जिस फिल्म के आने से पहले ही सोशल मीडिया के तथाकथित, स्वयंभू, कुकुरमुत्ते ‘फिल्म समीक्षकों’ ने उसकी चीर-फाड़ के लिए अपने नाखून और दांत पैने कर लिए हों और जिसके आते ही इन लोगों में इस फिल्म की धज्जियां उड़ाने की होड़ लग गई हो और जिस फिल्म के आने के बाद यह भी पता चला गया हो कि उसके अंदर परोसा गया माल एक सुगंधित कचरे से ज़्यादा कुछ नहीं है,
उस फिल्म को देखना और फिर उसका रिव्यू करना अपने-आप में एक बेहद जोखिम भरा काम है। लेकिन इससे ज़्यादा बड़े जोखिम फिल्म पत्रकारिता के अपने लंबे सफर में उठाए हैं तो भला इससे क्या डरना। तो चलिए, शुरू करते हैं ज़ी-5 पर रिलीज़ हुई ‘राधे’ नाम की इस मोस्ट अनवांटेड फिल्म का रिव्यू जिसे कोई नहीं देखना चाहता था लेकिन जिसे सबने देखा ताकि उसकी खिल्ली उड़ाई जा सके।
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Saturday, 15 May 2021
Thursday, 30 July 2020
ओल्ड रिव्यू-कसी हुई, सधी हुई ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई’
मिलन लूथरिया को सिनेमाई शिल्प की समझ है यह वह अपनी पहली फिल्म ‘कच्चे धागे’ में ही सिद्ध कर चुके हैं। अब उनकी यह फिल्म उन्हें उम्दा निर्देशकों की कतार में एक नहीं,
कई कदम आगे ले जाती है। मिलन और निर्मात्री एकता कपूर ने भले ही कुछ भी कहा हो मगर यह फिल्म साफ-साफ मुंबई के मशहूर स्मगलर हाजी मस्तान और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के जीवन से प्रेरित है।Saturday, 15 February 2020
रिव्यू-उलझ कर रह गया है ‘लव आज कल’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
इस फिल्म के लेखक-निर्देशक इम्तियाज़ अली खुद यह बात मान चुके हैं कि इसे बनाने का आइडिया उन्हें दोस्तों की एक बैठक में आया कि 2009 में आई उनकी फिल्म ‘लव आज कल’ के किरदार अगर आज के समय में होते तो कैसे बर्ताव करते। आगे की कहानी यह है कि दोस्तों की उस बैठक में एक तो होंगे निर्माता दिनेश विजन जिन्होंने पिछली वाली ‘लव आज कल’ से खूब नोट छापे थे सो इस फिल्म पर पैसा लगाने से नहीं हिचके होंगे। दूसरे होंगे सैफ अली खान जिन्होंने कहा होगा-यार, मेरी बेटी को ले ले इस बार। वो बेचारी भी कोई कायदे की फिल्म कर लेगी जिसे देख कर लोग कहेंगे-वाओ...! पर क्या ऐसा हो पाया?
Saturday, 6 July 2019
ओल्ड रिव्यू-सलमान का धोबी पछाड़-‘सुल्तान’
अगर आप सलमान खान के फैन हैं तो इस सवाल का सिर्फ एक ही जवाब हो सकता है-सलमान खान।
तो बस खुश हो जाइए, यह फिल्म आपके लिए ही है।
अब रही बात उनकी जो किसी फिल्म को उस फिल्म के लिए देखते हैं और आंख मूंद कर यूं ही किसी के फैन नहीं हो जाते। तो सुनिए, यह खेल पर आधारित फिल्म नहीं है। हां इसमें कुश्ती है, फिल्म के नायक और नायिका पहलवान हैं और कुश्ती करना, जीतना, मैडल लाना ही उनका सपना है। बावजूद इसके इस फिल्म को एक स्पोर्ट्स-फिल्म नहीं कह सकते। मुख्यतः यह एक लव-स्टोरी है जिसमें छिछोरा नायक पहलवान नायिका को प्रभावित करने के फेर में पहलवानी करने लगता है और फिर उसके हाथों बेइज्जत होकर इसी काम को सीरियसली ले लेता है। फिर कुछ ऐसा होता है कि वह पहलवानी छोड़ देता है। इसके बाद वह लौटता है तो किसी और को नहीं बल्कि अपने-आप को जीतने के लिए।
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