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Friday, 27 August 2021

रिव्यू-भीड़ में कुछ अलग दिखते ‘चेहरे’

-दीपक दुआ...
एक पहाड़ी रास्ता। बर्फबारी ज़ोरों पर। दूर-दूर तक कोई नहीं। अचानक रास्ते पर एक पेड़ गिरा और मजबूरन समीर को एक ऐसे घर में शरण लेनी पड़ी जहां चार रिटायर लोग महफिल जमाते हैं। एक जज, एक सरकारी वकील, एक बचाव पक्ष का वकील और एक जल्लाद वहां आने वाले अजनबियों के साथ एक अनोखा खेल भी खेलते हैं जिसमें वह उस अजनबी पर मुकदमा चलाते हैं और फैसला सुनाते हैं। एक लड़की और एक लड़का भी इस घर में काम करते हैं। समीर के ऊपर मुकदमा चलता है कि उसने अपने बॉस का कत्ल किया है। क्या यह सच है? क्या यह साबित हो पाएगा? हो गया तो क्या यह अदालत समीर को सज़ा देगी? क्या होगी वह सज़ा? ‘हमारी अदालतों में इंसाफ नहीं फैसले होते हैं का बोझ उठाए जी रहे ये लोग सचमुच कोई इंसाफ कर भी पाते हैं या यह खेल उनके लिए महज़ एक ‘खेल ही है?

Thursday, 17 October 2019

रिव्यू-या रब, यह कैसी फिल्म बना दी ’#यारम’...!

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
सिद्धांत कपूर--पप्पा, मेरे लिए कोई पिक्चर बनाओ न। देखो , श्रद्धा कितनी बड़ी स्टार बन गई जबकि मुझे कोई जानता तक नहीं।
शक्ति कपूर--अबे ढाक की चिकी, पिच्चर तो मैंने श्रद्धा के लिए भी नहीं बनाई, वो भी तो खुद ही चली है, तू भी चल ले।
सिद्धांत--पप्पा, मुझे कुछ नहीं पता। या तो आप मेरे लिए पिक्चर बनाओ वरना मैं मम्मी को बता दूंगा कि आप कहां-कहां आं-ऊं करते रहते हो।
शक्ति--धमकी दे रा है, तेरी तो...*@#$... चल बनवाते हैं किसी से। पकड़ते हैं किसी ऐसे को जिसे तेरे एक्टिंग के टेलेंटके बारे में पता हो वरना तुझे लेकर कौन फिल्म बनाएगा। शूटिंग भी पूरी बाहर जाकर करेंगे और इसी बहाने थोड़ा-बौत आं-ऊं भी कर आएंगे।

Thursday, 17 January 2019

रिव्यू-‘बॉम्बेरिया’... बेवकूफेरिया... बर्बादेरिया...

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
इस रिव्यू की ऊल-जलूल हैडिंग पढ़ कर आप अगर सोच रहे हैं कि यह क्या बला है, तो बता दें कि यह फिल्म यानी बॉम्बेरियाभी ऐसी ही है-ऊल-जलूल, बिना सिर-पैर की, बेमतलब, बेमायने, बेवकूफाना, बर्बादाना...!

Saturday, 8 September 2018

रिव्यू-ज़रूरी मगर कमज़ोर ‘पलटन’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
कुछ सैनिक। उनके परिवारों की कहानियां। सरहद पर एक सच्ची लड़ाई। जोश, जज़्बा, देशप्रेम... बन गई बॉर्डर’। एक उम्दा, क्लासिक वाॅर-फिल्म।

फिर कुछ सैनिक। फिर उनके परिवारों की कहानियां। फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। फिर से वही जज़्बात... बन गई एल..सी. कारगिल क्लासिक सही, लेकिन एक अच्छी फिल्म।

एक बार फिर से कुछ सैनिक। एक बार फिर से उनके परिवारों की कहानियां। एक बार फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। एक बार फिर से जज़्बातों का छिड़काव... बन गई पलटन लेकिन हर बार अच्छी फिल्म बने, यह ज़रूरी तो नहीं न।