‘प्रहार’ के अंत में मेजर चव्हाण कहते हैं कि देश का मतलब क्या है?
नदियां, पहाड़, सड़कें, इमारतें बस। और लोग कहां हैं?
आशुतोष गोवारीकर की यह फिल्म इन्हीं लोगों के बारें में बात करती है,
हम लोगों के बारे में बात करती है। वह बात करती है जिसे करना बॉक्स-ऑफिस की नज़र से जोखिम भरा हो सकता है लेकिन एक प्रतिबद्ध और जागरूक फिल्मकार और नागरिक के तौर पर ऐसी बातें होनी चाहिएं, होती रहनी चाहिएं।
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Saturday, 11 July 2020
ओल्ड रिव्यू-देस की बात, लोगों की बात ‘स्वदेस’ में
‘प्रहार’ के अंत में मेजर चव्हाण कहते हैं कि देश का मतलब क्या है?
नदियां, पहाड़, सड़कें, इमारतें बस। और लोग कहां हैं?
आशुतोष गोवारीकर की यह फिल्म इन्हीं लोगों के बारें में बात करती है,
हम लोगों के बारे में बात करती है। वह बात करती है जिसे करना बॉक्स-ऑफिस की नज़र से जोखिम भरा हो सकता है लेकिन एक प्रतिबद्ध और जागरूक फिल्मकार और नागरिक के तौर पर ऐसी बातें होनी चाहिएं, होती रहनी चाहिएं।Monday, 13 April 2020
ओल्ड रिव्यू-सच और साहस की कहानी ‘लगान'
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अपने पिछले आलेख (यहां क्लिक करें) में मैंने 15 जून, 2001 को ‘लगान’ देखने और उस पर लिखी सत्यजित भटकल की किताब का उल्लेख किया था। इस किताब का हिन्दी अनुवाद वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज जी ने किया था और दिसंबर,
2019 में उसकी एक प्रति मुझे उपहार में दी थी। अब प्रस्तुत है जून, 2001 में लिखी ‘लगान’ की मेरी समीक्षा जो उस दौर की लोकप्रिय फिल्म मासिक पत्रिका ‘चित्रलेखा’
के मेरे कॉलम ‘इस माह के शुक्रवार’ में छपी थी। पढ़िए ज़रा और बताएं कि बरसों पहले लिखी वह समीक्षा आज कहां ठहरती है।
अपने पिछले आलेख (यहां क्लिक करें) में मैंने 15 जून, 2001 को ‘लगान’ देखने और उस पर लिखी सत्यजित भटकल की किताब का उल्लेख किया था। इस किताब का हिन्दी अनुवाद वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज जी ने किया था और दिसंबर,
2019 में उसकी एक प्रति मुझे उपहार में दी थी। अब प्रस्तुत है जून, 2001 में लिखी ‘लगान’ की मेरी समीक्षा जो उस दौर की लोकप्रिय फिल्म मासिक पत्रिका ‘चित्रलेखा’
के मेरे कॉलम ‘इस माह के शुक्रवार’ में छपी थी। पढ़िए ज़रा और बताएं कि बरसों पहले लिखी वह समीक्षा आज कहां ठहरती है।किताब-‘ऐसे बनी लगान’-एक असंभव फिल्म के बनने की अद्भुत दास्तान
-दीपक दुआ...
