कुछ दोस्त हैं। स्कूल-कॉलेज के जमाने के। अलग-अलग रास्तों पर चल कर अपनी-अपनी मंज़िलें तलाश रहे हैं। लेकिन अपने रास्तों और अपने दिल की आवाज़ को लेकर खासे कन्फ्यूज़ भी हैं। उनके साथ हो कुछ और रहा है लेकिन इनके सपने कुछ और हैं। फिर ये लोग एक ट्रिप पर निकलते हैं और वहां इन्हें ऐसे-ऐसे एक्सपीरियंस होते हैं कि इनकी सोच, रास्ते,
मंज़िलें, सपने, सब बदल जाते हैं।
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Sunday, 30 May 2021
ओल्ड रिव्यू-‘यह जवानी है दीवानी’ और मस्तानी भी
Friday, 23 November 2018
ओल्ड रिव्यू-‘तमाशा’ नाटक नहीं नौटंकी है
बनना कुछ चाहते थे, बन कुछ गए। या फिर करना कुछ और चाहते थे और कर कुछ और रहे हैं। इस आइडिया पर हिन्दी फिल्में बनाने वाले ‘व्यापारी’ हमें इतना कुछ परोस चुके हैं कि अब इस आइडिया के नाम से ही कोफ्त होने लगती है। लेकिन इमित्याज अली कुछ लेकर आएं तो लगता है कि उसमें कुछ अलग होगा। माल अलग नहीं हुआ तो उसे परोसने का अंदाज ही अलग होगा। इस फिल्म में वही है। कहानी पुरानी अंदाज नया। मगर क्या यह अंदाज रोचक भी है? कत्तई नहीं।Saturday, 30 June 2018
रिव्यू-‘संजू’-अधूरी हकीकत बाकी फसाना
-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
फिल्म के अंदर का संजय दत्त बड़े ज़ोर से यह चाहता है कि उसकी बायोग्राफी यानी आत्मकथा एक नामी राइटर लिखे ताकि उसमें कुछ सलीका हो और लोग उस पर ज़्यादा यकीन करें। थोड़ी ना-नुकर के बाद वह राइटर राज़ी होती है तो संजू उसे अपनी ज़िंदगी के ‘कुछ’
चैप्टर सुनाता है। जी हां, ‘कुछ’
चैप्टर। सारे नहीं। बाकी के वह सुनाता नहीं और न ही वह राइटर उनके बारे में पूछती है। ज़ाहिर है ऐसे में जो किताब बन कर सामने आएगी, वह
सच्ची तो हो सकती है, संपूर्ण
नहीं।
फिल्म के अंदर का संजय दत्त बड़े ज़ोर से यह चाहता है कि उसकी बायोग्राफी यानी आत्मकथा एक नामी राइटर लिखे ताकि उसमें कुछ सलीका हो और लोग उस पर ज़्यादा यकीन करें। थोड़ी ना-नुकर के बाद वह राइटर राज़ी होती है तो संजू उसे अपनी ज़िंदगी के ‘कुछ’
चैप्टर सुनाता है। जी हां, ‘कुछ’
चैप्टर। सारे नहीं। बाकी के वह सुनाता नहीं और न ही वह राइटर उनके बारे में पूछती है। ज़ाहिर है ऐसे में जो किताब बन कर सामने आएगी, वह
सच्ची तो हो सकती है, संपूर्ण
नहीं।
इस फिल्म के साथ भी यही हुआ है। यह तय है कि निर्देशक राजकुमार हिरानी संजू के पास यह ऑफर लेकर तो नहीं गए होंगे कि बाबा, चलो
तुम्हारी जिंदगी पर एक फिल्म बनाते हैं। ऑफर संजू (और उनकी इमेज को लेकर उनसे भी ज़्यादा सतर्क रहने वाली उनकी पत्नी मान्यता) की तरफ से आया होगा कि राजू भाई, कुछ
कीजिए न। पेशी, पनिशमेंट,
पेरोल, प्रायश्चित, पश्चाताप, सब हो गया। बस, एक
बायोपिक बन जाए जो लोगों के ज़ेहन में दस्तावेज की तरह दर्ज़ हो जाए तो मज़ा आ जाए।
Friday, 14 July 2017
रिव्यू-लुभाती है सुहाती है जग्गा की जासूसी
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
मुमकिन है यह सवाल आपके मन में भी कभी उठता हो कि कश्मीर हो, उत्तर-पूर्व या मध्य भारत का नक्सली इलाका, वहां के अलगाववादियों से लेकर दुनिया की वे तमाम जगहें, जहां हथियारबंद आतंकी मौजूद हैं, आखिर ये हथियार कोई तो पहुंचाता ही होगा। यह फिल्म ऐसे ही एक गैंग का पर्दाफाश करती है।
मुमकिन है यह सवाल आपके मन में भी कभी उठता हो कि कश्मीर हो, उत्तर-पूर्व या मध्य भारत का नक्सली इलाका, वहां के अलगाववादियों से लेकर दुनिया की वे तमाम जगहें, जहां हथियारबंद आतंकी मौजूद हैं, आखिर ये हथियार कोई तो पहुंचाता ही होगा। यह फिल्म ऐसे ही एक गैंग का पर्दाफाश करती है।Friday, 28 October 2016
रिव्यू-‘ऐ दिल है मुश्किल’ में रिश्तों का कॉकटेल
-दीपक दुआ...
