कुछ दोस्त हैं। स्कूल-कॉलेज के जमाने के। अलग-अलग रास्तों पर चल कर अपनी-अपनी मंज़िलें तलाश रहे हैं। लेकिन अपने रास्तों और अपने दिल की आवाज़ को लेकर खासे कन्फ्यूज़ भी हैं। उनके साथ हो कुछ और रहा है लेकिन इनके सपने कुछ और हैं। फिर ये लोग एक ट्रिप पर निकलते हैं और वहां इन्हें ऐसे-ऐसे एक्सपीरियंस होते हैं कि इनकी सोच, रास्ते,
मंज़िलें, सपने, सब बदल जाते हैं।
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Sunday, 30 May 2021
ओल्ड रिव्यू-‘यह जवानी है दीवानी’ और मस्तानी भी
Sunday, 30 August 2020
रिव्यू-सिनेमा की अर्थी उठाती ‘सड़क 2’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अच्छा बताइए कि आपको मुंबई से कैलाश जाना हो तो आप क्या करेंगे? अब यह मत कहिएगा कि कैलाश
तो चीन में है,
पासपोर्ट-वीज़ा लगेगा। आप यह बताइए कि जाएंगे कैसे? कम से कम दिल्ली तक तो
हवाई जहाज पकड़ेंगे न?
लेकिन नहीं हमारी हीरोइन ने मुंबई से ही कार बुक कराई है। वो भी तीन महीने पहले, ठीक उस दिन के लिए जिस
दिन के बारे में उसे पता है कि मर्डर के आरोप में जेल में बंद उसका प्रेमी बाहर आ जाएगा।
तीन महीने में...! सच्ची...! ऊपर से ये दोनों अपने साथ इतने छोटे बैग लेकर जा रहे हैं
जिनमें चार कच्छे-बनियान भी ढंग से न आएं। इससे बड़ा बैग तो दिल्ली की लड़कियां मैट्रो
ट्रेन में लेकर घूमती हैं। हां, जेल से बाहर आते समय उस उल्लू, ओह सॉरी, उस प्रेमी के हाथ में एक
गिटार और एक उल्लू का पिंजरा ज़रूर है। इस लड़की को कोई मारना चाहता है। पर जब तक अपना
टैक्सी-ड्राईवर संजू बाबा उसके साथ है, किस की मज़ाल, जो उसे छू भी सके।Friday, 7 February 2020
रिव्यू-रंगीनियों के अंधेरे में गुम ‘मलंग
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
आमतौर पर ‘मलंग’
अपनी धुन में मस्त रहने वाले लोगों को कहा जाता है। यह कहानी भी ऐसे ही कुछ लोगों की है जो अपने-आप में मस्त हैं। लेकिन एक जगह आकर इनकी राहें टकरा जाती हैं और तब शुरू होता है एक खूनी खेल। जेल से छूटा अद्वैत (आदित्य रॉय कपूर) 24 दिसंबर की रात को एक-एक करके कुछ पुलिस अफसरों को मार रहा है। क्यों...? ज़ाहिर है इसका कारण उसके अतीत में है। उसकी प्रेमिका सारा (दिशा पाटनी) बार-बार उसे याद आती है। क्यों...? पुलिस इंस्पैक्टर माइकल (माइकल)
और अगाशे (अनिल कपूर) उसे रोकने में लगे हैं। अचानक वह सैरेंडर कर देता है। क्यों...?
आमतौर पर ‘मलंग’
अपनी धुन में मस्त रहने वाले लोगों को कहा जाता है। यह कहानी भी ऐसे ही कुछ लोगों की है जो अपने-आप में मस्त हैं। लेकिन एक जगह आकर इनकी राहें टकरा जाती हैं और तब शुरू होता है एक खूनी खेल। जेल से छूटा अद्वैत (आदित्य रॉय कपूर) 24 दिसंबर की रात को एक-एक करके कुछ पुलिस अफसरों को मार रहा है। क्यों...? ज़ाहिर है इसका कारण उसके अतीत में है। उसकी प्रेमिका सारा (दिशा पाटनी) बार-बार उसे याद आती है। क्यों...? पुलिस इंस्पैक्टर माइकल (माइकल)
और अगाशे (अनिल कपूर) उसे रोकने में लगे हैं। अचानक वह सैरेंडर कर देता है। क्यों...?Sunday, 21 April 2019
रिव्यू-सिनेमा की हीरा मंडी में जन्मी एक नाजायज़ फिल्म-'कलंक'
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
प्यार, नफरत, गुस्सा, घृणा, त्याग, ममता, हास्य, वगैरह-वगैरह जैसी बहुत सारी फीलिंग्स किसी कहानी को पढ़ते-देखते समय हमारे मन में उपजती है। पर क्या आप यकीन करेंगे कि 'कलंक' देखते समय किसी किस्म का कोई भाव ही नहीं उपजता। इस कदर भावशून्य कहानी है कि फ़िल्म शुरू होने के बाद फ़िल्म से, खुद से, ज़िंदगी से भरोसा उठने लगता है। मन होता है कि थिएटर में सो जाएं, या बेहतर होगा कि ऐसी फ़िल्म देखने से तो अच्छा है, मर ही जाएं...!
