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Friday, 23 July 2021

रिव्यू-ऑनर बचाते गांठें खोलते ‘14 फेरे’

जब ऑनर (मान) ही बच गया तो फिर काहे की किलिंग...?’
दूसरी जात के लड़के से शादी कर रही लड़की जब अपने पिता से यह पूछती है तो पिता को कोई जवाब नहीं सूझता। देखा जाए तो यही रास्ता अपना कर हमारा आज का समाज भी दूसरी जात वालों को अपना रहा है। वरना कुछ समय पहले तक जहां अलग-अलग जाति के लड़का-लड़की घर से भाग कर शादी करते थे वहीं आज ऐसी बहुत सारी शादियां दोनों परिवारों की रज़ामंदी से होने लगी हैं ताकि दोनों तरफ का ऑनर बचा रहे।

Tuesday, 2 October 2018

मिलिए ‘सुई धागा’ की अम्मा यामिनी दास से

-दीपक दुआ...
हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म सुई धागाके तमाम कलाकारों की तारीफें हो रही हैं। उन कलाकारों की भी जिनके नाम तक से लोग अनजान हैं। इस फिल्म में मौजी यानी वरुण धवन की अम्मा बनीं अदाकारा को देख कर लगता है कि यू.पी. के किसी कस्बे के किसी आम परिवार की अम्मा ऐसी ही तो होती हैं। इस फिल्म का रिव्यू करते समय इस अदाकारा के बारे में पड़ताल की तो पता चला कि उनका नाम यामिनी दास है और... और बस। लेकिन रिव्यू पोस्ट किया तो यामिनी दास से जुड़ना हो गया। उनसे जुड़े तो ढेरों बातें हुईं। पहले तो उन्होंने मेरे रिव्यू (रिव्यू-‘सुई धागा’ में सब बढ़िया है) की तारीफ की और जब उन्हें पता चला कि मैं फिल्मी कलियांजैसी फिल्म-पत्रिका से बरसों तक जुड़ा रहा हूं तो वह बहुत खुश हुई।


उसके बाद मुझे यामिनी के बारे में जो पता चला उसे जान कर मुझे तो हैरानी हुई ही, आपको भी होगी कि यामिनी मशहूर ग़ज़ल-गायक चंदन दास की पत्नी हैं, कि वो अभिनेता नमित दास (जो सुई धागामें गुड्डू बने हैं) की मां हैं और सबसे बड़ी बात यह कि सुई धागायामिनी की पहली फिल्म है।

Saturday, 29 September 2018

रिव्यू-‘सुई धागा’ में सब बढ़िया है

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दिल्ली से सटा यू.पी. का कोई कस्बा। एक बिल्कुल ही आम परिवार। अभावों से जूझता। रहने को ढंग की जगह, सुविधाएं, जेब भर पैसा, कायदे का काम। फिर भी सब बढ़िया है। बीवी ममता के कहने पर मौजी भैया नौकरी छोड़ कर लग गए अपना ही कुछकरने। ढेरों अड़चनें आईं। कुछ अपनों ने साथ छोड़ा तो कुछ परायों ने हाथ बंटाया। लेकिन हिम्मत हारी दोनों ने और जुटे रहे। अंत में तो इन्हें जीतना ही हुआ।

अभावग्रस्त और बिल्कुल नीचे से उठ कर कुछ बड़ा हासिल करने की अंडरडॉगकिस्म की कहानियां दर्शकों को हमेशा से लुभाती रही हैं। लेकिन यह कहानी सिर्फ मौजी और ममता की ही नहीं है। उनकी हिम्मत, संघर्ष, मेहनत से कुछ बड़ा हासिल करने की ही नहीं है। बल्कि यह अपने भीतर और भी बहुत कुछ ऐसा समेटे हुए है जिसके बारे में मुख्यधारा का सिनेमा आमतौर पर बात नहीं करता है। या कहें कि बॉक्स-ऑफिस के समीकरण उसे ऐसा करने से रोकते हैं।