(Featured in IMDb Critics Reviews)
एक हैंडसम नौजवान। मां या बाप से उसकी बनती नहीं। करना कुछ चाहता है (आमतौर पर कोई क्रिएटिव काम), मगर कर कुछ और रहा है। कोई लड़की आती है, दिल टूटता है तो उसके अंदर की रचनात्मकता की लौ ज्वाला बन कर भभक पड़ती है। रिश्तों को लेकर भी उसके मन में कन्फ्यूज़नें भरी पड़ी हैं। किसी रिश्ते को वह किसी और नजर से देखता है मगर सामने वाले के लिए वह रिश्ता कुछ और मायने रखता है। इस कहानी की एंडिंग हैप्पी या ट्रेजेडिक, कुछ भी हो सकती है।
पता नहीं रणबीर कपूर जान-बूझ कर ऐसी फिल्में करते हैं या फिल्मकार उन्हें ऐसी कहानियों में फंसा लेते हैं।
एक हैंडसम नौजवान। मां या बाप से उसकी बनती नहीं। करना कुछ चाहता है (आमतौर पर कोई क्रिएटिव काम), मगर कर कुछ और रहा है। कोई लड़की आती है, दिल टूटता है तो उसके अंदर की रचनात्मकता की लौ ज्वाला बन कर भभक पड़ती है। रिश्तों को लेकर भी उसके मन में कन्फ्यूज़नें भरी पड़ी हैं। किसी रिश्ते को वह किसी और नजर से देखता है मगर सामने वाले के लिए वह रिश्ता कुछ और मायने रखता है। इस कहानी की एंडिंग हैप्पी या ट्रेजेडिक, कुछ भी हो सकती है।
कहिए, कितनी फिल्में याद आईं? ‘वेकअप सिड’, ‘रॉकस्टार’, ‘यह जवानी है दीवानी’, ‘तमाशा’...! चलिए, इसमें और भी कुछ मिलाते हैं। ‘कल हो ना हो’, ‘कॉकटेल’ और ऐसे ही फ्लेवर वाली तमाम फिल्मों के अलावा ढेरों हिट हिन्दी फिल्मों के रेफरेंस, संवाद और गीतों के बोल डाल कर करण जौहर ने इस फिल्म का जो ढांचा खड़ा किया है, वह नया न होने के बावजूद आंखों को सुहाता है, कानों को अच्छा लगता है और कई जगह दिल को सुकून भी देता है। वैसे भी करण (और उनकी मंडली के दूसरे फिल्मकार) आंखों और कानों को सुहाती ऐसी रंग-बिरंगी, लकदक फिल्में बनाना ही ज्यादा सही समझते हैं। करण सीनियर हैं सो वह ये सब मैच्योरिटी के साथ दिखा पाते हैं।
बेहद अमीर किरदार, पल में रिश्ते बनाते, अगले पल में हमबिस्तर होते, पानी की तरह शराब पीने वाले, पीकर बहकी-बहकी मगर बेहद गहरी बातें करते, आमतौर पर अकेले, अंदर से खोखले और किसी संबल को तलाशते, मिल जाने पर उसे कस कर पकड़ने की कोशिश में लगे ऐसे किरदार हमारे आसपास भले ही ज्यादा न दिखते हों लेकिन रुपहले पर्दे पर इनकी यह दुनिया देखना ललचाता है। चमकीले चेहरों, लुभाती विदेशी लोकेशनों, भव्य शादियों, दिलों के टूटने-जुड़ने की इन कहानियों के जरिए दिखाई जाने वाली यह दुनिया और किसी को भले न भाए, युवा वर्ग इससे खासा मोहित नजर आता है।
रणबीर कपूर इस किस्म के किरदारों को कई दफा निभा चुके हैं और इस बार भी वह अपने किरदार की ऊंच-नीच को बखूबी समझते और एक्सप्रेस करते दिखे हैं। ऐश्वर्या राय बच्चन बला की खूबसूरत लगी हैं लेकिन उनका किरदार साधारण है जिसे वह सलीके से निभा ले जाती हैं। उनकी और रणबीर की जोड़ी में से कैमिस्ट्री गायब है। कमाल का काम तो अनुष्का शर्मा का है जो अपने चुलबुले किरदार को अपनी चुहल भरी अदाओं से मनभावन बना देती हैं। सच तो यह है कि जब-जब पर्दे पर अनुष्का होती हैं, फिल्म चलती दिखाई देती है वरना इंटरवल के बाद तो इसकी धीमी रफ्तार पर कोफ्त होने लगती है। संवाद अच्छे हैं लेकिन ये बहुत ज्यादा हैं। एक संवाद अंदर जाकर अभी कायदे से जज़्ब हुआ भी नहीं होता कि अगला आ जाता है। पर्दे पर घटनाएं देखने वालों को यह डायलॉगबाजी कम पसंद आएगी। फवाद खान काफी कम समय के लिए और काफी हल्के किरदार में आए हैं। फिल्म के गाने देखने और सुनने में काफी अच्छे लगते हैं। लखनऊ के एक निहायत ही उर्दूदां मुस्लिम परिवार में शादी के समय पंजाबी गाना बजाना कहानी की पृष्ठभूमि से ज्यादा बाजार की जरूरत महसूस होता है।
इस फिल्म में रिश्तों का कॉकटेल है। कॉकटेल समझते हैं न? अलग-अलग किस्म की ड्रिंक्स एक साथ, एक ही समय। हजम होता हो तो यह फिल्म देखिए। पीकर उलटी करनी हो तो फिर इससे दूरी ही भली।
अपनी रेटिंग-तीन स्टार
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