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Friday, 17 November 2017

रिव्यू-दिल जीतती ‘तुम्हारी सुलु’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
सुलोचना बारहवीं फेल है। बैंक में काम करने वाली कामयाबबहनों की इस छोटी बहन के पति की सीमित आमदनी है। लेकिन वह अपने घर-परिवार में खा-पीकर मस्त रहती है। साथ वाले फ्लैट में रहती एयरहोस्टेस लड़कियों को देख कर उसकी आंखों में भी चमकीले सपने तैरते हैं। उसे जीतना आता है। मैं कर सकती हैऔर मुझे हर काम में मजा आता हैजैसा उसका एटिट्यूड उसे चैन से नहीं बैठने देता। इसलिए कभी वह कॉलोनी की गायन-प्रतियोगिता में तो कभी नींबू-चम्मच रेस में तो कभी रेडियो पर पूछे जाने वाले सवाल का जवाब दे कर इनाम और इज्जत हासिल करती रहती है। ऐसे में सुलोचना को मिल जाता है रेडियो पर एक लेट-नाइट शो में काम करने का ऑफर, और वह बन जाती है लोगों की रातों को जगाने, उनके सपनों को सजाने वाली आर.जे. सुलु। पर क्या उसका परिवार उसके इस रूप को स्वीकार कर पाता है?

इस कहानी में कुछ भी फिल्मी-सा नहीं है। सुलोचना जैसी औरतें हमारे घर-परिवार-पड़ोस में अक्सर दिख जाती हैं जो जिंदगी में करना तो बहुत कुछ चाहती हैं लेकिन हालात उन्हें चूल्हे-चौके तक सीमित कर के रख देते हैं। पर कभी मौका मिले तो ये औरतें कुछ कुछ हटके वाला काम कर ही जाती हैं। पड़ोस के किसी घर की-सी लगती इस कहानी में सब कुछ सामान्य है। अभावों में हंस-खेल कर जीता परिवार, घर, परिवार, नौकरी, बच्चे की पढ़ाई की चिकचिक, बाहर वालों से मिलती तारीफों के बीच अपनों के तानें... ऐसी स्क्रिप्ट लिखने के लिए लेखक को अपने लेखक वाले खोल से बाहर निकल कर आम इंसान होना होता है और सुरेश त्रिवेणी विजय मौर्य ने यह बखूबी कर दिखाया है। फिर इस फिल्म में बोली गई जुबान चौंकाती है। मुंबइया परिवारों में लोग किस तरह से बात करते हैं, उसे करीब से परख कर इसमें परोसा गया है।

लेकिन फिल्म कमियों से भी परे नहीं है। शुरूआत में उठान भरती कहानी बाद के पलों में दोहराव और बिखराव का शिकार होने लगती है। कुछ चीजें अखरने लगती हैं और कहानी के बहाव में रही दिक्कत भी साफ महसूस होती है। दो घंटे बीस मिनट की इसकी लंबाई अच्छा-खासा एडिट मांगती है।

 
सुरेश त्रिवेणी बतौर निर्देशक अपनी इस पहली फिल्म से असर छोड़ते हैं। गीत-संगीत फिल्म के माहौल में फिट है। एक्टिंग के मामले में जहां विद्या बालन हर बार की तरह प्रभावित करती हैं वहीं नेहा धूपिया भी चौंकाती हैं। बल्कि अंत के एक सीन में तो वह विद्या पर भारी पड़ती हैं। मानव कौल ने जिस तरह से खुद को अंडरप्ले करते हुए विद्या के पति के किरदार को निभाया है, वह तारीफ के हकदार हैं। विजय मौर्य ने खुद को इतना हल्का रोल क्यों दिया? वह कमाल के एक्टर हैं और हम उन्हें और ज्यादा देखना चाहते हैं। विद्या की बड़ी बहनों के किरदार में आईं सीमा तनेजा और सिंधु शेखरन का काम जानदार है

सुलु आपकी रातों को भले जगाए, आपके सपनों को भले सजाए लेकिन वह आपको निराश नहीं करती है। फिल्म खत्म हो और आपका मन दो-चार ताली बजाना चाहे तो खुद को रोकिएगा नहीं। रियल सिनेमा को इससे ताकत ही मिलेगी।
अपनी रेटिंग-तीन स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)

Friday, 25 November 2016

रिव्यू-पड़िए ‘मोह माया’ में, बचाइए मनी

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक महानगर। जल्दी-जल्दी बहुत कुछ हासिल कर लेने की दौड़ में आपसी रिश्तों की उष्मा भूलते लोग। लंबा हाथ मारने के चक्कर में हुई एक गलती को छुपाने की खातिर गलतियों पर गलतियां। अंत सब को पता ही है-बुरे काम का बुरा नतीजा।

फिल्मों के अलावा टी.वी. के क्राइम पैट्रोलया सनसनीकिस्म के प्रोग्रामों के हर दूसरे एपिसोड में यही तो कहानी होती है। रोज़ाना सुबह अखबारों की सुर्खियों में भी ऐसी दो-एक कहानियां मिल ही जाती हैं। तो, इस फिल्म में नया क्या है? जवाब है-कुछ नहीं।

एक बहुत ही सामान्य कहानी पर बुनी गई यह फिल्म महानगरों में अकेले रह रहे जोड़ों की जिंदगी की रोजमर्रा की भागदौड़, उनके ऊंचे सपनों, उन सपनों को सच करने की कोशिश में पीछे छूटते अपनों, किसी मकसद को पूरा करने के लिए बनते नए रिश्तों और ठंडे पड़ते करीबी संबंधों को विस्तार से दिखाती है। लेकिन इसे बेवजह जटिल भी बनाया गया है। जिस किस्म की समझदारी इस तरह की स्क्रिप्ट में चाहिए होती है, वह इसमें कम दिखाई देती है। यही कारण है कि सिर्फ एक घंटे 50 मिनट की इसकी लंबाई भी खिंचती-सी मालूम होती है। इसकी कहानी में आगे आने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान दर्शक को बांध कर रख पाने में विफल रहता है।

निर्देशक मुनीष भारद्वाज दिल्ली शहर के मिजाज को भी इस कहानी का हिस्सा बना पाने में कामयाब रहे हैं। रणवीर शौरी बहुत ही आसानी से अपने किरदार को आगे ले जाते हैं। मिडल क्लास से छुटकारा पाने की तड़प, इसके लिए हर गलत काम को सहजता से करते जाने और दुख, पछतावे, गुस्से, बेबसी जैसे भावों का वह बेहतरीन ढंग से इजहार कर पाते हैं। नेहा धूपिया भी अपने किरदार में जंची हैं लेकिन रणवीर के सामने वह फीकी पड़ जाती हैं। छोटे-से रोल में आईं विदुषी मेहरा प्रभावित करती हैं। फिल्म में कोई गाना नहीं है।

इस तरह की कहानी अगर रोचक तरीके से बनाई जाए तो वह बड़े पर्दे के लायक नहीं रहती। इसी में अगर थ्रिल, एक्शन और कॉमेडी के क्षण होते तो यह ज्यादा पकड़ बना पाती। फिलहाल तो यह टी.वी. के किसी क्राइम शो का एपिसोड सरीखी लग रही है जिसके लिए थिएटर तक जाने की जरूरत महसूस करते हों तो जाइए, वरना मोह-माया में पड़ कर अपनी मनी बचाइए।
अपनी रेटिंग-2 स्टार