‘अगर बच्चों के उसूलों पर चले,
तो दुनिया कब की जन्नत हो गई होती...।
इस फिल्म का यह संवाद फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रह जाता है। दिल के किसी कोने में यह अहसास भी जगता है कि क्यों नहीं यह दुनिया बच्चों के हिसाब से चलती? क्यों नहीं सब मासूम हो जाते?
क्यों नहीं हम बीते ज़ख्मों को भुला कर आगे बढ़ जाते?