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Saturday, 16 May 2020

ओल्ड रिव्यू-सच के जुदा चेहरे दिखाती ‘तलवार’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
15-16 मई, 2008 की उस रात दिल्ली से सटे नोएडा के जलवायु विहार के उस फ्लैट में सचमुच क्या हुआ था, यह या तो मरने वाले जानते थे या मारने वाले जानते हैं। सालों तक चली तहकीकात में कुछ भी सामने नहीं आया। या फिर आने नहीं दिया गया? कहते हैं कि सच के कई चेहरे होते हैं। 14 साल की आरुषि और उसके अधेड़ उम्र नौकर हेमराज के कत्ल के बाद ऐसे कई चेहरे सामने आए और जिस को जो चेहरा माफिक लगा, उसने उसी को अपना लिया। इस फिल्म के आने से पहले क्राइम जर्नलिस्ट अविरूक सेन की किताब आरुषिको पढ़ने के बाद यह उम्मीद जगी थी कि थोड़ी-सी मेहनत और की गई होती तो इस केस का चेहरा कुछ और होता और काफी मुमकिन है कि अपनी ही मासूम बेटी और अधेड़ नौकर के कत्ल का आरोप झेल रहे तलवार दंपती बेदाग होते।

Monday, 15 October 2018

रिव्यू-सिनेमाई खज़ाने की चाबी है ‘तुम्बाड’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
दुनिया में हर एक की ज़रूरत पूरी करने का सामान है, लेकिन किसी का लालच पूरा करने का नहीं।महात्मा गांधी के इस कथन से शुरू होने वाली यह फिल्म अपने पहले ही सीन से आपको एक ऐसी अनोखी दुनिया में ले चलती है जो इससे पहले किसी हिन्दी फिल्म में तो क्या, शायद किसी भारतीय फिल्म में भी कभी नहीं दिखी होगी। महाराष्ट्र का एक वीरान गांव-तुम्बाड, जहां हर वक्त बारिश होती रहती है क्योंकि देवता क्रोधित हैं। इसलिए कि पूरी धरती को अपनी कोख से जन्म देने वाली देवी ने अपनी सबसे पहली संतान हस्तर को उनके हाथों मरने से बचा लिया था। वही लालची हस्तर, जो देवी के एक हाथ से बरसते सोने को तो ले गया लेकिन देवताओं ने उसे दूसरे हाथ से बरसते अनाज को नहीं ले जाने दिया। उसी हस्तर के मंदिर के पुजारियों के परिवार में भी दो तरह की संतानें हुईं-लालची और संतुष्ट। 1913 के साल में ये लोग यहां से चले तो गए लेकिन लालची विनायक लौटता रहा और हस्तर के खज़ाने से अपनी जेबें भर-भर ले जाता रहा। उसने अपने बेटे को भी सिखाया कि यह खज़ाना कैसे हाथ लगता है। लेकिन विनायक अपनी दादी की कही यह बात भूल गया कि-विरासत में मिली हुई हर चीज़ पर दावा नहीं करना चाहिए।

Sunday, 17 September 2017

रिव्यू-जा ‘सिमरन’ जा, जीने दे हमें चैन से

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
एक लड़की थी दीवानी-सी। अमेरिका में वह रहती थी। पैसे की जरूरत होती जब उसे, बैंक वह लूटा करती थी।

बॉम्बशैल बैंडिटयानी संदीप कौर की उसी कहानी पर बनी इस फिल्म से हंसल मेहता जैसे बड़े निर्देशक और कंगना रनौत जैसी अदाकारा का नाम जुड़ा देख कर हर कोई इसकी तरफ उम्मीदों से देख रहा था। लेकिन ये उम्मीदें उस वक्त चकनाचूर हो जाती हैं जब आप पाते हैं कि फिल्म की कहानी का कोई ओर-छोर नहीं है। सिर्फ कंगना की पब्लिक में बन चुकी और इंडस्ट्री में बनाई जा रही सैल्फमेड क्वीनवाली इमेज को और पुख्ता करने और भुनाने के इरादे से बेसिर-पैर की अतार्किक घटनाएं दिखा कर एक ऐसी स्क्रिप्ट खड़ी की गई है जो किसी भी नजरिए से तो किसी किस्म का मनोरंजन करती है, कोई मैसेज देती है, कुछ ठोस दिखाती है और ही कुछ कह पाती है। बल्कि इसे देख कर यह सवाल मन में आता है कि यह फिल्म बनाई ही क्यों गई?

अमेरिका में मां-बाप के साथ बढ़िया मकान में रह रही लड़की को अपना घर चाहिए ही क्यों? उसे तलाकशुदा दिखाने का मकसद क्या था? उसके तेवर बेवजह बागी क्यों हैं? ये बगावत गुंडों के सामने कहां चली जाती है। दूसरों से हमेशा वह बेइज्जती करने वाले अंदाज में ही क्यों बतियाती है? वहां बैंकों के बाहर कैमरे नहीं होते क्या? मुमकिन है अमेरिकी बैंकों में बेवकूफ काम करते हों लेकिन भारतीय सिनेमाघरों में भी उतने ही बड़े बेवकूफ बैठे हैं, यह हंसल मेहता और उनके लेखक अपूर्व असरानी ने कैसे सोच लिया?

आप चाहें तो कंगना की डायलॉग डिलीवरी की गलतियों पर ध्यान दिए बिना उन्हें पसंद कर सकते हैं। डायरेक्टर को सहयोगी भूमिकाओं में कोई दमदार कलाकार नहीं मिले क्या? गाने ठस्स हैं जो लगातार गलत काम कर रही नायिका की तारीफें किए जा रहे हैं।

भीतर कंगना के प्रति प्यार बहुत उछाले मार रहा हो और अपनी जिंदगी को खुशगवार ढंग से जीना हो तो इस सिमरनको जाने दीजिए, जितना दूर हो सके...
अपनी रेटिंग-डेढ़ स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपनी वेबसाइट सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)