-दीपक दुआ...
कॉलेज लाइफ की कहानियां, होस्टल लाइफ की कहानियां, दिल्ली शहर की कहानियां, आई.ए.एस. बनने वालों की कहानियां...। हाल के बरसों में नई वाली हिन्दी में इन विषयों पर इतना कुछ आ चुका है कि अब ऐसे किसी विषय पर आए उपन्यास को छूने का भी मन न करे। हिन्द युग्म से आए इस उपन्यास को भी पढ़ना शुरू किया तो लगा कि सत्य व्यास के ‘बनारस टॉकीज़’ और नीलोत्पल मृणाल के ‘डार्क हॉर्स’ को पढ़ने के बाद इसमें नया कुछ नहीं मिलने वाला। लेकिन धीरे-धीरे यह कहानी अपनी एक अलग राह तलाशने लगती है और बहुत जल्द उस राह पर सरपट भी हो जाती है।