किसी फिल्म का नाम उसके किसी किरदार के नाम पर हो तो अमूमन दो बातें होती हैं। पहली यह कि या तो उसे बनाने वालों के ज़ेहन में ही यह बात साफ नहीं है कि वे क्या कहना चाहते हैं। दूसरी यह कि उन्हें तो पता है लेकिन वे चाहते हैं कि दर्शक खुद समझे कि असल में वे क्या कहना चाहते हैं। यहां पर दूसरी वाली बात है। नितिन कक्कड़ अपनी अब तक की फिल्मों (फिल्मीस्तान, मित्रों, नोटबुक,
जवानी जानेमन) से इतना तो बता ही चुके हैं कि कहानी में से मानवीय संवेदनाओं को बारीकी से पकड़ कर उन्हें पर्दे पर उकेरने का गुर उन्हें बखूबी आता है। उनकी यह फिल्म बेशक उनका अब तक का सबसे मैच्योर काम है।
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Saturday, 29 August 2020
रिव्यू-शो मस्ट गो ऑन सिखाती ‘राम सिंह चार्ली’
किसी फिल्म का नाम उसके किसी किरदार के नाम पर हो तो अमूमन दो बातें होती हैं। पहली यह कि या तो उसे बनाने वालों के ज़ेहन में ही यह बात साफ नहीं है कि वे क्या कहना चाहते हैं। दूसरी यह कि उन्हें तो पता है लेकिन वे चाहते हैं कि दर्शक खुद समझे कि असल में वे क्या कहना चाहते हैं। यहां पर दूसरी वाली बात है। नितिन कक्कड़ अपनी अब तक की फिल्मों (फिल्मीस्तान, मित्रों, नोटबुक,
जवानी जानेमन) से इतना तो बता ही चुके हैं कि कहानी में से मानवीय संवेदनाओं को बारीकी से पकड़ कर उन्हें पर्दे पर उकेरने का गुर उन्हें बखूबी आता है। उनकी यह फिल्म बेशक उनका अब तक का सबसे मैच्योर काम है।Friday, 29 March 2019
रिव्यू-ओस में भीगी ‘नोटबुक’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
इंसानी भावनाओं की कहानियां धरती के किसी भी कोने में किसी भी ज़ुबान में कही जाएं, इंसानी मन को एक जैसी ही लगती हैं। 2014 में थाईलैंड
में बनी फिल्म ‘टीचर्स डायरी’ के इस रीमेक को देख कर
यही लगता है। श्रीनगर से दूर वूलर झील के बीच एक हाऊसबोट पर अपने मरहूम पिता के शुरू
किए स्कूल में मास्टर बन कर पहुंचे कबीर को उससे पहले वहां पढ़ा रही टीचर फिरदौस की
डायरी मिलती है। उसे पढ़ते-पढ़ते वह फिरदौस को जानने लगता है, महसूस करने लगता है, उससे प्यार तक करने लगता है। अगले साल वह चला जाता है और फिरदौस लौट आती है। उसी
डायरी में लिखी कबीर की बातों से वह भी उससे प्यार करने लगती है। अंत में इन दोनों
का मिलन होता है या नहीं, यह फिल्म में ही देखें
तो बेहतर होगा।
इंसानी भावनाओं की कहानियां धरती के किसी भी कोने में किसी भी ज़ुबान में कही जाएं, इंसानी मन को एक जैसी ही लगती हैं। 2014 में थाईलैंड
में बनी फिल्म ‘टीचर्स डायरी’ के इस रीमेक को देख कर
यही लगता है। श्रीनगर से दूर वूलर झील के बीच एक हाऊसबोट पर अपने मरहूम पिता के शुरू
किए स्कूल में मास्टर बन कर पहुंचे कबीर को उससे पहले वहां पढ़ा रही टीचर फिरदौस की
डायरी मिलती है। उसे पढ़ते-पढ़ते वह फिरदौस को जानने लगता है, महसूस करने लगता है, उससे प्यार तक करने लगता है। अगले साल वह चला जाता है और फिरदौस लौट आती है। उसी
डायरी में लिखी कबीर की बातों से वह भी उससे प्यार करने लगती है। अंत में इन दोनों
का मिलन होता है या नहीं, यह फिल्म में ही देखें
तो बेहतर होगा।Saturday, 15 September 2018
रिव्यू-सरस छे पर हल्की छे ‘मित्रों’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अहमदाबाद में एक निठल्ला लड़का। है तो इंजीनियर लेकिन शेफ बनना चाहता है। पर उसके पप्पा चाहते हैं कि वो एक अमीर आदमी का घरजंवाई बन जाए ताकि उनकी मुसीबत टले। इसी शहर की एक होशियार लड़की। बिजनेस करना चाहती है,
पढ़ने के लिए बाहर जाना चाहती है। पर उसके पप्पा चाहते हैं कि वो शादी करे और यहां से टले। उधर वो अमीर आदमी चाहता है कि उसका होने वाला (निठल्ला) दामाद पहले खुद को होशियार साबित करे। सो, यह निठल्ला लड़का और वो होशियार लड़की मिल कर एक बिज़नेस शुरू करते हैं जो चल निकलता है। अब लड़का-लड़की साथ होंगे तो ज़ाहिर है,
प्यार-व्यार तो होगा ही। अंत में सारे पप्पा लोग भी मान ही जाते हैं।
अहमदाबाद में एक निठल्ला लड़का। है तो इंजीनियर लेकिन शेफ बनना चाहता है। पर उसके पप्पा चाहते हैं कि वो एक अमीर आदमी का घरजंवाई बन जाए ताकि उनकी मुसीबत टले। इसी शहर की एक होशियार लड़की। बिजनेस करना चाहती है,
पढ़ने के लिए बाहर जाना चाहती है। पर उसके पप्पा चाहते हैं कि वो शादी करे और यहां से टले। उधर वो अमीर आदमी चाहता है कि उसका होने वाला (निठल्ला) दामाद पहले खुद को होशियार साबित करे। सो, यह निठल्ला लड़का और वो होशियार लड़की मिल कर एक बिज़नेस शुरू करते हैं जो चल निकलता है। अब लड़का-लड़की साथ होंगे तो ज़ाहिर है,
प्यार-व्यार तो होगा ही। अंत में सारे पप्पा लोग भी मान ही जाते हैं।
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