-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘प्रहार’ में नाना पाटेकर कोर्ट से पूछते हैं-‘देश का मतलब क्या है? सड़कें, इमारतें, खेत-खलिहान, नदियां, पहाड़, बस इतना ही? और लोग, लोग कहां हैं?’
सच तो यह है कि देश की बात करते समय हुकूमतों ने कभी लोगों के बारे में सोचा ही नहीं। हमेशा देश के नाम पर जमीन के टुकड़ों को जीतने, कब्जाने और बांटने की ही बातें हुईं। सत्तर बरस पहले भी यही हुआ था जब चंद ‘अक्लमंदों’ ने लोगों की परवाह न करते हुए जमीन का बंटवारा कर मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी को जन्म दिया था। अंग्रेजी अफसर रेडक्लिफ ने कागज पर बने नक्शे पर अपनी जिस ‘नौसिखिया’ कलम से लकीर खींच कर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान नाम के दो मुल्क तक्सीम कर दिए थे वहां के लोगों को आखीर तक यकीन था कि पंडित जी ऐसा नहीं होने देंगे या जिन्ना इसे नहीं मानेंगे। लेकिन बंटवारा हुआ और सड़कें, इमारतें, खेत-खलिहान, नदियां, पहाड़ सब बांट दिए गए। हां, लोगों की परवाह तब भी किसी ने नहीं की। यह फिल्म ऐसे ही चंद लोगों के बारे में है। लोग भी कौन-से, एक कोठे में रहने वाली चंद औरतें जिन्हें पाना तो हर कोई चाहता है, अपनाना नहीं।

