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Sunday, 30 May 2021

ओल्ड रिव्यू-‘यह जवानी है दीवानी’ और मस्तानी भी

कुछ दोस्त हैं। स्कूल-कॉलेज के जमाने के। अलग-अलग रास्तों पर चल कर अपनी-अपनी मंज़िलें तलाश रहे हैं। लेकिन अपने रास्तों और अपने दिल की आवाज़ को लेकर खासे कन्फ्यूज़ भी हैं। उनके साथ हो कुछ और रहा है लेकिन इनके सपने कुछ और हैं। फिर ये लोग एक ट्रिप पर निकलते हैं और वहां इन्हें ऐसे-ऐसे एक्सपीरियंस होते हैं कि इनकी सोच, रास्ते, मंज़िलें, सपने, सब बदल जाते हैं।

Monday, 21 May 2018

यादें-‘प्रहार’ का वो पहला अटैक

-दीपक दुआ...
1991 का बरस था। नवंबर का महीना। बी.कॉम का दूसरा साल। सिनेमा में अपनी दिलचस्पी जोर पकड़ चुकी थी। खासतौर से लीक से कुछ हट कर बनने वाली फिल्मों के प्रति अपना खासा लगाव था। 29 नवंबर को नाना पाटेकर के निर्देशन में प्रहाररिलीज हुई। जनसत्तामें श्रीश जी की लिखी समीक्षा पढ़ने के बाद दो-एक दोस्तों से यह फिल्म देखने के लिए पूछा। कोई राज़ी नहीं हुआ तो 5 दिसंबर, गुरुवार को अकेले ही जा पहुंचा। फिल्म देख कर निकला तो सिर भन्ना रहा था। सिनेमा के पर्दे पर अपने सभ्यसमाज की ऐसी स्याह तस्वीर ने मुझे अंदर तक हिला दिया। उस रात नींद नहीं आई। आई भी तो भीतर प्रहारचल रही थी।

इसके एक हफ्ते तक मैं कॉलेज नहीं गया। गया तो अर्थशास्त्र की क्लास में पंगा हो गया। मैडम ने अपने लेक्चर में पता नहीं किस संदर्भ में प्रहारके उस आखिरी सीन की आलोचना कर दी जिसमें बहुत सारे बच्चे नंगे बदन दिखाई देते हैं। अपने से रहा नहीं गया और उस सीन के पक्ष में पता नहीं क्या-क्या बोल गया। यह भी कि वे बच्चे नंगे नहीं बल्कि एक समान हैं, बराबरी पर खड़े हैं और एक स्वस्थ समाज का यही फर्ज़ है कि वह सबको बराबरी पर लाए और एक साथ आगे बढ़ने का मौका दे। बाकी बच्चों से पीछे रह गए दो बच्चों को रुक कर अपने साथ ले चलते हुए नाना पाटेकर फिल्म में यही तो कर रहे हैं। क्लास में सन्नाटा छा चुका था। मैडम मेरा मुंह तक रही थीं। फिर वह हैरान हो कर पूछ बैठीं-तुम सचमुच कॉमर्स के ही स्टूडेंट हो ...? ऊपर से तो मैंने जी हांही कहा, लेकिन अंदर ही अंदर मुझे भी लगने लगा था कि अब मेरी दिशा कुछ और है। सिनेमा मेरे जेहन पर वो प्रहार कर चुका था जिससे बचना अब मेरे लिए नामुमकिन था।

तब से अब तक सैंकड़ों फिल्में देखीं... शायद हज़ारों। मगर प्रहारआज भी मेरे जेहन से उतरती नहीं है। ऐसे ही किसी वक्त मन में यह भी आया था कि कभी अपने बच्चों को यह फिल्म दिखाऊंगा। अभी बेटे को यह फिल्म दिखाई। बीच में रोक-रोक कर संदर्भ भी समझाए। 14 साल की उम्र में वह इसे कितना समझ पाया होगा, कह नहीं सकता। बीज रोपना मेरा काम था, कर दिया। प्रहारके ही एक गीत के बोलों में कहूं तो जिन पर है चलना नई पीढ़ियों को, उन्हीं रास्तों को बनाना हमें है...!

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)