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Friday, 27 August 2021

रिव्यू-भीड़ में कुछ अलग दिखते ‘चेहरे’

-दीपक दुआ...
एक पहाड़ी रास्ता। बर्फबारी ज़ोरों पर। दूर-दूर तक कोई नहीं। अचानक रास्ते पर एक पेड़ गिरा और मजबूरन समीर को एक ऐसे घर में शरण लेनी पड़ी जहां चार रिटायर लोग महफिल जमाते हैं। एक जज, एक सरकारी वकील, एक बचाव पक्ष का वकील और एक जल्लाद वहां आने वाले अजनबियों के साथ एक अनोखा खेल भी खेलते हैं जिसमें वह उस अजनबी पर मुकदमा चलाते हैं और फैसला सुनाते हैं। एक लड़की और एक लड़का भी इस घर में काम करते हैं। समीर के ऊपर मुकदमा चलता है कि उसने अपने बॉस का कत्ल किया है। क्या यह सच है? क्या यह साबित हो पाएगा? हो गया तो क्या यह अदालत समीर को सज़ा देगी? क्या होगी वह सज़ा? ‘हमारी अदालतों में इंसाफ नहीं फैसले होते हैं का बोझ उठाए जी रहे ये लोग सचमुच कोई इंसाफ कर भी पाते हैं या यह खेल उनके लिए महज़ एक ‘खेल ही है?

Tuesday, 30 March 2021

रिव्यू-थोड़ी हाई थोड़ी फ्लैट ‘पगलैट’

 -दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
लखनऊ की संध्या का पति आस्तिक शादी के पांच महीने में ही मर गया। कल ही उसकी अंत्येष्टि हुई है। लेकिन संध्या को तो रोना रहा है और भूख भी जम कर लग रही है। उसे चाय नहीं पेप्सी पीनी है, गोलगप्पे खाने है। अगले 13 दिन तक घर में जमा किस्म-किस्म के लोगों की सोच और नज़रों से निबटना है। कुछ पुराने हिसाब चुकता करने है। कुछ नए फैसले लेने है। कुछ चीज़ों पर मिट्टी डालनी है तो कुछ नए बीज भी बोने हैं।
 

Thursday, 4 April 2019

रिव्यू-‘रोमियो अकबर वॉल्टर’-रॉ है, कच्ची है

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
बैंक में काम करने वाले एक शख्स को हमारी खुफिया एजेंसी रॉने परखा, उठाया, सिखाया और जासूस बना कर पाकिस्तान भेज दिया। थोड़े ही वक्त में वो वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआईकी नज़रों में गया। लेकिन उसने भी हार नहीं मानी और बाज़ी ऐसी पलटी कि सब देखते रह गए।

Saturday, 29 September 2018

रिव्यू-‘सुई धागा’ में सब बढ़िया है

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दिल्ली से सटा यू.पी. का कोई कस्बा। एक बिल्कुल ही आम परिवार। अभावों से जूझता। रहने को ढंग की जगह, सुविधाएं, जेब भर पैसा, कायदे का काम। फिर भी सब बढ़िया है। बीवी ममता के कहने पर मौजी भैया नौकरी छोड़ कर लग गए अपना ही कुछकरने। ढेरों अड़चनें आईं। कुछ अपनों ने साथ छोड़ा तो कुछ परायों ने हाथ बंटाया। लेकिन हिम्मत हारी दोनों ने और जुटे रहे। अंत में तो इन्हें जीतना ही हुआ।

अभावग्रस्त और बिल्कुल नीचे से उठ कर कुछ बड़ा हासिल करने की अंडरडॉगकिस्म की कहानियां दर्शकों को हमेशा से लुभाती रही हैं। लेकिन यह कहानी सिर्फ मौजी और ममता की ही नहीं है। उनकी हिम्मत, संघर्ष, मेहनत से कुछ बड़ा हासिल करने की ही नहीं है। बल्कि यह अपने भीतर और भी बहुत कुछ ऐसा समेटे हुए है जिसके बारे में मुख्यधारा का सिनेमा आमतौर पर बात नहीं करता है। या कहें कि बॉक्स-ऑफिस के समीकरण उसे ऐसा करने से रोकते हैं।