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Friday, 30 July 2021

रिव्यू-मंज़िल तक पहुंचाती ‘मिमी’


-दीपक दुआ...  (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
अमेरिका से आया एक जोड़ा राजस्थान की लड़की मिमी को 20 लाख रुपए में सरोगेट मदर बनने पर राज़ी करता है। यानी अब मिमी इस जोड़े के बच्चे को 9 महीने तक अपनी कोख में रखेगी और बच्चा पैदा करके उन्हें सौंप देगी। लेकिन अचानक यह जोड़ा लापता हो जाता है। अब मिमी अपने घरवालों को, समाज को क्या जवाब देगी...? बच्चा हुआ, मिमी उसे पालने लगी। कुछ साल बाद वे गोरे धमके और उससे अपना बच्चा मांगने लगे। अब मिमी क्या करेगी...?

Sunday, 25 April 2021

ओल्ड रिव्यू-उम्मीदें जगाती है ‘निल बटे सन्नाटा’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
इंसान दो चीजों से बनता है-किस्मत और मेहनत। और गरीब के पास किस्मत होती तो वह गरीब ही क्यों होता? तो बची मेहनत, वही करनी होगी।
 
इस फिल्म का यह संवाद इसका पूरा ज़ायका बता देता है। आगरा में दूसरों के घरों और कारखानों में काम करके अपनी बेटी को पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाने का सपना देख रही चंदा एक दिन उस के साथ उसी की क्लास में दाखिला ले लेती है। बेटी को लगता है कि मां खुद तो कुछ बन सकी और अब अपने सपने उस पर थोप रही है। पर जब उसे अक्ल आती है कि मां का सपना तो उसकी बेटी ही है तब वह मेहनत का पहाड़ तोड़ देती है।

Monday, 11 January 2021

रिव्यू-हल्की स्क्रिप्ट से डूबी ‘कागज़’ की नाव

 -दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुए हैं एक लाल बिहारी। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके चाचा ने उनके हिस्से की पुश्तैनी ज़मीन हड़पने के लिए उन्हें कागज़ों में मृतक घोषित करवा दिया है। इसके बाद लाल बिहारी बरसों तक तमाम सरकारी दफ्तरों से लेकर कोर्ट-कचहरी तक चक्कर लगाते रहे कि उन्हें ज़िंदा घोषित किया जाए। कई बड़े लोगों के खिलाफ चुनाव तक में खड़े हुए और यू.पी. की विधान सभा में पर्चे तक उछाले। इस दौरान देश भर से उन जैसे ढेरोंमृतकलोग उनके साथ जुड़े और इन्होंने अपना एकमृतक संघतक बना लिया। बरसों के संघर्ष के बाद लाल बिहारी और कुछ अन्य लोगों कोज़िंदाघोषित कर दिया गया लेकिन आज भी बीसियों जीवित लोग खुद को जीवित साबित करने की जद्दोज़हद में लगे हुए हैं।

Monday, 24 August 2020

रिव्यू-जीना और जीतना सिखाती है ‘गुंजन सक्सेना’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक छोटी बच्ची ने पायलट बनने का सपना देखा। पिता ने हर कदम उसका साथ दिया। पायलट नहीं बन पाई तो उसे एयरफोर्स में जाने को कहा। लेकिन क्या हर कदम पर दुनिया उस लड़की का स्वागत ही करेगी? अपने समाज की तो आदत ही रही है लड़कियों के पंख कतरने की। लेकिन गुंजन लड़ी, लड़ी तो जीती, जीती तो ऐसे कि मिसाल बन गई।