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Saturday, 4 March 2017

बॉक्स-ऑफिस-फरवरी-2017--जॉली ने जीता बॉक्स-ऑफिस का मुकदमा


-दीपक दुआ...

फरवरी के महीने में अक्षय कुमार की जॉली एलएलबी 2 ने दर्शकों के दिल जीते। हरिभूमि में महीने के पहले शुक्रवार को छपने वाले अपने कॉलम बॉक्स-ऑफिस में पढ़िए फरवरी में आईं फिल्मों का हाल।
एक साथ दो-दो बड़ी फिल्में जाएं तो उसके बाद वाले शुक्रवार को नई फिल्मों को थिएटर ही नहीं मिल पाते। फरवरी की शुरूआत में यही हुआ। 26 जनवरी पर रईसऔर काबिलने आकर थिएटरों में कब्जा जमाया हुआ था सो फरवरी के पहले शुक्रवार को अलिफऔर ना राजा ना रानीजैसी छोटे बजट की फिल्में ही सकीं। इनमें से जैगम इमाम की अलिफने मुस्लिम समुदाय में शिक्षा पर जोर देने की वकालत की लेकिन आम दर्शकों के टेस्ट की फिल्म होने के चलते यह सिर्फ चंद बुद्धिजीवी दर्शकों तक ही सिमट कर रह गई। इसी हफ्ते आई जैकी चान और सोनू सूद वाली डब फिल्म कुग फू योगा' में रोमांच और रफ्तार तो थे लेकिन बेदम कहानी के चलते दर्शकों ने इसे भी किनारे कर दिया। चीन में सुपरहिट होने और एक सप्ताह में तकरीबन 943 करोड़ रुपए इक्ट्ठे करने वाली इस फिल्म को भारत में अंग्रेजी और हिन्दी संस्करणों से इतनी कलैक्शन भी नहीं हुई कि कहीं इसका जिक्र होता।

फरवरी का दूसरा हफ्ता अक्षय कुमार की शानदार फिल्म जॉली एलएलबी 2’ लेकर आया। निर्देशक सुभाष कपूर ने इस फिल्म के बड़े बजट और भव्य कैनवास का फायदा उठाते हुए इस बार सिस्टम पर करारी चोट की और तीखेपन के साथ अपनी बात रखी। दर्शकों ने भी इस फिल्म का भरपूर सम्मान करते हुए इसे सिर-माथे पर जगह दी। वीकएंड में करीब 48 करोड़ और पहले सप्ताह में लगभग 78 करोड़ रुपए जमा करने के बाद भी यह फिल्म रुकी नहीं और बहुत जल्द सौ करोड़ी क्लब में शामिल होकर सुपरहिट का खिताब ले उड़ी। इसी सप्ताह आई गुरमीत राम रहीम सिंह की फिल्म हिन्द का नापाक को जवाब-एमएसजी लायन हार्ट-2’ को सिर्फ उत्तर भारत में बाबा के अनुयाइयों द्वारा ही देखा गया। हॉरर नाइटका कहीं नाम भी नहीं सुना गया।

तीसरे शुक्रवार को निर्देशक संकल्प रेड्डी ने नेवी ऑपरेशन पर बनी भारत की पहली फिल्म गाजी अटैकदी। अपनी इस पहली ही फिल्म में संकल्प ने 1971 में पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी के नष्ट होने की घटना को एक काल्पनिक कहानी का हिस्सा बना कर सचमुच एक सराहनीय फिल्म दी। बिना रोमांस और गानों की इस फिल्म को अच्छा सिनेमा देखने वालों ने सराहा लेकिन टिकट-खिड़की पर पैसे लुटाने वाले आम दर्शक वर्ग ने इससे दूरी बनाए रखी जिस वजह से यह फिल्म एक सप्ताह में करीब 12 करोड़ रुपए ही बटोर पाई। रनिंग शादीका आइडिया जितना दिलचस्प था, इसकी स्क्रिप्ट उतनी ही कच्ची निकली और यही कारण है कि शानदार कॉमेडी बन सकने वाली यह फिल्म अधपकी रह गई और दर्शकों भी इससे दूर ही रहे। एक हफ्ते में मात्र 60 लाख की इसकी कलैक्शन ने इस पर सुपर फ्लॉप का धब्बा लगाया। अरशद वारसी-नसीरुद्दीन शाह वाली इरादामें ईको-टेरररिज्म की बात की गई। इस अलग किस्म की थ्रिलर फिल्म को बनाने वालों का इरादा तो नेक था लेकिन कच्चेपन और डिटेलिंग की कमी के चलते यह ज्यादा ऊपर नहीं उठ पाई और बॉक्स-ऑफिस पर भी हल्की ही रही। एक हफ्ते में सिर्फ 58 लाख ही यह जमा कर पाई।

