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Friday, 28 October 2016

रिव्यू-चुन्नू पढ़ता ‘शिवाय’ कॉमिक्स मुन्नी पढ़ती ‘शिवाय’ कॉमिक्स

-दीपक दुआ...  (Featured in IMDb Critics Reviews)
चलिए कॉमिक्स पढ़ते हैं।
वैसे भी कॉमिक्स की दुनिया के बाहर सुपर हीरो कम ही मिलते हैं। (यह इसी फिल्म का एक संवाद है)

एक अपना सुपर हीरो है जो पहाड़ चढ़ने वालों का मददगार और गाइड है। वह अजीबोगरीब स्टंट करता है, बिना बैकअप के पहाड़ों पर चढ़ता-उतरता-कूदता है। एक विदेशी लड़की को ट्रैकिंग करवाते, बर्फ के तूफान से बचाते वह उसके होने वाले बच्चे का बाप बन बैठता है। आठ साल बाद यह वह और उसकी बच्ची इस लड़की को ढूंढने बुल्गारिया जाते हैं जहां बच्चों और उनके शरीर के अंगों का धंधा करने  वाले लोग बच्ची को किडनैप कर लेते हैं और अपना सुपरहीरो उसकी तलाश में जमीन-आसमान-पाताल, सब एक देता है।
(जाॅन अब्राहम की रॉकी हैंडसमयाद रही हो तो हमारी बला से)

यह रिश्तों की कहानी है। अनाथ शिवाय को लगता है कि उसकी अपनी तो कोई फैमिली हो नहीं सकती तो वह अपने होने वाले बच्चे की मां से गुजारिश करता है कि वह उसे बच्चा दे दे और जहां जाना है, चली जाए क्योंकि वह खुद हिमालय के अलावा कहीं जी नहीं सकता।क्यों भई? इतना हैंडसम तो है हीरो, हीरोइन तो मिल ही जाएगी। फिर बच्चे की जिद क्यों? चलो, शादी कर के बुल्गारिया जाने में तुम्हें हर्ज ही क्या है? और तुम्हारी हीरोइन ने ही वहां जाकर कौन से तीर मारने हैं और मार लिए, इसे भी बस शब्दों में बताया गया, दिखाया नहीं गया? खैर, फिल्म इन सवालों के जवाब देना जरूरी नहीं समझती क्योंकि यह सब तो कहानी की भूमिका बांधने के लिए किया गया। इत्ती लंबी भूमिका...?

असल कहानी तो शिवाय और उसकी बेटी के रिश्ते की है। आठ साल से वह इस गूंगी बच्ची को प्यार से पाल रहा है। (भई, अब हर विदेशी अदाकारा को तो हिन्दी नहीं सिखाई जा सकती ...!) लेकिन इस रिश्ते की गर्माहट आपको महसूस ही नहीं होती। बेटी के बाप से बिछड़ने पर आपके मन में जो दर्द होना चाहिए, वह नहीं होता। उसके बाप से दूर रहने पर आपके अंदर जो टीस उठनी चाहिए, वह भी नहीं उठती और बाप-बेटी के मिलने पर जो खुशी आपके मन और जो नमी आपकी आंखों में आनी चाहिए, वह भी नहीं आती तो बताइए, यह कैसा रिश्ता है जो दिखता तो है, छूता नहीं? और फिल्म खत्म होने के बाद, बच्ची के मिल जाने के बाद भी 15 मिनट की समापन-भूमिका कौन बांधता है यार...?

