और धीरे-धीरे जब इसकी परतें खुलती हैं तो यह दिलचस्पी लगातार बढ़ती भी जाती है। फिल्म इस उत्सुकता को बनाए रखने में कामयाब रही है कि आखिर यह क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है और इसके पीछे का असल मकसद क्या है।

मगर कहानी के दिलचस्प होने से बात बनती होती तो अपने यहां की हर दूसरी फिल्म दर्शकों के दिलों पर राज कर के कामयाब हो रही होती। दिमाग में आई एक छोटी-सी कहानी को एक कसी हुई स्क्रिप्ट में तब्दील करते हुए कागज पर उतारना जितना मुश्किल होता है उतना ही मुश्किल उस स्क्रिप्ट को पर्दे पर जीवंत रूप देना भी होता है और यह फिल्म इन दोनों ही कामों को काफी हल्के तौर पर लेती नजर आती है। किसानों की जिस समस्या और सिस्टम की जिस खामी की बात अंत में सामने आती है, वह तो असर छोड़ पाती है और ही उसकी टीस महसूस होती है तो जाहिर है इसके लिए इसके लेखक और निर्देशक दोनों कसूरवार हैं जो अपने काम में वह परिपक्वता नहीं ला पाए, जिसकी इस कहानी को दरकार थी। जब आपका विज़न स्पष्ट नहीं होता है तो उसका खामियाजा फिल्म को भुगतना पड़ता है। यहां भी यही हुआ है जिसके चलते एक अच्छी कहानी अपने आखिरी पड़ाव तक आते-आते असर छोड़ने लगती है।

मराठी किसान के रोल में श्रेयस तलपड़े ने सचमुच जोरदार काम किया है। उनकी भंगिमाएं विश्वसनीय लगती हैं। मंजरी फड़नीस ने भी असरदार अभिनय किया है। मंत्री बने हेमंत पांडेय ने कहीं-कहीं ओवर होने के बावजूद जिस तरह से ब्रज भाषा को पकड़ा, वह सराहनीय है। संगीत साधारण है। अधपकी पटकथा, अकुशल निर्देशन और संपादन की गुंजाइश के अलावा फिल्म के कम पैसे में बने होने की चुगली भी पर्दे पर साफ दिखाई देती है। फिल्म पूरी होने के बाद पैन एंटरटेनमैंट ने इसे रिलीज करने में जो उत्सुकता दिखाई वह सहारा अगर इस फिल्म को शुरू से मिला होता तो मुमकिन है आज इसे देख कर मुंह से सचमुच वाह ताजनिकल रहा होता।
अपनी रेटिंग-दो स्टार
(
दीपक दुआ फिल्म समीक्षक पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम(www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक फिल्म क्रिटिक्स गिल्डके सदस्य हैं और रेडियो टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)