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Monday, 30 August 2021

ओल्ड रिव्यू-मनोरंजन और संदेश देती ‘जलपरी’

-दीपक दुआ...  (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
अपनी पहली और पिछली फिल्मआई एम कलामसे नीला माधव पांडा ने खुद को एक ऐसे निर्देशक के तौर पर खड़ा कर लिया था जो बच्चों से जुड़े एक गंभीर संदेश को भी सहज और सरल जुबान में मनोरंजन के रैपर में लपेट कर पेश कर सकता है और वह भी बिना किसी फिल्मी मसाले का लेप लगाए हुए। अब अपनी इस दूसरी फिल्म में पांडा ने एक बार फिर यही जोखिम उठाया है। जोखिम इसलिए क्योंकि बच्चों का सिनेमा हो या फिर संदेश देने वाला सिनेमा, अपने यहां का क्रूर बॉक्स-ऑफिस इसे आसानी से स्वीकार नहीं करता।आई एम कलामने भी टिकट-खिड़की से उतना माल नहीं बटोरा था जितना दूसरे ज़रियों से इक्ट्ठा किया था और अबजलपरीके साथ भी यही होने वाला है।

Thursday, 20 April 2017

वह सिर्फ एक लहर नहीं है...


-दीपक दुआ...

23 अगस्त, 2012 आई एम कलामबना चुके निर्देशक नीला माधव पांडा की अगली फिल्म जलपरीका प्रैस-शो था। फिल्म देखी तो इसमें शीर्षक भूमिका निभाने वाली बाल-अदाकारा के काम से मैं खासा प्रभावित हुआ। इंटरवल में इस अदाकारा यानी लहर खान से मुलाकात भी हो गई। उनके पिता शकील और मां प्रियंका से भी परिचय हुआ। बाद में हमारे बीच  लगातार संपर्क बना रहा। कुछ अर्सा पहले लहर पार्च्ड में तनिष्ठा चटर्जी, राधिका आप्टे और सुरवीन चावला के साथ तनिष्ठा की बहू के किरदार में नजर आईं। अब तक लहर यह इरादा कर चुकी थीं कि उन्हें फिल्मों में ही अपना भविष्य बनाना है। कुछ अर्सा पहले ये लोग दिल्ली छोड़ कर मुंबई शिफ्ट हो गए लेकिन हमारे बीच लगातार बातचीत होती रहती है। लहर से मैंने जब भी बात की मैंने उन्हें हमेशा बहुत संजीदा, विनम्र और फोकस्ड पाया।

हाल ही में मेरा मुंबई जाना हुआ तो पता चलते ही शकील और प्रियंका बार-बार आग्रह करने लगे कि उनसे जरूर मिलूं। इनके छोटे मगर खूबसूरत घर पर हमारी मुलाकात हुई। प्रियंका पार्च्ड में लहर की मां के छोटे-से रोल में दिख चुकी हैं और बेहद स्वादिष्ट खाना बनाती हैं। चंद मिनटों की इस मुलाकात में इन सबने मुझे भरपूर प्यार और सत्कार दिया। लहर अभी बारहवीं में पढ़ रही हैं और हाल ही में एक बहुत बड़े बैनर की एक बहुत बड़ी फिल्म को ठुकरा चुकी हैं। पूछने पर बताती हैं कि फिलहाल मेरा ध्यान स्कूल की पढ़ाई पूरी करने पर है, एक्टिंग के लिए तो सारी उम्र पड़ी है। पार्च्ड के लिए फ्रांस से अवार्ड ला चुकीं लहर मुंबई की रंगीनियों और फिल्मी दुनिया की चकाचैंध में भी जिस कदर तटस्थ हैं, उसे देख हैरानी होती है। फिलहाल लहर अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ-साथ खुद को मांजने-निखारने पर ध्यान दे रही हैं। शकील और प्रियंका को यकीन है कि एक दिन वह जरूर अपना और उनका नाम रोशन करेंगी। उन्हें तो उम्मीद है, अपने को यकीन है कि वह सिर्फ एक लहर भर नहीं हैं जो सैलाब में गुम हो जाएं, एक दिन सचमुच वह अपना अलग और पुख्ता मकाम बनाएंगी।

