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Tuesday, 8 August 2017

पुस्तक समीक्षा-बातें भोजपुरी सिनेमा की


-दीपक दुआ...
भोजपुरी सिनेमा यानी फूहड़ सिनेमा, द्विअर्थी संवादों वाला सिनेमा, मसालेदार सिनेमा, परिवार के साथ बैठ कर देखा जाने वाला सिनेमा...! जी हां, पिछले कुछ समय में भोजपुरी फिल्मों की यही छवि हमारे सामने रही है। लेकिन सच यह है कि कोई वक्त था जब भोजपुरी सिनेमा बेहद समृद्ध और संपन्न था। बहुत कम लोग यह बात जानते होंगे कि भोजपुरी सिनेमा की शुरूआत का श्रेय भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के उस आह्वान को जाता है जो उन्होंने मुंबई फिल्मोद्योग के सामने किया था और जिससे प्रेरित होकर हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता नजीर हुसैन ने पहली भोजपुरी फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ैइबोबनाने जैसा भगीरथ काम अंजाम दिया था।

रविराज पटेल
बीते छह दशकों में भोजपुरी सिनेमा में किस किस्म के बदलाव आए, किन संकरे, पथरीले और अंधेरे रास्तों से होकर यह सिनेमा गुजरा, किस तरह से इसकी तरक्की हुई और फिर कैसे यह पतन की राह पर चल पड़ा, कैसे बाजार ने इस सिनेमा में अपनी घुसपैठ की और भोजपुरी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से इस पर कैसा असर पड़ा। ऐसे ढेरों विषयों को अपने में समेटे भोजपुरी फिल्मों का सफरनामानाम की यह किताब सिर्फ पाठकों की जिज्ञासा को शांत करती है बल्कि यह उम्मीद भी जगाती है कि यदि भोजपुरी सिनेमा से जुड़े लोग जरा-सा संभल जाएं तो एक बार फिर से इस सिनेमा के अच्छे दिन सकते हैं। दिल्ली के प्रभात प्रकाशन से आई इस किताब में लेखक-पत्रकार रविराज पटेल का इसे लिखने के लिए किया गया शोध और संघर्ष साफ झलकता है और यही वजह है कि भोजपुरी सिनेमा के अब तक के सफर मौजूदा दशा पर यह एक उल्लेखनीय दस्तावेज बन कर सामने आती है।
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने सिनेयात्राब्लॉग के अलावा समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)