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Friday, 23 July 2021

रिव्यू-ऑनर बचाते गांठें खोलते ‘14 फेरे’

जब ऑनर (मान) ही बच गया तो फिर काहे की किलिंग...?’
दूसरी जात के लड़के से शादी कर रही लड़की जब अपने पिता से यह पूछती है तो पिता को कोई जवाब नहीं सूझता। देखा जाए तो यही रास्ता अपना कर हमारा आज का समाज भी दूसरी जात वालों को अपना रहा है। वरना कुछ समय पहले तक जहां अलग-अलग जाति के लड़का-लड़की घर से भाग कर शादी करते थे वहीं आज ऐसी बहुत सारी शादियां दोनों परिवारों की रज़ामंदी से होने लगी हैं ताकि दोनों तरफ का ऑनर बचा रहे।

Saturday, 16 January 2021

रिव्यू-चौथे पर ही निबट जाती है ‘रामप्रसाद की तेहरवीं’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
रामप्रसाद जी सिधार गए। अब उनके चारों बेटे, बहुएं, दोनों बेटियां, दामाद, उन सब के बच्चे, मामा, ताऊ, अलां-फलां पहुंचे हैं लखनऊ। अब आएं हैं तो तेहरवीं तक भी रुकेंगे ही। वैसे कभी इन्होंने रिश्तों को गर्माहट दी लेकिन अब इन्हें फिक्र है पैसों की, कर्जे की, दुकान-मकान की और मां को कौन रखे, इसकी। अब तेरह दिन साथ रहेंगे और दो नई बातें होंगी तो चार पुरानी भी खोदी ही जाएंगी। उलझे हुए रिश्तों की सलवटें भी सामने आएंगी और मुमकिन है कि कुछ सुलझ ही जाए, कोई टूटा तार जुड़ कर इनकी ज़िंदगी के सुर सही बिठा ही दे।