एक नेता ने अपने पाले हुए गुंडे के हाथों दूसरे नेता को दस करोड़ रुपए से भरा सूटकेस भेजा। उस सूटकेस में एक फाइल भी थी। रास्ते में दूसरे गैंग ने हमला कर दिया और सूटकेस गया छूट। देर रात की नौकरी से लौटते एक आम आदमी को वह मिला और वह उसे घर ले आया। अब नेता, उसके गुंडे, उसका पाला हुआ पुलिस वाला, दूसरे गैंग्स्टर के गुंडे, सब उस आदमी के पीछे पड़े हैं। और वह आदमी है कि उस पैसे के बारे में अपने बीवी-बच्चों को भी नहीं बता सकता।
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Saturday, 15 August 2020
रिव्यू-मनोरंजन की दौलत है इस ‘लूटकेस’ में
एक नेता ने अपने पाले हुए गुंडे के हाथों दूसरे नेता को दस करोड़ रुपए से भरा सूटकेस भेजा। उस सूटकेस में एक फाइल भी थी। रास्ते में दूसरे गैंग ने हमला कर दिया और सूटकेस गया छूट। देर रात की नौकरी से लौटते एक आम आदमी को वह मिला और वह उसे घर ले आया। अब नेता, उसके गुंडे, उसका पाला हुआ पुलिस वाला, दूसरे गैंग्स्टर के गुंडे, सब उस आदमी के पीछे पड़े हैं। और वह आदमी है कि उस पैसे के बारे में अपने बीवी-बच्चों को भी नहीं बता सकता।Sunday, 15 March 2020
रिव्यू-आधी पास-आधी फेल ‘अंग्रेज़ी मीडियम’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘पिता-वह मूर्ख प्राणी जो अपने बच्चों की खुशी के लिए किसी भी हद तक जा सकता है’ की टैगलाइन के साथ शुरू होने वाली यह फिल्म राजस्थान के उदयपुर की तारिका बंसल की लंदन के एक मशहूर और महंगे कॉलेज में पढ़ने की ख्वाहिश को पूरा करने की उसके पिता चंपक बंसल की कोशिशों और संघर्ष को दिखाती है। अपना सब कुछ दांव पर लगा कर भी चंपक अपनी बेटी के सपने को पूरा करने में जुटा रहता है। उसे लगता है कि अपनी पत्नी के आगे पढ़ने का सपना न पूरा करके उसके जो गुनाह किया है, अपनी बेटी की इच्छा पूरी करके वह उसका प्रायश्चित कर सकेगा।
‘पिता-वह मूर्ख प्राणी जो अपने बच्चों की खुशी के लिए किसी भी हद तक जा सकता है’ की टैगलाइन के साथ शुरू होने वाली यह फिल्म राजस्थान के उदयपुर की तारिका बंसल की लंदन के एक मशहूर और महंगे कॉलेज में पढ़ने की ख्वाहिश को पूरा करने की उसके पिता चंपक बंसल की कोशिशों और संघर्ष को दिखाती है। अपना सब कुछ दांव पर लगा कर भी चंपक अपनी बेटी के सपने को पूरा करने में जुटा रहता है। उसे लगता है कि अपनी पत्नी के आगे पढ़ने का सपना न पूरा करके उसके जो गुनाह किया है, अपनी बेटी की इच्छा पूरी करके वह उसका प्रायश्चित कर सकेगा।Friday, 1 March 2019
रिव्यू-धूल में लोटती ‘सोनचिरैया’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
जूनियर डाकू (ओह सॉरी, बीहड़ में बागी होत हैं, डकैत मिलते हैं पार्लामैंट में) लखना जब सीनियर बागी
मानसिंह से यह सवाल पूछता है तो उसे जवाब नहीं मिलता। कुछ देर बाद यही सवाल वह दूसरे
सीनियर बागी से पूछता है। उसे जवाब मिलता है-बागी का धरम होत है अपनी जात-बिरादरी की
रच्छा करना। तो, इस फिल्म में हर बागी अपनी
जात-बिरादरी के गैंग में रह कर अपनी जात-बिरादरी वालों की रच्छा कर रहा है और सोच रहा
है कि वह बहुत महान काम कर रहा है। लेकिन असल में वह भी जानता है कि उसकी यह ज़िंदगी
किसी नरक से कम नहीं। न खाने का पता, न हगने का। कई-कई दिन सोने को नहीं मिलता और पुलिस है कि कुत्तों की तरह सूंघती
फिरती है।
Friday, 21 September 2018
रिव्यू-इस ‘मंटो’ को समझने के लिए उस मंटो को समझना होगा
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘अगर आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते... तो इसका मतलब यह है कि ज़माना ही नाकाबिले बर्दाश्त है...।’
‘अगर आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते... तो इसका मतलब यह है कि ज़माना ही नाकाबिले बर्दाश्त है...।’
इतनी बेबाकी, ठसक और शिद्दत के साथ सआदत हसन मंटो नाम के जिस शख्स ने उम्र भर अपनी बात कही,
वह उम्र भर किस संघर्ष से होकर गुजरता रहा और अपने आखिरी दौर में वह किस कदर मजबूर था,
यह भला कौन जानता है?
