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Monday, 3 June 2019

रिव्यू-नेक नीयत ‘नक्काश’

-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
बनारस के मंदिरों में नक्काशी करने वाला एक मुस्लिम कारीगर अल्लाह रक्खा। उसके बाप-दादा भी यही किया करते थे। लेकिन आज कुछ लोगों को उसके धर्म से तो कुछ को उसके कर्म से एतराज़ है। ये लोग दोनों तरफ हैं। कुछ हिन्दुओं को एतराज़ है कि एक मुसलमान उनके मंदिर में आकर उनके देवी-देवताओं को कैसे छू सकता है। उधर कुछ मुसलमानों को एतराज़ है कि यह शख्स काफिरों के मंदिरों में जाकर काम कैसे कर सकता है। लेकिन अल्लाह रक्खा के लिए यही उसकी रोज़ी है। उससे काम करवाने वाले मंदिर के महंत वेदांती जी भी उसका साथ देते हैं। लेकिन इनके आसपास के कुछ लोग नहीं चाहते कि यह सद्भाव बना रहे। एक साज़िश होती है और...!

फिल्म एक संवेदनशील विषय को उठाती है। एक ऐसा विषय जिस पर बात किया जाना ज़रूरी भी है। एक ऐसा समाज जहां कभी राजनीति से धर्म को दूर रखा जाता था वहीं अब कुछ लोग धर्म की ही राजनीति करने लगे हैं तो ऐसे में एक आम आदमी कैसे जिए? वे लोग क्या करें जो अपने जीने के लिए कर्म करते हैं और धर्म को सिर्फ सद्भाव का विषय मानते हैं, उलझाव का नहीं? निर्देशक ज़ैग़म इमाम अपने लेखन से और अपने निर्देशन से ऐसे सवाल, उन सवालों से उपजी परिस्थितियां दिखा पाने में कामयाब रहे हैं। मुस्लिम कारीगर का मंदिर में जाने से पहले हिन्दुओं की तरह माथे पर तिलक लगाना और लौटने के बाद उसे मिटाना दरअसल हमारे समाज के उस दोगले चरित्र को दिखाता है जो एक आम, शरीफ इंसान को उसकी मर्ज़ी से जीने तक नहीं देना चाहता। संवाद सहज और कुछ एक जगह काफी असरदार हैं। हालांकि ज़ैग़म कहीं-कहीं चूके भी हैं। बतौर लेखक वह थोड़ा भटके भी हैं। कुछ सीन गैरज़रूरी भी लगे हैं और बतौर निर्देशक कुछ एक जगह वह उतनी ज़ोर से अपनी बात नहीं कह पाए हैं जितना दम इस किस्म के विषय में होना चाहिए था। बावजूद इसके, विषय के प्रति उनकी नेक नीयत से इंकार नहीं किया जा सकता। विषय की गंभीरता बनाए रखने के लिए वह फालतू के मसालों से बचे हैं। इससे फिल्म में रूखापन भले ही आया हो, हल्कापन नहीं आ पाया है और यही इस फिल्म को दर्शनीय बनाता है।

तमाम किरदार कायदे से उकेरे गए हैं। अल्लाह रक्खा की भूमिका में इनामुल हक़ बेहद प्रभावी रहे हैं। उनके दोस्त समद के किरदार में शारिब हाशमी, वेदांती जी बने कुमुद मिश्रा, थानेदार के रोल में राजेश शर्मा, धर्म की राजनीति करने वाले उग्र युवा नेता पवन तिवारी जैसे तमाम कलाकारों ने असरदार काम किया है। कैमरा बनारस को एक अलग रंग, एक अलग अंदाज़ में दिखाता है।
(रेटिंग की ज़रूरत ही क्या है? रिव्यू पढ़िए और फैसला कीजिए कि फिल्म कितनी अच्छी या खराब है। और हां, इस रिव्यू पर अपने विचार ज़रूर बताएं।)
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक फिल्म क्रिटिक्स गिल्डके सदस्य हैं और रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

Sunday, 13 May 2018

‘नक्काश’ मेरे लिए फिल्म नहीं इत्र की खुशबू है...

