-दीपक दुआ...
एक पहाड़ी रास्ता। बर्फबारी ज़ोरों पर। दूर-दूर तक कोई नहीं। अचानक रास्ते पर एक पेड़ गिरा और मजबूरन समीर को एक ऐसे घर में शरण लेनी पड़ी जहां चार रिटायर लोग महफिल जमाते हैं। एक जज, एक सरकारी वकील, एक बचाव पक्ष का वकील और एक जल्लाद वहां आने वाले अजनबियों के साथ एक अनोखा खेल भी खेलते हैं जिसमें वह उस अजनबी पर मुकदमा चलाते हैं और फैसला सुनाते हैं। एक लड़की और एक लड़का भी इस घर में काम करते हैं। समीर के ऊपर मुकदमा चलता है कि उसने अपने बॉस का कत्ल किया है। क्या यह सच है? क्या यह साबित हो पाएगा? हो गया तो क्या यह अदालत समीर को सज़ा देगी? क्या होगी वह सज़ा? ‘हमारी अदालतों में इंसाफ नहीं फैसले होते हैं’ का बोझ उठाए जी रहे ये लोग सचमुच कोई इंसाफ कर भी पाते हैं या यह खेल उनके लिए महज़ एक ‘खेल’ ही है?
कोरियाई फिल्में अब हिन्दी वालों को ज्यादा भा रही हैं। 2013 में आई दक्षिण कोरियाई फिल्म ‘मोंटाज’ का रीमेक ‘तीन’ एक सस्पैंस फिल्म है। एक बूढ़ा आठ साल पहले किडनैप हुई और फिर मारी गई अपनी नातिन के किडनैपर की खोज में अभी भी पागलों की तरह लगा हुआ है जबकि पुलिस इस केस से पल्ला झाड़ चुकी है और इस केस को देख रहा अफसर पुलिस की नौकरी छोड़ अब चर्च में पादरी बन चुका है। लेकिन नाना का कहना है कि वह इंसाफ मिलने तक चुप नहीं बैठेगा। अचानक शहर में एक और बच्चा किडनैप होता है। बिल्कुल उसी स्टाइल में और उसके बाद के तमाम वाकये भी वैसे ही घटते हैं जो आठ साल पहले हो रहे थे। आखिर राज़ खुलता है और सच सामने आ ही जाता है।
लखनऊ की एक बहुत पुरानी हवेली फातिमा महल। एकदम खंडहर। उसकी उतनी ही पुरानी मालकिन-95 बरस की फातिमा बेगम। उनका 78 बरस का शौहर मिर्ज़ा-एकदम खड़ूस, कंजूस, नाकारा और सनकी। इस हवेली में रहते पांच किराएदारों के परिवार। ये मिर्ज़ा से परेशान, मिर्ज़ा इनसे परेशान। इनमें से ही एक है बांके जिसके साथ मिर्ज़ा की हरदम तू-तू-मैं-मैं लगी रहती है। मिर्ज़ा इस हवेली को बेगम से हड़पना चाहता है तो वहीं किराएदार चाहते हैं कि उन्हें भी कुछ मिल जाए। इस पकड़म-पकड़ाई में कभी मिर्ज़ा आगे तो कभी बांके एंड पार्टी।