और अगर इन संघर्षों और मजबूरियों से उसका साबका न हुआ होता तो क्या यह मुमकिन नहीं कि वह सिर्फ 42 की उम्र में दुनिया न छोड़ता...?
Saturday, 8 September 2018
रिव्यू-‘हल्का’-एक हल्की टॉयलेट कथा
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
रेलवे लाइन पर ‘हल्के’ होते सब लोग। टॉयलेट के लिए मिलने वाले सरकारी पैसे से ऐश करते लोग। उस पैसे को देने की एवज में रिश्वत मांगते सरकारी अफसर। स्कूल जाने की बजाय कचरा बीनते बच्चे। इन्हीं बच्चों में से एक पिचकू। सबके सामने ‘हल्का’ होने में उसे शर्म आती है। पिता टॉयलेट बनवाने को तैयार नहीं। बच्चा खुद ही यह बीड़ा उठाता है।
रेलवे लाइन पर ‘हल्के’ होते सब लोग। टॉयलेट के लिए मिलने वाले सरकारी पैसे से ऐश करते लोग। उस पैसे को देने की एवज में रिश्वत मांगते सरकारी अफसर। स्कूल जाने की बजाय कचरा बीनते बच्चे। इन्हीं बच्चों में से एक पिचकू। सबके सामने ‘हल्का’ होने में उसे शर्म आती है। पिता टॉयलेट बनवाने को तैयार नहीं। बच्चा खुद ही यह बीड़ा उठाता है।
Wednesday, 22 November 2017
रिव्यू-कड़वी है मगर जरूरी है
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘कड़वी हवा’ का एक सीन देखिए। क्लास के सब बच्चे एक लड़के की शिकायत करते हुए कहते हैं कि मास्टर जी, यह कह रहा है कि साल में सिर्फ दो ही मौसम होते हैं-गर्मी और सर्दी। मास्टर जी पूछते हैं-बरसात का मौसम कहां गया? जवाब मिलता है-‘मास्साब, बरसात तो साल में बस दो-चार दिन ही पड़त...!’ यह सुन कर सब बच्चे हंस पड़ते हैं। इधर थिएटर में भी हल्की-सी हंसी की आवाजें फैलती हैं। लेकिन इस हल्के-फुल्के सीन में कितना बड़ा और कड़वा सच छुपा है उसे आप और हम मानते भले न हों, अच्छे से जानते जरूर हैं। बचपन में स्वेटर पहन कर रामलीला देखने वाली हमारी पीढ़ी आज दीवाली के दिन कोल्ड-ड्रिंक पीते हुए जब कहती है कि अब पहले जैसा मौसम नहीं रहा, तो यह उस सच्चाई का ही बखान होता है जिसे जानते तो हम सब हैं, लेकिन उसके असर को मानने को राजी नहीं होते। नीला माधव पांडा की यह फिल्म हमें उसी सच से रूबरू करवाती है-कुछ कड़वाहट के साथ।
संजय मिश्रा ने अंधे-बूढ़े पिता के रोल में अब तक के अपने अभिनय-सफर के चरम को छुआ है। फिल्मी अंधों की तरह आंखें ऊपर चढ़ा कर और गर्दन उठा कर चलने की बजाय उन्होंने आंखें और गर्दन, दोनों को झुका कर बेहद प्रभावी काम किया है। एक अंधे व्यक्ति का इतना असरदार
अभिनय या तो ‘स्पर्श’ में नसीरुद्दीन शाह ने किया था
या अब संजय मिश्रा ने किया है। अपनी भैंस अन्नपूर्णा के साथ उनका बातें करना बताता है कि इंसान अब किस कदर अकेला पड़ चुका है। रणवीर शौरी ने ओडिशा से आए गुनु बाबू के किरदार में जरूरी कड़वाहट और झल्लाहट डाल कर इसे विश्वसनीय बनाए रखा है। तिलोतमा शोम, भूपेश सिंह, एकता सावंत और तमाम दूसरे कलाकारों ने भी भरपूर असरदार काम किया है। लोकेशन, पहनावा, बोली, रहन-सहन और स्थानीय भीड़, सब मिल कर फिल्म को गहराई देते हैं।
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार
हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय।
मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग ‘सिनेयात्रा डॉट कॉम’ (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित
लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)
‘कड़वी हवा’ का एक सीन देखिए। क्लास के सब बच्चे एक लड़के की शिकायत करते हुए कहते हैं कि मास्टर जी, यह कह रहा है कि साल में सिर्फ दो ही मौसम होते हैं-गर्मी और सर्दी। मास्टर जी पूछते हैं-बरसात का मौसम कहां गया? जवाब मिलता है-‘मास्साब, बरसात तो साल में बस दो-चार दिन ही पड़त...!’ यह सुन कर सब बच्चे हंस पड़ते हैं। इधर थिएटर में भी हल्की-सी हंसी की आवाजें फैलती हैं। लेकिन इस हल्के-फुल्के सीन में कितना बड़ा और कड़वा सच छुपा है उसे आप और हम मानते भले न हों, अच्छे से जानते जरूर हैं। बचपन में स्वेटर पहन कर रामलीला देखने वाली हमारी पीढ़ी आज दीवाली के दिन कोल्ड-ड्रिंक पीते हुए जब कहती है कि अब पहले जैसा मौसम नहीं रहा, तो यह उस सच्चाई का ही बखान होता है जिसे जानते तो हम सब हैं, लेकिन उसके असर को मानने को राजी नहीं होते। नीला माधव पांडा की यह फिल्म हमें उसी सच से रूबरू करवाती है-कुछ कड़वाहट के साथ।
कहानी बीहड़ के एक ऐसे अंदरूनी गांव की है जहां मौसम की मार के चलते हर किसान पर कर्ज है जिसे वापस करने की कोई सूरत न देख किसान एक-एक कर खुदकुशी कर रहे हैं। बैंक के कर्ज की वसूली करने वाले गुनु बाबू को लोग यमदूत कहते हैं क्योंकि वह जिस गांव में जाता है वहां दो-चार लोग तो मौत को गले लगा ही लेते हैं। गुनु बाबू के लिए उसके ‘क्लाइंट’ चूहे हैं। ऐसे में एक अंधा बूढ़ा अपने बेटे के लिए गुनु बाबू से एक अनोखा सौदा कर लेता है। पर क्या कड़वी हवा किसी को यूं ही छोड़ देती है?
