-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चौराहों पर भीख मांगते भिखारी, बाजीगरी दिखा कर पैसे के लिए हाथ पसारते बच्चे, गलियों में आकर बंदर, सांप का खेल दिखाने वाले मदारी, मौहल्ले के किसी घर में खुशी के मौके पर नाचने-गाने वाले हिजड़े, उनके साथ ढोलकी-हारमोनियम बजाने वाले साजिंदे। ऐसे किरदार हम रोजाना अपने इर्द-गिर्द देखते हैं। पर क्या हम उन्हें सचमुच ‘देखते’ हैं? क्या कभी हम यह सोचते हैं कि अपना ‘पिरोगराम’ खत्म करने के बाद ये लोग कहां जाते हैं, कैसे जीते हैं, क्या हैं उनकी जिंदगी के संघर्ष, उनके सपने? इस फिल्म की नायिका अनारकली ऐसा ही एक किरदार है जो समाज में है तो सही लेकिन उसका कोई वजूद नहीं है। और जब वह अपने वजूद की, अपनी मर्जी की बात करती है तो उसे दुत्कार दिया जाता है।
