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Friday, 16 November 2018

रिव्यू-बाज़ार में तब्दील होते समाज का किस्सा-‘मोहल्ला अस्सी’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
‘‘शहर बनारस के दक्खिनी छोर पर गंगा किनारे बसा ऐतिहासिक मुहल्ला अस्सी। अस्सी चौराहे पर भीड़-भाड़ वाली चाय की एक दुकान। इस दुकान में रात-दिन बहसों में उलझते, लड़ते-झगड़ते गाली-गलौज करते कुछ स्वनामधन्य अखाड़िए बैठकबाज। इसी मुहल्ले और दुकान का लाइव शो है यह कृति।’’

Sunday, 29 April 2018

रिव्यू-सरकार, यह ‘देव’ तो ‘दास’ निकला

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चलो सरकार, फिल्म बनाते हैं। पर सरकारतो रामू बना चुके हैं। तो चलो उसमें हैमलेटमिलाते हैं। मगर उस पर विशाल भारद्वाज हैदरबना चुके हैं। तो फिर ऐसा करते हैं देवदासभी मिला देते हैं। हीरो का नाम देव, उसकी सखी का पारो रख देते हैं। थोड़ी-थोड़ी ओंकारा’, ‘मकबूल’, ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’, ‘राजनीति’, ‘हु तु तु’, ’सत्ताऔर ऐसे ही फ्लेवर वाली फिल्में भी ले लेते हैं। कुछ तो बन ही जाएगा।

तो साहब, यह जो कुछबन कर आया है इसमें बाहुबलियों वाला बैकग्राउंड है। राजनीतिक परिवार की कहानी है। सत्ता और पॉवर के नशे का मिक्सचर है। प्यार और धोखे का तड़का है। उठा-पटक है, गोलियां हैं, गालियां हैं। बस नहीं है तो वह सुधीर मिश्रा और उनका वाला टच जिसके शैदाई कभी हम जैसे लोग हुआ करते थे।

फिल्म की कहानी तो जो है सो है ही, इसकी स्क्रिप्ट इतनी ज्यादा जटिल और उलझी हुई है कि यकीन नहीं होता कि आप उन्हीं सुधीर मिश्रा की फिल्म देख रहे हैं जो डार्क कहानियों को भी इस सरलता से बयान कर दिया करते थे कि उनके निगेटिव किरदारों से भी इश्क-सा होने लगता था। इस कहानी के ढेरों किरदारों में से तो एक भी पात्र ऐसा नहीं निकला जो आपकी हमदर्दी ले जा सके।

एक्टिंग कई लोगों की जबर्दस्त है। सौरभ शुक्ला और विपिन शर्मा तो भरपूर छाए रहे। दिलीप ताहिल, अदिति राव हैदरी, ऋचा चड्ढा, विनीत कुमार सिंह भी उम्दा रहे। देव बने राहुल भट्ट हालांकि इस सारे मजमे में सबसे कमजोर रहे लेकिन अपनी तरफ से वह भी भरपूर कोशिशें करते नजर आए। अनुराग कश्यप भी हैं। बुल्ले शाह और फैज़ की रचनाएं लेने के बाद ढेरों गीतकारों-संगीतकारों की भीड़ से जो गाने तैयार करवाए गए वे भी इस फिल्म की तरह ही औसत रह गए।

यह फिल्म देखते हुए महसूस होता है कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री किस तरह से उन फिल्मकारों के जेहन में भी घिसे-पिटे रास्तों पर चलने और दूसरों से मुकाबला करने का दबाव बनाती है जो कभी अपनी राह खुद बनाया करते थे। अफसोस, कि सुधीर मिश्रा भी इस दबाव के सामने दास बन गए।
अपनी रेटिंग-डेढ़ स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)


Friday, 16 March 2018

रिव्यू-ऐसी ‘रेड’ ज़रूर पड़े, बार-बार पड़े

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
फिल्म वाले अक्सर स्यापा करते हैं कि उनके पास नई और अच्छी कहानियां नहीं हैं। कैसे नहीं हैं? पुराणों-पोथियों को बांचिए, अपने आसपास की दुनिया को देखिए, बीते दिनों के अखबारी पन्नों को पलटिए तो जितनी कहानियां इस मुल्क में मिलेंगी उतनी तो कहीं मिल ही नहीं सकतीं। आखिर (एयरलिफ्ट’, ‘पिंकसमेत कई फिल्में लिख चुके) रितेश शाह भी तो इन्हीं पन्नों से यह कहानी निकाल कर लाए ही हैं न।

Friday, 14 July 2017

रिव्यू-लुभाती है सुहाती है जग्गा की जासूसी

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
मुमकिन है यह सवाल आपके मन में भी कभी उठता हो कि कश्मीर हो, उत्तर-पूर्व या मध्य भारत का नक्सली इलाका, वहां के अलगाववादियों से लेकर दुनिया की वे तमाम जगहें, जहां हथियारबंद आतंकी मौजूद हैं, आखिर ये हथियार कोई तो पहुंचाता ही होगा। यह फिल्म ऐसे ही एक गैंग का पर्दाफाश करती है।

Saturday, 4 March 2017

बॉक्स-ऑफिस-फरवरी-2017--जॉली ने जीता बॉक्स-ऑफिस का मुकदमा


-दीपक दुआ...

