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Saturday, 8 September 2018

रिव्यू-ज़रूरी मगर कमज़ोर ‘पलटन’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
कुछ सैनिक। उनके परिवारों की कहानियां। सरहद पर एक सच्ची लड़ाई। जोश, जज़्बा, देशप्रेम... बन गई बॉर्डर’। एक उम्दा, क्लासिक वाॅर-फिल्म।

फिर कुछ सैनिक। फिर उनके परिवारों की कहानियां। फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। फिर से वही जज़्बात... बन गई एल..सी. कारगिल क्लासिक सही, लेकिन एक अच्छी फिल्म।

एक बार फिर से कुछ सैनिक। एक बार फिर से उनके परिवारों की कहानियां। एक बार फिर से सरहद की एक सच्ची लड़ाई। एक बार फिर से जज़्बातों का छिड़काव... बन गई पलटन लेकिन हर बार अच्छी फिल्म बने, यह ज़रूरी तो नहीं न।

Sunday, 14 May 2017

आखिर फिल्में क्यों बनाते हैं संत गुरमीत राम रहीम सिंह...?


-दीपक दुआ...

पिछले दिनों जब हम डॉ. एम.एस.जी. के नाम से लोकप्रिय संत गुरमीत राम रहीम सिंह से मिलने हरियाणा में सिरसा स्थित उनके डेरा सच्चा सौदा में थे तो वहां हमने उनसे कई सारे सवाल पूछे जिनका उन्होंने खुल कर जवाब भी दिया।

अपनी नई फिल्म जट्टू इंजीनियरके बजट के बारे में वह बताते हैं कि उनकी फिल्मों में बजट बहुत ज्यादा नहीं होता है क्योंकि हम लोग ज्यादातर बेकार पड़ी चीजों से ही सैट बना लेते हैं।

अपनी फिल्मों से होने वाले मुनाफे के इस्तेमाल को लेकर पूछे गए सवाल पर बाबा बताते हैं कि हमारे यहां एक ऐसा अस्पताल है जिसमें ऐसी-ऐसी मशीनें हैं जो शायद एम्स के पास भी हों और यहां गरीबों का मुफ्त इलाज होता है। एक फिल्म के मुनाफे से उन्होंने स्किन बैंक बनाया है, आगे हड्डियों का बैंक बनाना है और थैलेसीमिया को खत्म करना है।

अगर संत गुरमीत राम रहीम सिंह को दूसरे निर्माताओं की फिल्में ऑफर हों तो क्या वह करना चाहेंगे? इस पर वह खुल कर बात करते हैं। बाबा से पूछा जाता है कि क्या वह खुद के अलावा फिल्म इंडस्ट्री के दूसरे कलाकारों को लेकर भी फिल्में बनाना चाहेंगे? इस सवाल पर वह बिना रुके जवाब देते हैं। पूरा इंटरव्यू देखने के लिए इस ब्लॉग के नीचे दिए लिंक को क्लिक करें।
यहाँ क्लिक कर के देखिए इंटरव्यू का वीडियो...
Click here for Full Interview of Dr.MSG-Saint Gurmeet Ram Rahim Singh

Saturday, 17 December 2016

रिव्यू-इस कचरे की 'वजह तुम हो'

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अब यह मत कहिएगा कि आपने कचरा परोसने वाली फिल्मों को पसंद नहीं किया था, उन्हें तगड़ी कमाई नहीं करवाई थी। और यह तो तय है कि कचरे वाली फिल्मों से कमाए गए पैसों से फिर कचरे वाली फिल्में ही बनेंगी। तो जनाब, अगर ऐसी फिल्में बन रही हैं तो इसकी वजह सिर्फ आप ही हैं।

एक टी.वी. चैनल पर किसी का लाइव मर्डर प्रसारित हो तो जाहिर है कि पहला शक उस चैनल के मालिक पर जाएगा। लेकिन जिस पर शक जाए, वह तो कातिल होता ही नहीं है। तो फिर किसी दूसरे पर शक जाएगा। और अगर दूसरा भी अपराधी निकले तो? अजी तीसरा, चौथा, कोई तो पकड़ में आएगा ही।

इस किस्म की किसी सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म में कातिल कौनकी गुत्थी को सुलझते हुए देखना सचमुच दिलचस्प होता है और इस फिल्म में भी इसे कायदे से परत-दर-परत सुलझाया गया है। लेकिन दिक्कत तब आती है जब बनाने वाले इसे जबरन एक सैक्स-थ्रिलर बनाने पर उतारू हो जाएं। कहां तो आप दिमाग लगा रहे हैं कि अब क्या होगा, कौन होगा कातिल, कैसे करेगा वह अगला कत्ल और कहां बीच में जाते हैं नंगई से भरे सीन, एक-दूसरे के शरीर को मसलते हीरो-हीरोइन और वह भी बिना वजह।

किरदारों को कायदे से गढ़ा ही नहीं गया। जिस पुलिस अफसर को आप पर्दे पर धांसू डायलॉग मारते देखते हैं, दिमागदार समझते हैं, वह असल में अपने हर कदम पर बुरी तरह से नाकाम होता जाता है। फिर इस फिल्म की स्क्रिप्ट एकदम पैदल है। ढेरों ऐसे सीन हैं जिन्हें देख कर आप अपने हाथों को अपने ही सिर के बाल नोचने से रोकते हैं। हां, इन दृश्यों का मजाक उड़ाते हुए इस फिल्म को देखा जाए तो यह कहीं ज्यादा मजा देंगे।

ऊपर से इस फिल्म के कलाकार...उफ्फ...! एक शरमन जोशी को छोड़ कोई भी तो एक्टिंग नहीं जानता। सना खान जैसी नायिकाएं एक्टिंग भले ही ढंग से करें, कामुक दिखने और खुल कर पर्दे को गर्माने का काम अच्छे से करना जानती हैं।

फिल्म के गाने बेहद बोर हैं। तीन गानों में तो पुराने गानों को ही रीमिक्स किया गया है जो झुलाते कम और खिजाते ज्यादा हैं। हां, गर्माते जरूर हैं।

विशाल पंड्या को अब भट्ट कैंप स्टाइल ऑफ फिल्ममेकिंगसे ऊपर उठ जाना चाहिए। कब तक वह कचरे पर परफ्यूम छिड़क कर दर्शकों को बरगलाते रहेंगे?
अपनी रेटिंग-डेढ़ स्टार