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Saturday, 22 December 2018

रिव्यू-धुएं की लकीर छोड़ती 'ज़ीरो'

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पहले ही सीन में जब मेरठ का बउआ सिंह अखबार की  एक खबर सुनाने के एवज में अपने दोस्तों पर 500 रुपए के नोटों की पूरी गड्डी लुटा देता है तो पता चल जाता है कि आप एक 'फिल्म' देखने आए हैं। फिल्म-जिसका वास्तविकता से कोई नाता नहीं होता, वही वास्तविकता जो निर्देशक आनंद एल. राय और लेखक हिमांशु शर्मा की जोड़ी अपनी कई फिल्मों में देकर तारीफें और कामयाबी बटोर चुकी है। लेकिन इस बार इन्हें सुपरस्टार शाहरुख खान का साथ मिला है और अफसोस, कि इन जैसे लोग भी स्टार वाली चुंधियाहट से बच न सके। वैसे, फिल्म की कहानी 'फिल्मी' होते हुए भी बुरी नहीं है। बल्कि इस कहानी के 'हटके' होने की तारीफ होनी चाहिए और इस पर फिल्म बनाने और उसमें काम करने का जोखिम उठाने के लिए शाहरुख खान की उससे भी ज़्यादा। लेकिन 'हटके' वाली कहानियों के लिए जिस तरह की 'हटके' वाली स्क्रिप्ट की दरकार होती है, वो इस फिल्म में नहीं है और इसके लिए कसूरवार आनंद व हिमांशु की जोड़ी को ही ठहराया जाना चाहिए। कमाल यह नहीं कि आनंद, हिमांशु और शाहरुख पहली बार साथ आए हैं, कमाल तो यह है कि ये तीनों साथ आ कर भी वो कमाल नहीं कर पाए हैं, जिसकी इनसे उम्मीद थी।

Monday, 15 October 2018

रिव्यू-सिनेमाई खज़ाने की चाबी है ‘तुम्बाड’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
दुनिया में हर एक की ज़रूरत पूरी करने का सामान है, लेकिन किसी का लालच पूरा करने का नहीं।महात्मा गांधी के इस कथन से शुरू होने वाली यह फिल्म अपने पहले ही सीन से आपको एक ऐसी अनोखी दुनिया में ले चलती है जो इससे पहले किसी हिन्दी फिल्म में तो क्या, शायद किसी भारतीय फिल्म में भी कभी नहीं दिखी होगी। महाराष्ट्र का एक वीरान गांव-तुम्बाड, जहां हर वक्त बारिश होती रहती है क्योंकि देवता क्रोधित हैं। इसलिए कि पूरी धरती को अपनी कोख से जन्म देने वाली देवी ने अपनी सबसे पहली संतान हस्तर को उनके हाथों मरने से बचा लिया था। वही लालची हस्तर, जो देवी के एक हाथ से बरसते सोने को तो ले गया लेकिन देवताओं ने उसे दूसरे हाथ से बरसते अनाज को नहीं ले जाने दिया। उसी हस्तर के मंदिर के पुजारियों के परिवार में भी दो तरह की संतानें हुईं-लालची और संतुष्ट। 1913 के साल में ये लोग यहां से चले तो गए लेकिन लालची विनायक लौटता रहा और हस्तर के खज़ाने से अपनी जेबें भर-भर ले जाता रहा। उसने अपने बेटे को भी सिखाया कि यह खज़ाना कैसे हाथ लगता है। लेकिन विनायक अपनी दादी की कही यह बात भूल गया कि-विरासत में मिली हुई हर चीज़ पर दावा नहीं करना चाहिए।

Friday, 14 September 2018

रिव्यू-‘प्यार’ और ‘फ्यार’ के बीच झूलती ‘मनमर्ज़ियां’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
छोटे शहर की बोल्ड-बिंदास लड़की। अपने बॉय-फ्रैंड के साथ मौज-मज़े करती लड़की। दुनिया भर से पंगा लेती, भिड़ती लड़की। विदेश से शादी करने आया एक सीधा लड़का। आते ही उसे भा गई यह लड़की। उसकी हकीकत जान कर भी उससे शादी करने को तुला लड़का। (तनु वैड्स मनुयाद रही है...?) मर्ज़ी होते हुए भी लड़की ने कर ली इस सीधे लड़के से शादी। लड़की अब भी बगावती तेवर अपनाए हुए है और लड़का उसका दिल जीतने में लगा है। यहां तक कि लड़की की खुशी के लिए वह उसे छोड़ने को भी तैयार हो जाता है। (हम दिल दे चुके सनमयाद रही है...?) इस कहानी को बनाया है अनुराग कश्यप ने जो इससे पहले भी देव डीमें एक प्रेम-त्रिकोण दिखा चुके हैं। तो जनाब, कुल मिला कर मामला यह कि कहानी है हम दिल दे चुके सनमवाली, सैटअप है तनु वैड्स मनुवाला और ट्रीटमैंट है देव डीवाला। कुछ इस तरह से की हैं अनुराग ने मनमर्ज़ियां। अब की हैं, तो की हैं।

Friday, 19 August 2016

रिव्यू-भाग कर जाइए ‘हैप्पी’ हो जाइए

-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
करीब साढ़े छह बरस पहले आई अपनी पहली फिल्म दूल्हा मिल गयामें औंधे मुंह गिरने के बाद निर्देशक मुदस्सर अज़ीज़ अपनी इस दूसरी फिल्म में सिर्फ संभले हैं बल्कि सधी हुई चाल चलते हुए दर्शकों के दिलों में जगह बनाने में भी कामयाब हुए हैं।

अमृतसर की हैप्पी अपने प्रेमी से शादी करने के लिए अपनी शादी से भागी तो गलती से लाहौर जा पहुंची और वह भी वहां के एक नामी नेता के घर में। नेता का बेटा कैसे उसके प्रेमी को पाकिस्तान लाता है और कैसे उन दोनों की शादी करवाता है, यही भागमभाग है इस कहानी में।