आखिरी हफ्ते में विशाल भारद्वाज ने रंगूनमें दूसरे विश्व-युद्ध के बैकड्रॉप में जो खिचड़ीनुमा कहानी परोसी उसकी काफी आलोचना हुई। सैफ, कंगना और शाहिद के उम्दा अभिनय के चलते इसे शुरूआती रिस्पांस तो अच्छा मिला और विशाल के प्रशंसकों ने भी इसकी तरफ रुख किया लेकिन देखने के बाद निराश होकर लौटे दर्शकों ने दूसरों को इससे दूर रहने की ही सलाह दी। पहले दिन की इसकी कलैक्शन करीब 6 करोड़ रही। तीन दिन में करीब 18 करोड़ की कलैक्शन के बाद सोमवार को यह सिर्फ सवा करोड़ की बटोर पाई और फिर ठंडी पड़ती चली गई। इसके साथ आई नाना पाटेकर वाली वेडिंग एनिवर्सरीका खुल का प्रचार ही नहीं हो पाया। मोना डार्लिंगऔर 9 ओ क्लॉक के तो नाम भी सुनने में नहीं आए।

Friday, 10 February 2017

रिव्यू-करारा कनपुरिया कनटाप है ‘जॉली एल.एल.बी. 2’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
करीब चार साल पहले जब जॉली एल.एल.बी.आई थी तो अपन उससे कुछ निराश थे और लिखा था कि जब आप के हाथ में हथौड़ा हो तो चोट भी जोरदार करनी चाहिए। पता नहीं, निर्देशक सुभाष कपूर ने हम जैसों की सुनी या अपने अंदर की, लेकिन इस बार वह सचमुच जोरदार ढंग से सामने आए हैं और इस तरह से अपनी बात कहते हैं कि इस फिल्म को देखते हुए आप मुस्कुराते हैं, हंसते हैं, तालियां पीटते हैं, वाह-वाह करते हैं और अंत में यह आपके अंदर उस उम्मीद को एक बार फिर जगाती है कि अभी भी हमारे चारों तरफ सब कुछ मरा नहीं है।

कहानी वही पुरानी है। वकालत का अपना धंधा जमाने की जुगत में हर सही-गलत काम को करने को तैयार जॉली को जब अपने एक गुनाह का अहसास होता है तो पश्चाताप करने के लिए वह सच तलाशने और इंसाफ दिलाने के लिए निकल पड़ता है। जाहिर है कि सच का रास्ता कठिन होता है लेकिन अपनी फिल्में तो हमेशा से बताती और दिखाती रही हैं कि सच और साहस है जिसके मन में, अंत में जीत उसी की रहे।