Wednesday, 21 September 2016

रिव्यू-पार्च्ड-झुलसती जिंदगियों पर पड़ती बौछारें

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
गुजरात का कच्छ इलाका। गांव की पंचायत फैसला सुनाती है कि अपने पति के घर से लौट आई एक नवविवाहिता को उसी घर में वापस जाना होगा। वह लड़की लौटना नहीं चाहती मगर कोई उसकी नहीं सुनता। अपनी मां को वह बताती है कि उसका ससुर उसके साथ जबर्दस्ती करता है लेकिन बेबस मां सब सुन कर भी चुप रह जाती है।

फिल्म की इस शुरूआती घटना का बाकी की फिल्म से कोई नाता नहीं है। मगर डायरेक्टर लीना यादव साफ कर देती हैं कि वह आगे क्या दिखाने जा रही हैं। एक ऐसा समाज जहां औरतें आज भी पुरुषों की निरंकुश सत्ता में लगभग गुलामों की तरह जीने को मजबूर हैं।

कहानी के केंद्र में मुख्यतः चार औरतें हैं। एक जवान विधवा रानी (तनिष्ठा चटर्जी) जिसका विवाहित जीवन कष्टों में बीता और अब वह अपने 17 साले के बेटे गुलाब के लिए बहू लाकर सोच रही है कि उसके कष्ट कुछ कम होंगे। इस औरत की एक सहेली लाजो (राधिका आप्टे) जो मां बन पाने का दाग लिए रोजाना अपने शराबी पति से पिटती है। मेले-नौटंकी में नाचने और जिस्म बेचने वाली इन दोनों की सहेली बिजली (सुरवीन चावला) गुलाब की 15 साल की बीवी जानकी (लहर खान) जो पढ़ना चाहती है और शादी से बचने के लिए अपने बाल काट लेती है।

इन चारों की कहानियों के बरअक्स फिल्म असल में समाज की उस सोच की तरफ इशारा करती है जिसके मुताबिक औरतों को अपनी मर्जी से कोई फैसले लेने का कोई हक नहीं है और मर्दों से मार खाना उनकी नियति है। लेकिन ये औरतें सपने देखने से बाज नहीं आतीं। पैसा, प्यार, पढ़ाई और सैक्स की बातें करती हैं। पुरुषों की सत्ता का विरोध करती हैं। इन्हें एतराज है कि सारी गालियां सिर्फ औरतों के बारे में ही क्यों हैं? आखिर एक दिन ये अपने पिंजरे छोड़ कर उड़ जाती हैं।

यह फिल्म हालांकि कड़वे सच दिखाती है। इन चारों की झुलसी हुई जिंदगियों में झांकती है लेकिन इसका अंत उम्मीदें लेकर आता है। तपते रेगिस्तान में पड़ने वाली बौछारों की तरह यह बताता है कि बंधन तोड़े बिना ऊंची उड़ान मुमकिन नहीं। लेकिन क्या यही हल है? ये औरतें समाज के सामने सीना तान कर नहीं खड़ी हो पातीं, ही ये मौजूदा सोच को बदलने की कोई कोशिश करती हैं। इसकी बजाय ये पलायन कर जाती हैं एक बेहतर कल की तलाश में। पर क्या गारंटी है कि जहां ये जाएंगी, वहां का समाज यहां से बेहतर ही होगा?

फिल्म हालांकि पूरे समय बांधे रखती है और इसका अंत सुहाता भी है मगर क्लाइमैक्स में यह लेखक और निर्देशक की कल्पनाशक्ति का अभाव भी दिखाता है। फिर भी लीना अपनी पिछली दोनों फिल्मों शब्दऔर तीन पत्तीसे इस बार आगे ही निकली हैं।

तनिष्ठा, राधिका और सुरवीन अपने-अपने किरदारों में फिट रही हैं। राधिका के बोल्ड सीन सचमुच उनके दुस्साहस का प्रतीक हैं। लहर ने भी अपने किरदार को बखूबी पकड़ा। हालांकि उनके किरदार को थोड़ा और विस्तार दिया जाना चाहिए था।

इस किस्म की फिल्मों पर फेस्टिवल सिनेमाका ठप्पा लगाया जाता है। लेकिन यह फिल्म बोर नहीं करती है। कुछ अच्छा देखना चाहें, दमदार देखना चाहें तो पार्च्डआप ही के लिए है।
अपनी रेटिंग-साढ़े तीन स्टार
(
दीपक दुआ फिल्म समीक्षक पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम(www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक फिल्म क्रिटिक्स गिल्डके सदस्य हैं और रेडियो टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)