देखिए, सीधी और दो टूक बात यह कि अगर आप रिश्ते की, आपसी प्यार-मोहब्बत-विश्वास की बात करते हो तो ऐसे करो कि आप को पर्दे पर देख कर हमें आप पर विश्वास हो, आप से मोहब्बत होने लगे, आप में हमें अपना अक्स दिखाई दे। और अगर आप हमें एक्शन और थ्रिल दिखाना चाहते हैं तो प्लीज़, लॉजिक से, तर्कों से खिलवाड़ मत कीजिएगा। अगर आप को लगता है कि आप बुल्गारिया की सड़कों पर गदर मचाएंगे, वहां के खूंखार गुंडों कों, तमाम पुलिस वालों को जम कर पीटेंगे, पूरा पुलिस महकमा आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा और आप जब चाहे, पुलिस वालों के गढ़ में घुस कर बड़े ही बचकाने ढंग से असली विलेन को पहचान कर, बड़े ही दबंग स्टाइल में बाहर भी जाएंगे, अनजान धरती पर अकेले आजादी से घूमेंगे, जो चाहे-वह करेंगे और हम दर्शकों के दिमाग को खोखला समझ कर उसमें अपनी मर्जी से कुछ भी भरते चले जाएंगे और हम पॉपकॉर्न खाते हुए उसे एन्जॉय करेंगे, तो प्लीज़, रहम कीजिए। पब्लिक के दिमाग को डस्टबिन समझने वाले लेखकों-फिल्मकारों को उनकी सही जगह दिखाना जनता को खूब आता है, उन्हें हल्के में मत लीजिए।

अजय देवगन पूरी फिल्म में छाए हुए हैं। चूंकि वह शिवाय हैं सो चिलम पीते हैं। दूसरों की खातिर जहर का प्याला क्यों नहीं, यह सवाल मत पूछिए। सवाल तो खैर, आप कोई मत पूछिएगा। वैसे भी जब निर्माता-निर्देशक और हीरो एक ही शख्स हो तो सवाल पूछने की हिम्मत तो फिल्म की यूनिट में भी किसी की नहीं रही होगी कि सर जी, यह क्या कर रहे हो? कम बोलने और एक्शन करने में अजय की महारथ का यहां बखूबी इस्तेमाल हुआ है। मगर काश, कि उन्होंने कहानी के बाकी किरदारों की अहमियत को समझ कर उन्हें भी विकसित होने दिया होता। गिरीश कर्नाड और सौरभ शुक्ला जैसे अभिनेताओं को पंगु बना कर छोड़ती है यह कहानी। वीर दास को तो गायब ही कर डालती है यह। सायशा सहगल को हिन्दी में अपना कैरियर शुरू करने के लिए अजय देवगन फिल्म्स का बड़ा बैनर दिखा होगा, अपना मामूली किरदार नहीं। हालांकि वह अपने काम को सलीके से करती दिखाई दी हैं। और वह बच्ची जिसकी तारीफ में अजय ने इधर जमीन-आसमान एक कर रखा था, खूबसूरत है, प्यारी है मगर एक्टिंग उसकी साधारण ही है।

फिल्म फालतू, बेमतलब और बेमकसद के दृश्यों से भरी पड़ी है। चूंकि अजय खुद ही सब कुछ थे तो एडिटर की भी मजाल नहीं हुई होगी उनके बनाए पर कैंची चलाने की। कम से कम आधे घंटे की छंटाई और होनी चाहिए थी इसकी। खासतौर से गानों की। वैसे भी अगर आप गुनगुनाने या थिरकाने लायक म्यूजिक नहीं दे पा रहे हैं तो फिर जबर्दस्ती का माल क्यों परोस रहे हैं? और ये क्या बोल हुए-जा जा कैलाश-जा कर विनाश’...? अरे भोले, कैलाश पर तो शिव को सुकून मिलता है, वहां विनाश...? और शिवाय की बेटी का नाम गौरा...? अगर पुराणों में से कुछ उठा ही रहे हो तो कायदे से उठाओ। चलिए छोड़िए, जब आपने माइथालॉजी की, कहानी की, स्क्रिप्ट की लंका लगा ही दी है तो अब आपको क्या समझाना।

तो हुजूर, बर्फीले पहाड़ों के दिल को चीर देने की हद तक खूबसूरत दृश्यों के इस फिल्म को देखिए। अजय देवगन के सिंहमऔर गदरनुमा एक्शन के लिए इस फिल्म को देखिए। दीवाली की छुट्टियां हैं तो परिवार के साथ इस फिल्म को देखिए। आपके चुन्नू-मुन्नी तो इसे एन्जॉय कर ही लेंगे। पर अगर आपने इसे देखते समय इत्तू-सा भी दिमाग लगाया तो फिर कहना कि आपने समीक्षा ध्यान से नहीं पढ़ी थी।
अपनी रेटिंग-ढाई स्टार