-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
रेलवे लाइन पर ‘हल्के’ होते सब लोग। टॉयलेट के लिए मिलने वाले सरकारी पैसे से ऐश करते लोग। उस पैसे को देने की एवज में रिश्वत मांगते सरकारी अफसर। स्कूल जाने की बजाय कचरा बीनते बच्चे। इन्हीं बच्चों में से एक पिचकू। सबके सामने ‘हल्का’ होने में उसे शर्म आती है। पिता टॉयलेट बनवाने को तैयार नहीं। बच्चा खुद ही यह बीड़ा उठाता है।
रेलवे लाइन पर ‘हल्के’ होते सब लोग। टॉयलेट के लिए मिलने वाले सरकारी पैसे से ऐश करते लोग। उस पैसे को देने की एवज में रिश्वत मांगते सरकारी अफसर। स्कूल जाने की बजाय कचरा बीनते बच्चे। इन्हीं बच्चों में से एक पिचकू। सबके सामने ‘हल्का’ होने में उसे शर्म आती है। पिता टॉयलेट बनवाने को तैयार नहीं। बच्चा खुद ही यह बीड़ा उठाता है।
