किसी फिल्म का नाम उसके किसी किरदार के नाम पर हो तो अमूमन दो बातें होती हैं। पहली यह कि या तो उसे बनाने वालों के ज़ेहन में ही यह बात साफ नहीं है कि वे क्या कहना चाहते हैं। दूसरी यह कि उन्हें तो पता है लेकिन वे चाहते हैं कि दर्शक खुद समझे कि असल में वे क्या कहना चाहते हैं। यहां पर दूसरी वाली बात है। नितिन कक्कड़ अपनी अब तक की फिल्मों (फिल्मीस्तान, मित्रों, नोटबुक,
जवानी जानेमन) से इतना तो बता ही चुके हैं कि कहानी में से मानवीय संवेदनाओं को बारीकी से पकड़ कर उन्हें पर्दे पर उकेरने का गुर उन्हें बखूबी आता है। उनकी यह फिल्म बेशक उनका अब तक का सबसे मैच्योर काम है।Saturday, 29 August 2020
रिव्यू-शो मस्ट गो ऑन सिखाती ‘राम सिंह चार्ली’
किसी फिल्म का नाम उसके किसी किरदार के नाम पर हो तो अमूमन दो बातें होती हैं। पहली यह कि या तो उसे बनाने वालों के ज़ेहन में ही यह बात साफ नहीं है कि वे क्या कहना चाहते हैं। दूसरी यह कि उन्हें तो पता है लेकिन वे चाहते हैं कि दर्शक खुद समझे कि असल में वे क्या कहना चाहते हैं। यहां पर दूसरी वाली बात है। नितिन कक्कड़ अपनी अब तक की फिल्मों (फिल्मीस्तान, मित्रों, नोटबुक,
जवानी जानेमन) से इतना तो बता ही चुके हैं कि कहानी में से मानवीय संवेदनाओं को बारीकी से पकड़ कर उन्हें पर्दे पर उकेरने का गुर उन्हें बखूबी आता है। उनकी यह फिल्म बेशक उनका अब तक का सबसे मैच्योर काम है।Thursday, 27 February 2020
रिव्यू-मर्दानगी पर पड़ा ‘थप्पड़’
अमृता और विक्रम खुशहाल हैं। विक्रम अपनी नौकरी में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। लंदन वाले ऑफिस का ज़िम्मा उसे मिलने वाला है। अमृता सुबह की चाय से लेकर उसकी हर सुख-सुविधा का ख्याल रखती है। वह आदेश देता है और अमृता खुशी-खुशी उसे फर्ज़ समझ कर मानती जाती है। कहीं, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन एक पार्टी में अपने सीनियर से झगड़ते हुए विक्रम उसे खींच रही अमृता पर हाथ उठा बैठता है। ‘सिर्फ एक थप्पड़। लेकिन नहीं मार सकता।’ अमृता अपनी वकील से कहती है।
फिल्म की रफ्तार बेहद सुस्त है। दृश्यों का दोहराव इसकी सुस्ती को और बढ़ाता है। थप्पड़ वाले सीन के बाद भी इसकी चाल में फर्क नहीं आता। न ही यह एग्रेसिव होती है। इंटरवल के बहुत बाद जाकर कहीं यह मुद्दे पर आती है। दर्शक के मन में सवाल उठता है कि जिस तरह से थप्पड़ मारा गया वह क्षणिक आवेश में उठ गया (उठाया गया नहीं) कदम था। बाद में विक्रम का लगातार यह कहना कि-जाने दो, छोड़ो भी... अजीब लगता है। दर्शक का मन कहता है कि यह शख्स बीवी को आई एम सॉरी बोल कर बात खत्म क्यों नहीं करता? लेकिन तब फिल्म नहीं बनती न!
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक ‘फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड’ के सदस्य हैं और रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)