-इनामुल हक़...
बनारस में शूटिंग का पहला दिन था। छोटे शहरों की सिनेमाई जिज्ञासाभीड़ में बदलने लगी थी। उसी भीड़ में से कुछ नौजवान यह कहते हुए नज़दीक रहे थे कि चलो देखते हैं हीरोकौन है? जैसे ही उनकी यह बात मेरे कानों तक पड़ी, ‘-खुदामैं छुप गया था। वजह बहुत सीधी सी है। उनकी उत्सुकता को निराशामें नही बदलना चाहता था मुझे पता है हीरोक्या होता है। रोज़ आइना देखता हूं इसलिए किसी गलतफहमी में नहीं हूं। लेकिन सपनों की कोई बाउंडरी वॉलनहीं होती। इसलिए अपने आपको कभी भी यह सोचने से नहीं रोक पाया कि किसी फिल्म में लीड रोलहो। नियति पूर्वनिर्धारित है। हमें बस मदद करनी होती है। उसकी राहों की रुकावटें हटानी होती हैं। उसे घट जाने देनेके लिए... घट जानादरअसल बढ़ जानाही होता है पिछले छह महीने में बहुत कुछ घटा’, इसलिए कुछ बढ़ पारहा हूं। आप जो पोस्टरदेख रहे हैं वो महज एक पोस्टर नहीं है, बल्कि नियति की खींची हुई कुछ लकीरें हैं जिन के पीछे वो स्याही है जो इत्र की तरह कतरा-कतरा करके बहुत बड़े वक्फे में जमा हुई है। और खर्च होकर जो हासिल हुआ है उसका नाम है नक्काश आप सबके के लिए महज़ एक फिल्म, मेरे लिए इत्र की खुशबू। जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है बयान नही।

नक्काशआज के दौर के लिए एक ज़रूरी फिल्म है। जिसका बनना जितना ज़रूरी था, उससे भी ज़रूरी है उसका रिलीज़ होना। और उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है लोगों का सिनेमा हॉल तक आना। हम सिनेमा के उस दौर से गुज़र रहे हैं जहां एक तरफ, हर मुट्ठी में एक सिनेमा है...डिज़िटली यूअर्स तो दूसरी तरफ सिनेमा चंद मुट्ठियों में कैद है ‘100 करोड़ी क्लबऔर सितारागर्दीके मायाजाल में जकड़ा। बाकी बस एक छटपटाहट है सिनेमा के असली वजूद को बरकरार रखने की। गिरती हुई दीवारों के रेस्टोरेशनकी। नक्काशउसी छटपटाहट से बनी एक ईंटहै जिसमें डायरेक्टर जै़गम इमाम के जुनून का निचोड़ है। प्रोड्यूसर पवन तिवारी, पीयूष सिंह और गोविंद गोयल के भरोसे का इम्तेहान है। को-एक्टर शारिब हाशमी, कुमुद मिश्रा और राजेश शर्मा की दोस्ती का सरमाया है। इसके अलावा अनगिनत उम्मीदों की डोर है जो इस ईंट से बंधी हुई है। कोई लड़ाई नहीं है। हम सिर्फ कोशिश कर सकते हैं कि ईंट दीवार में सही जगह लगे। डोर टूटे नहीं। कोशिश जारी है।

सफर बनारस से शुरू हुआ था और कांसपर आकर रफ्तार पकड़ी है। मंज़िल इंतज़ार कर रही है कहीं। लेकिन सफर और मंज़िल के बीच जो सबसे ज़रूरी चीज़ है उसे दर्ज करना उससे भी ज़रूरी है। और वो चीज़ है आपका प्यार आप, जो मेरी हर खुशी को अपनी खुशी बना कर मेरी खुशी और बढ़ा देते हैं, वो बेशकीमती है। मेरे हर कदम पर आपकी हौसला-अफजाई मेरी रगों में दौड़ते लहू को जो ताज़गी देती है, उसके लिए सिर्फ शुक्रियाकह देना बेईमानी होगी। बस, इतना कह सकता हूं कि आपके लिए भी दुआएं बसी हैं इस दिल में। अलग-अलग इज़हार नही कर पाता, उसके पीछे बहुत सारी वजहें हो सकती हैं। लेकिन आप मायने रखते हैं मेरे वजूदके लिए। आप हैं तो मैं हूं।

बने रहिए...!
(‘फिल्मीस्तान’, ‘एयरलिफ्ट’, ‘जॉली एल.एल.बी. 2’ जैसी फिल्मों में अपनी उम्दा अदाकारी से पहचाने गए इनामुल हक़ कमाल के लेखक भी हैं। उनकी अगली फिल्म नक्काशका पोस्टर अभी कांस फिल्म फेस्टिवल में जारी हुआ जिसके बाद उन्होंने यह पोस्ट लिखी जिसे उनकी इजाज़त से सिनेयात्राके पाठकों के लिए लिया गया है।)