जिस फिल्म के आने से पहले ही सोशल मीडिया के तथाकथित, स्वयंभू, कुकुरमुत्ते ‘फिल्म समीक्षकों’ ने उसकी चीर-फाड़ के लिए अपने नाखून और दांत पैने कर लिए हों और जिसके आते ही इन लोगों में इस फिल्म की धज्जियां उड़ाने की होड़ लग गई हो और जिस फिल्म के आने के बाद यह भी पता चला गया हो कि उसके अंदर परोसा गया माल एक सुगंधित कचरे से ज़्यादा कुछ नहीं है,
उस फिल्म को देखना और फिर उसका रिव्यू करना अपने-आप में एक बेहद जोखिम भरा काम है। लेकिन इससे ज़्यादा बड़े जोखिम फिल्म पत्रकारिता के अपने लंबे सफर में उठाए हैं तो भला इससे क्या डरना। तो चलिए, शुरू करते हैं ज़ी-5 पर रिलीज़ हुई ‘राधे’ नाम की इस मोस्ट अनवांटेड फिल्म का रिव्यू जिसे कोई नहीं देखना चाहता था लेकिन जिसे सबने देखा ताकि उसकी खिल्ली उड़ाई जा सके।