इस किस्म की फिल्मों के साथ अक्सर यह दिक्कत आती है कि ये या तो अतिनाटकीय हो जाती हैं या फिर उपदेश पिलाने लगती हैं। और कुछ नहीं तो हार्ड-हिटिंग बनाने के चक्कर में इनमें दिल दहलाने वाली घटनाएं डालना तो आम बात है। लेकिन इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। सौ मिनट की होने के बावजूद यह मंथर गति से चलती है, मानो इसे अपनी बात कहने की कोई जल्दी नहीं है। इतने पर भी यह जो कहना और महसूस करवाना चाहती है, बहुत ही सहजता से करवा देती है। नितिन दीक्षित ने अगर अपनी लेखनी से फिल्म को खड़ा किया है तो ‘आई एम कलाम’ और ‘जलपरी’ जैसी उम्दा फिल्में दे चुके नीला माधव पांडा अपने निर्देशकीय-कौशल का भरपूर प्रदर्शन करते हुए इसे ऊंचाई पर ले गए हैं। हालांकि मौसम की मार से ज्यादा यह कर्जे की मार तले दबे किसानों की कहानी लगती है और ‘करजा’ या ‘बंजर’ जैसे शीर्षक इस पर कहीं ज्यादा फिट होते। फिर भी जब यह फिल्म खत्म होती है तो आप चौंकते नहीं हैं बल्कि सन्न रह जाते हैं।
संजय मिश्रा ने अंधे-बूढ़े पिता के रोल में अब तक के अपने अभिनय-सफर के चरम को छुआ है। फिल्मी अंधों की तरह आंखें ऊपर चढ़ा कर और गर्दन उठा कर चलने की बजाय उन्होंने आंखें और गर्दन, दोनों को झुका कर बेहद प्रभावी काम किया है। एक अंधे व्यक्ति का इतना असरदार
अभिनय या तो ‘स्पर्श’ में नसीरुद्दीन शाह ने किया था
या अब संजय मिश्रा ने किया है। अपनी भैंस अन्नपूर्णा के साथ उनका बातें करना बताता है कि इंसान अब किस कदर अकेला पड़ चुका है। रणवीर शौरी ने ओडिशा से आए गुनु बाबू के किरदार में जरूरी कड़वाहट और झल्लाहट डाल कर इसे विश्वसनीय बनाए रखा है। तिलोतमा शोम, भूपेश सिंह, एकता सावंत और तमाम दूसरे कलाकारों ने भी भरपूर असरदार काम किया है। लोकेशन, पहनावा, बोली, रहन-सहन और स्थानीय भीड़, सब मिल कर फिल्म को गहराई देते हैं।
कैमरे और बैकग्राउंड म्यूजिक ने असर बढ़ाने का ही काम किया है। गीत ‘मैं बंजर मैं बंजर...’ दिल में तीर की तरह घुसता-सा लगता है। अंत में गुलज़ार की आवाज़ में उन्हीं की नज़्म ‘बंजारे लगते हैं मौसम, मौसम बेघर होने लगे हैं...’ फिल्म की रूह की मानिंद बन कर आती है।
इस फिल्म में मसाले नहीं हैं, मजा नहीं है, मनोरंजन भी नहीं है। इसमें कोई उपदेश भी नहीं है और न ही यह कोई पाठ पढ़ाती है। लेकिन यह आज के दौर की एक ज़रूरी फिल्म है जो तनिक कड़वाहट के साथ अहसास कराती है कि अगर अब भी न जागे तो हो सकता है, जागने लायक ही न रहें।
अपनी रेटिंग-चार स्टार
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