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Friday, 27 August 2021

रिव्यू-भीड़ में कुछ अलग दिखते ‘चेहरे’

-दीपक दुआ...
एक पहाड़ी रास्ता। बर्फबारी ज़ोरों पर। दूर-दूर तक कोई नहीं। अचानक रास्ते पर एक पेड़ गिरा और मजबूरन समीर को एक ऐसे घर में शरण लेनी पड़ी जहां चार रिटायर लोग महफिल जमाते हैं। एक जज, एक सरकारी वकील, एक बचाव पक्ष का वकील और एक जल्लाद वहां आने वाले अजनबियों के साथ एक अनोखा खेल भी खेलते हैं जिसमें वह उस अजनबी पर मुकदमा चलाते हैं और फैसला सुनाते हैं। एक लड़की और एक लड़का भी इस घर में काम करते हैं। समीर के ऊपर मुकदमा चलता है कि उसने अपने बॉस का कत्ल किया है। क्या यह सच है? क्या यह साबित हो पाएगा? हो गया तो क्या यह अदालत समीर को सज़ा देगी? क्या होगी वह सज़ा? ‘हमारी अदालतों में इंसाफ नहीं फैसले होते हैं का बोझ उठाए जी रहे ये लोग सचमुच कोई इंसाफ कर भी पाते हैं या यह खेल उनके लिए महज़ एक ‘खेल ही है?