15 जून,
2001-शुक्रवार। दिल्ली के प्लाज़ा सिनेमा में दोपहर 12 बजे के शो में फिल्म समीक्षकों को ‘गदर-एक प्रेमकथा’ दिखाई गई। थिएटर के बाहर-भीतर की भीड़, फिल्म देख कर निकले दर्शकों के उत्साह और खुद अपने आकलन से यह तय हो चुका था कि हम अभी-अभी एक ऐसी फिल्म देख कर निकले हैं जो न सिर्फ सुपरहिट होने जा रही है बल्कि आने वाले कई दशकों तक इसे देखा और याद किया जाएगा। बावजूद इसके हमें इंतज़ार था ‘शीला’ सिनेमा में साढ़े चार बजे शुरू होने वाले ‘लगान’ के शो का। अपनी पौने तीन घंटे की लंबाई के चलते आम फिल्मों की तरह एक दिन में चार नहीं बल्कि तीन शो में चल रही यह फिल्म निर्माता के तौर पर आमिर खान की पहली फिल्म थी। फिल्म के बारे में कई साल से चर्चाएं हो रही थीं और छन-छन कर जो कहानियां बाहर आई थीं उनसे साफ था कि यह हिन्दी सिनेमा की चंद अनोखी, अकल्पनीय फिल्मों में से होगी। कैसी होगी, यही देखना था। हालांकि इससे करीब पांच महीने पहले आमिर ‘मेला’
जैसी घटिया और नाकाम फिल्म दे चुके थे लेकिन ‘लगान’ के प्रति फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया और दर्शकों में ज़बर्दस्त उत्साह था। खुद मेरे मन में आमिर की छवि के चलते यह उम्मीद जवां थी कि चाहे कुछ हो,
‘लगान’ एक उम्दा फिल्म ज़रूर होगी। उसी शाम ‘शीला’ सिनेमा में इस बात की पुष्टि भी हो गई।
15 जून,
2001-शुक्रवार। दिल्ली के प्लाज़ा सिनेमा में दोपहर 12 बजे के शो में फिल्म समीक्षकों को ‘गदर-एक प्रेमकथा’ दिखाई गई। थिएटर के बाहर-भीतर की भीड़, फिल्म देख कर निकले दर्शकों के उत्साह और खुद अपने आकलन से यह तय हो चुका था कि हम अभी-अभी एक ऐसी फिल्म देख कर निकले हैं जो न सिर्फ सुपरहिट होने जा रही है बल्कि आने वाले कई दशकों तक इसे देखा और याद किया जाएगा। बावजूद इसके हमें इंतज़ार था ‘शीला’ सिनेमा में साढ़े चार बजे शुरू होने वाले ‘लगान’ के शो का। अपनी पौने तीन घंटे की लंबाई के चलते आम फिल्मों की तरह एक दिन में चार नहीं बल्कि तीन शो में चल रही यह फिल्म निर्माता के तौर पर आमिर खान की पहली फिल्म थी। फिल्म के बारे में कई साल से चर्चाएं हो रही थीं और छन-छन कर जो कहानियां बाहर आई थीं उनसे साफ था कि यह हिन्दी सिनेमा की चंद अनोखी, अकल्पनीय फिल्मों में से होगी। कैसी होगी, यही देखना था। हालांकि इससे करीब पांच महीने पहले आमिर ‘मेला’
जैसी घटिया और नाकाम फिल्म दे चुके थे लेकिन ‘लगान’ के प्रति फिल्म इंडस्ट्री, मीडिया और दर्शकों में ज़बर्दस्त उत्साह था। खुद मेरे मन में आमिर की छवि के चलते यह उम्मीद जवां थी कि चाहे कुछ हो,
‘लगान’ एक उम्दा फिल्म ज़रूर होगी। उसी शाम ‘शीला’ सिनेमा में इस बात की पुष्टि भी हो गई।Friday, 6 December 2019
रिव्यू-ज़ंग लगे हथियारों वाली ‘पानीपत’ की जंग
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
इतिहास के पन्नों से निकली किसी कहानी को फिल्मी पर्दे पर उतारना आसान नहीं होता। ‘जोधा अकबर’ में इस काम को साध चुके आशुतोष गोवारीकर ‘खेलें हम जी जान से’ और ‘मोहेंजो दारो’ में नाकामी झेलने के बाद अगर फिर से इतिहास के समंदर में कूदे हैं तो उनके साहस की तारीफ होनी चाहिए। भले ही इस बार भी उनके हाथ में सच्चा मोती न लगा हो लेकिन उन्होंने निराश भी नहीं किया है। सच तो यह है कि इस फिल्म को फिल्म की बजाय इतिहास के किसी अध्याय की तरह देखा जाए तो यह उस दौर के माहौल की तस्वीर उकेर पाने में कामयाब दिखती है।
इतिहास के पन्नों से निकली किसी कहानी को फिल्मी पर्दे पर उतारना आसान नहीं होता। ‘जोधा अकबर’ में इस काम को साध चुके आशुतोष गोवारीकर ‘खेलें हम जी जान से’ और ‘मोहेंजो दारो’ में नाकामी झेलने के बाद अगर फिर से इतिहास के समंदर में कूदे हैं तो उनके साहस की तारीफ होनी चाहिए। भले ही इस बार भी उनके हाथ में सच्चा मोती न लगा हो लेकिन उन्होंने निराश भी नहीं किया है। सच तो यह है कि इस फिल्म को फिल्म की बजाय इतिहास के किसी अध्याय की तरह देखा जाए तो यह उस दौर के माहौल की तस्वीर उकेर पाने में कामयाब दिखती है।
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