पहले ही सीन से सुभाष कपूर जता देते हैं कि इस बार वह हाथ में गेवल लेकर किसी जज की तरह सिर्फ ऑर्डर-ऑर्डर नहीं करेंगे बल्कि जहां जरूरत होगी, वहां उसे फेंक कर भी मारेंगे। स्कूली इम्तिहानों में नकल करवाने के ठेकेमृत आदमी का केस, प्रोमोशन और कमाई के लालच में पुलिस वालों के गलत काम, केस लड़ने के लिए सिल्वर, गोल्ड और प्लेटिनम पैकेज ऑफर करने, अदालतों के बदबदाते माहौल या पेडिंग पड़े करोड़ों मुकदमों के जिक्र जैसे सीन भले ही हल्के से आकर निकल जाते हों लेकिन असल में यह हमारे आसपास के समाज और सिस्टम की उन खामियों और सूराखों की बात करते हैं जिन्हें हमने इस अंदाज में लगभग स्वीकार कर लिया है कि यह तो ऐसे ही होगा और हमें इनके साथ ही चलना पड़ेगा। मगर यह फिल्म बताती है कि अगर ईमानदारी से जुट कर काम किया जाए तो फिर यही समाज, यही सिस्टम सच और सही का साथ देने के लिए भी उठ खड़ा होता है।

फिल्म की पूरी कहानी लखनऊ की है और हीरो जॉली कानपुर से वहां आया है। लखनऊ की अवधी का इस्तेमाल भले ही ज्यादा दिखा हो मगर कनपुरिया और यू.पी. के फ्लेवर वाली जुबान पूरी फिल्म में सुनाई पड़ती है और कई जगह स्थानीय शब्दों का इस्तेमाल इसकी रंगत बढ़ाते हैं। हालांकि फिल्म में काफी कुछ फिल्मीभी है। लेकिन इस की रफ्तार और इसके कंटेंट की मजबूती आपको उसे अनदेखा करने पर मजबूर करती है। कुछ एक जगह लगता है कि यह क्या ड्रामा चल रहा है, लेकिन यह ड्रामा ही इस फिल्म को आगे ले जाता है वरना अपनी फिल्मों में कोर्ट-रूम सीन अक्सर या तो नीरस हो जाते हैं या फिर बोझिल। फिल्म के संवाद इसकी जान हैं। मुंह से कब अपने-आप वाह निकल जाए और कब हाथ तालियां पीटने लगें, पता ही नहीं चलता। कुछ एक सीन आपको पिघलाते भी हैं

अक्षय कुमार पूरी तरह से फॉर्म में हैं और जब, जैसी जरूरत पड़ी तब आगे बढ़ कर या अंडर-प्ले करके असर छोड़ते हैं। तेज-तर्रार वकील के किरदार में अन्नू कपूर ने जम कर काम किया। चंद सीन में आईं सयानी गुप्ता हों या विनोद नागपाल, राजीव गुप्ता, इनामुल हक, मानव कौल, कुमुद मिश्रा, संजय मिश्रा, ब्रिजेंद्र काला जैसे अन्य कलाकार, हर किसी को अपने किरदार में फिट करती चलती है यह फिल्म। हां, जॉली की बीवी के रोल में हुमा कुरैशी को कुछ और दमदार सीन मिलते तो बढ़िया रहता। लेकिन पिछली वाली फिल्म की तरह इस बार भी मजमा लूटने का काम सौरभ शुक्ला ही कर गए। अपनी बेटी की शादी की तैयारियों में मसरूफ, मगर अपने काम को डूब कर करते जज की भूमिका में सौरभ अपनी हर अदा और हर संवाद-अदायगी से बताते हैं कि क्यों वह सिर्फ एक एक्टर ही नहीं, एक्टिंग के गुरु भी हैं। सौरभ का ही किरदार है जो इस फिल्म को पिछली वाली फिल्म से जोड़ता है। म्यूजिक ठीक-ठाक है।

इस कहानी में नयापन भले हो, तीखापन जरूर है और यह तीखापन ही ऐसे विषयों को दिल-दिमाग के भीतर तक ले जाता है। असल में तो यह फिल्म एक ऐसा करारा कनपुरिया कनटाप है जिसे निर्देशक ने हमारे सिस्टम की खामियों के कान के नीचे रख कर दिया है। अब भी अगर कोई सुधरना और सुधारना चाहे तो मर्जी उसकी।
अपनी रेटिंग-4 स्टार
(
दीपक दुआ फिल्म समीक्षक पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)