ओ.टी.टी. ने सचमुच सिनेमा का बहुत भला किया है। खासतौर से उन कहानीकारो, फिल्मकारों का जिनके रचे को सिनेमाई गणित के जोड़-तोड़ में थिएटरों में जगह नहीं मिल पाती थी। उन दर्शकों का भी जो कुछ अलग-सा देखना चाहते थे लेकिन ‘कहां और कैसे देखें’ की ऊहापोह में उलझ कर रह जाते थे। यह फिल्म ऐसी ही है जिसे बनाने वालों और देखने वालों को ओ.टी.टी. का शुक्रगुजार हो लेना चाहिए।
