Showing posts with label usha jadhav. Show all posts
Showing posts with label usha jadhav. Show all posts

Wednesday, 26 May 2021

ओल्ड रिव्यू-‘वीरप्पन’ का असली कातिल तो रामू है

पुलिस ने वीरप्पन को भले ही 18 अक्टूबर, 2004 को मारा हो लेकिन हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर वीरप्पन की कहानी का कत्ल 27 मई, 2016 को हुआ और वह भी राम गोपाल वर्मा के हाथों।
 
हाथी दांत और चंदन की लकड़ी के कुख्यात तस्कर वीरप्पन की कहानी पर्दे पर उतर कर जो सशक्त रूप ले सकती थी, उसका अंश भर भी इस फिल्म में दिखाई नहीं देता है। अपने आतंक से तीन राज्यों की पुलिस को दहलाने वाला यह तस्कर इस फिल्म में एकबेचाराकिस्म का छुटभैया अपराधी भर बन कर रह गया है। चंदन की तस्करी, राजनेताओं से वीरप्पन के संबंध, राजनीतिक पार्टियों की उससे हमदर्दी जैसे कई पहलू तो कहानी में छुए ही नहीं गए और जो कुछ दिखाया गया वह इस कदर बचकाना है कि देख कर इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने वालों की सोच पर हंसी नहीं बल्कि तरस आता है।

Sunday, 1 December 2019

इफ्फी-सुनहरे बरस में फिल्मोत्सव की धूम

-दीपक दुआ...
1952 में शुरू हुए भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) ने इस बरस अपने 50वें संस्करण में कदम
रखा। इस सुनहरे मौके पर इफ्फी की रंगत कुछ अलग ही रही। 20 नवंबर की शाम करण जौहर के संचालन और अमिताभ बच्चन रजनीकांत जैसे दो महानायकों की उपस्थिति में इस समारोह की रंगारंग शुरूआत हुई। देश-विदेश की ढेरों उत्कृष्ट फिल्मों के प्रदर्शन के साथ-साथ सिनेमा से जुड़ी बहुतेरी गतिविधियां से यह उत्सव लबरेज रहा।
बदला रंग बदला रूप
1952 से लेकर अब तक इफ्फी के रूप-रंग में कई किस्म के बदलाव हुए हैं। पहले यह महोत्सव घुमंतू था। हर साल देश के अलग-अलग शहरों में होता था। लेकिन 2004 से यह गोआ में जाकर जम चुका है और अपनी एक अलग पहचान भी हासिल कर चुका है। गोआ में भी यह पहले 23 नवंबर से 3 दिसंबर तक होता था। फिर यह 20 से 30 नवंबर तक होने लगा और 2016 से इसे 20 से 28 नवंबर तक आयोजित किया जाने लगा।

Monday, 4 March 2019

रिव्यू-कतरा-कतरा सुलगती ‘फायरब्रांड’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
किशोरावस्था में बलात्कार का शिकार हुई एक औरत आखिर कैसे जीती होगी? क्या वह सब कुछ भूल चुकी होगी, या उस आदमी से बदला लेने के लिए तड़पती होगी, या फिर उस दर्द को रोज़ जीती-महसूस करती होगी? इस कहानी की नायिका सुनंदा के साथ स्कूली-दिनों में ऐसा ही हुआ था। आज वह शहर की तेज़तर्रार वकील है-एकदम फायरब्रांड। तलाक के मुकदमों में अपनी मुवक्किल को इंसाफ दिलाने के लिए मशहूर। लेकिन रोज़ाना रात को सपने में उसका बलात्कारी आता है, उसके साथ ज़बर्दस्ती करता है। यहां तक कि अपने पति के साथ वह बिस्तर में भी सहज नहीं रह पाती। सुलग रही है वह भीतर ही भीतर। कैसे जीतती है वह खुद अपना ही केस, कैसे दिलवा पाती है खुद को इंसाफ, यही इसकी कहानी है।