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Wednesday, 26 May 2021

ओल्ड रिव्यू-‘वीरप्पन’ का असली कातिल तो रामू है

पुलिस ने वीरप्पन को भले ही 18 अक्टूबर, 2004 को मारा हो लेकिन हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर वीरप्पन की कहानी का कत्ल 27 मई, 2016 को हुआ और वह भी राम गोपाल वर्मा के हाथों।
 
हाथी दांत और चंदन की लकड़ी के कुख्यात तस्कर वीरप्पन की कहानी पर्दे पर उतर कर जो सशक्त रूप ले सकती थी, उसका अंश भर भी इस फिल्म में दिखाई नहीं देता है। अपने आतंक से तीन राज्यों की पुलिस को दहलाने वाला यह तस्कर इस फिल्म में एकबेचाराकिस्म का छुटभैया अपराधी भर बन कर रह गया है। चंदन की तस्करी, राजनेताओं से वीरप्पन के संबंध, राजनीतिक पार्टियों की उससे हमदर्दी जैसे कई पहलू तो कहानी में छुए ही नहीं गए और जो कुछ दिखाया गया वह इस कदर बचकाना है कि देख कर इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने वालों की सोच पर हंसी नहीं बल्कि तरस आता है।