फरवरी के महीने में अक्षय कुमार की जॉली एलएलबी 2 ने दर्शकों के दिल जीते। हरिभूमि में महीने के पहले शुक्रवार को छपने वाले अपने कॉलम बॉक्स-ऑफिस में पढ़िए फरवरी में आईं फिल्मों का हाल।
एक साथ दो-दो बड़ी फिल्में जाएं तो उसके बाद वाले शुक्रवार को नई फिल्मों को थिएटर ही नहीं मिल पाते। फरवरी की शुरूआत में यही हुआ। 26 जनवरी पर रईसऔर काबिलने आकर थिएटरों में कब्जा जमाया हुआ था सो फरवरी के पहले शुक्रवार को अलिफऔर ना राजा ना रानीजैसी छोटे बजट की फिल्में ही सकीं। इनमें से जैगम इमाम की अलिफने मुस्लिम समुदाय में शिक्षा पर जोर देने की वकालत की लेकिन आम दर्शकों के टेस्ट की फिल्म होने के चलते यह सिर्फ चंद बुद्धिजीवी दर्शकों तक ही सिमट कर रह गई। इसी हफ्ते आई जैकी चान और सोनू सूद वाली डब फिल्म कुग फू योगा' में रोमांच और रफ्तार तो थे लेकिन बेदम कहानी के चलते दर्शकों ने इसे भी किनारे कर दिया। चीन में सुपरहिट होने और एक सप्ताह में तकरीबन 943 करोड़ रुपए इक्ट्ठे करने वाली इस फिल्म को भारत में अंग्रेजी और हिन्दी संस्करणों से इतनी कलैक्शन भी नहीं हुई कि कहीं इसका जिक्र होता।

फरवरी का दूसरा हफ्ता अक्षय कुमार की शानदार फिल्म जॉली एलएलबी 2’ लेकर आया। निर्देशक सुभाष कपूर ने इस फिल्म के बड़े बजट और भव्य कैनवास का फायदा उठाते हुए इस बार सिस्टम पर करारी चोट की और तीखेपन के साथ अपनी बात रखी। दर्शकों ने भी इस फिल्म का भरपूर सम्मान करते हुए इसे सिर-माथे पर जगह दी। वीकएंड में करीब 48 करोड़ और पहले सप्ताह में लगभग 78 करोड़ रुपए जमा करने के बाद भी यह फिल्म रुकी नहीं और बहुत जल्द सौ करोड़ी क्लब में शामिल होकर सुपरहिट का खिताब ले उड़ी। इसी सप्ताह आई गुरमीत राम रहीम सिंह की फिल्म हिन्द का नापाक को जवाब-एमएसजी लायन हार्ट-2’ को सिर्फ उत्तर भारत में बाबा के अनुयाइयों द्वारा ही देखा गया। हॉरर नाइटका कहीं नाम भी नहीं सुना गया।

तीसरे शुक्रवार को निर्देशक संकल्प रेड्डी ने नेवी ऑपरेशन पर बनी भारत की पहली फिल्म गाजी अटैकदी। अपनी इस पहली ही फिल्म में संकल्प ने 1971 में पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी के नष्ट होने की घटना को एक काल्पनिक कहानी का हिस्सा बना कर सचमुच एक सराहनीय फिल्म दी। बिना रोमांस और गानों की इस फिल्म को अच्छा सिनेमा देखने वालों ने सराहा लेकिन टिकट-खिड़की पर पैसे लुटाने वाले आम दर्शक वर्ग ने इससे दूरी बनाए रखी जिस वजह से यह फिल्म एक सप्ताह में करीब 12 करोड़ रुपए ही बटोर पाई। रनिंग शादीका आइडिया जितना दिलचस्प था, इसकी स्क्रिप्ट उतनी ही कच्ची निकली और यही कारण है कि शानदार कॉमेडी बन सकने वाली यह फिल्म अधपकी रह गई और दर्शकों भी इससे दूर ही रहे। एक हफ्ते में मात्र 60 लाख की इसकी कलैक्शन ने इस पर सुपर फ्लॉप का धब्बा लगाया। अरशद वारसी-नसीरुद्दीन शाह वाली इरादामें ईको-टेरररिज्म की बात की गई। इस अलग किस्म की थ्रिलर फिल्म को बनाने वालों का इरादा तो नेक था लेकिन कच्चेपन और डिटेलिंग की कमी के चलते यह ज्यादा ऊपर नहीं उठ पाई और बॉक्स-ऑफिस पर भी हल्की ही रही। एक हफ्ते में सिर्फ 58 लाख ही यह जमा कर पाई।

आखिरी हफ्ते में विशाल भारद्वाज ने रंगूनमें दूसरे विश्व-युद्ध के बैकड्रॉप में जो खिचड़ीनुमा कहानी परोसी उसकी काफी आलोचना हुई। सैफ, कंगना और शाहिद के उम्दा अभिनय के चलते इसे शुरूआती रिस्पांस तो अच्छा मिला और विशाल के प्रशंसकों ने भी इसकी तरफ रुख किया लेकिन देखने के बाद निराश होकर लौटे दर्शकों ने दूसरों को इससे दूर रहने की ही सलाह दी। पहले दिन की इसकी कलैक्शन करीब 6 करोड़ रही। तीन दिन में करीब 18 करोड़ की कलैक्शन के बाद सोमवार को यह सिर्फ सवा करोड़ की बटोर पाई और फिर ठंडी पड़ती चली गई। इसके साथ आई नाना पाटेकर वाली वेडिंग एनिवर्सरीका खुल का प्रचार ही नहीं हो पाया। मोना डार्लिंगऔर 9 ओ क्लॉक के तो नाम भी सुनने में नहीं आए।