प्यार, नफरत, गुस्सा, घृणा, त्याग, ममता, हास्य, वगैरह-वगैरह जैसी बहुत सारी फीलिंग्स किसी कहानी को पढ़ते-देखते समय हमारे मन में उपजती है। पर क्या आप यकीन करेंगे कि 'कलंक' देखते समय किसी किस्म का कोई भाव ही नहीं उपजता। इस कदर भावशून्य कहानी है कि फ़िल्म शुरू होने के बाद फ़िल्म से, खुद से, ज़िंदगी से भरोसा उठने लगता है। मन होता है कि थिएटर में सो जाएं, या बेहतर होगा कि ऐसी फ़िल्म देखने से तो अच्छा है, मर ही जाएं...!Friday, 13 January 2017
रिव्यू-ओके ‘जानू’ टाटा बाय बाय...!
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
आज की युवा पीढ़ी। एक तरफ रिश्ते दूसरी तरफ कैरियर। एक तरफ प्यार दूसरी तरफ सपने।
इससे जुड़ें या उसको लपकें। इससे बंधें या उस तरफ दौड़ लगाएं।
आज की युवा पीढ़ी। एक तरफ रिश्ते दूसरी तरफ कैरियर। एक तरफ प्यार दूसरी तरफ सपने।
इससे जुड़ें या उसको लपकें। इससे बंधें या उस तरफ दौड़ लगाएं।युवाओं की इस कन्फ्यूजन
को लेकर अब तक 256 दफा तो फिल्में बन ही चुकी होंगी। तो फिर इस फिल्म में नया क्या
है? जवाब है-कुछ नहीं। कुछ तो नया होगा-कहानी, पटकथा,
प्रेजेंटेशन,
भावनाएं,
सीख,
सैटअप...?
अजी बोला न-कुछ भी नया
नहीं है इसमें।
इससे पहले शाद अली मणिरत्नम निर्देशित तमिल फिल्म ‘अलाइपायुदे’
को हिन्दी में ‘साथिया’
नाम से बना चुके हैं। ये
दोनों ही फिल्में उम्दा थीं। लेकिन ‘ओके जानू’
मणिरत्नम की जिस ‘ओ काधल कनमणि’
पर बनी है वह हिट होने
के बावजूद कोई बहुत बेहतरीन फिल्म नहीं थी। शाद ने या इसके निर्माताओं करण जौहर और
मणिरत्नम ने इसमें हिन्दी के दर्शकों के लिए क्या खास देख कर इसके रीमेक के लिए जुगत
लड़ाई, यह वही बेहतर बता सकते हैं।
‘हम दोस्ती करेंगे, सैक्स करेंगे,
लेकिन एक-दूसरे पर हक नहीं
जताएंगे और शादी नहीं करेंगे’ का नारा बुलंद करके एक-दूसरे के
करीब आने वाले लड़के-लड़की के बीच प्यार उपजने और फिर शादी करने की बासी कढ़ी को यहां
धीमी आंच पर उबाला गया है। बस, यही धीमी आंच ही इस फिल्म की सबसे
बड़ी दुश्मन है जो इस कढ़ी को कायदे से उबलने ही नहीं देती। फिल्म इस कदर सपाट है कि
थोड़े ही वक्त के बाद इससे उकताहट होने लगती है। बीच-बीच में होठों पर हल्की मुस्कुराहटें
जरूर आती रहती हैं और एक बड़ी बात यह भी कि यह फिल्म कहीं फूहड़ नहीं होती,
सिवाय ‘हम्मा हम्मा...’
वाले उस गाने के जिसमें
आदित्य और श्रद्धा ने बेहद घटिया डांस किया है। मणिरत्नम की ही ‘बाॅम्बे’
में ए.आर. रहमान के बनाए
‘हम्मा हम्मा...’ वाले गाने को इतने घटिया तरीके
से रीमिक्स करने की बजाय यहां जस का तस रख दिया जाता तो कहीं बेहतर होता।
आदित्य राय कपूर और श्रद्धा कपूर की लव-स्टोरी से बेहतर तो पर्दे पर नसीरुद्दीन
शाह और लीला सैमसन की प्रेम-कहानी लगती है। इन दोनों ने काम भी बहुत खूब किया है। प्यारे
तो आदित्य और श्रद्धा भी लगे हैं लेकिन इनके किरदारों में ही दम नहीं था तो ये बेचारे
उसमें कहां से जान डालते। गुलजार-रहमान की जोड़ी का बनाया गीत-संगीत भी साधारण रहा है
और एक-दो को छोड़ बाकी गाने आकर कहानी की पहले से ही धीमी रफ्तार को और मंद करते हैं।
साल की इस पहली बड़ी फिल्म पर पैसे और वक्त लगाने की बजाय इसे दूर से ही ओके,
टाटा,
बाय-बाय करने में ही समझदारी
होगी।
अपनी रेटिंग-दो स्टार
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