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Sunday, 21 February 2021

रिव्यू-बुरी तरह से डिस्टर्ब करती है ‘दिल्ली रायट्स’

 -दीपक दुआ...
23 फरवरी, 2020... दिल्ली के जमना पार का एक हिस्सा अचानक से दहशत का केंद्र बन गया था। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में सड़कों पर हफ्तों से जमे बैठे एक वर्ग विशेष के लोगों ने अचानक पुलिस और दूसरे संप्रदाय के लोगों के घरों, दुकानों को जलाना, लूटना शुरू कर दिया। उन्हें चुन-चुन कर मारा जाने लगा। कहा गया कि एक नेता के बयान के बाद वे लोग भड़के। लेकिन इन लोगों की हरकतें बता रही थीं कि इनका यह ‘भड़कना’ अचानक नहीं था बल्कि इसके लंबी तैयारी की जा रही थी। जब आरोपियों की धर-पकड़ शुरू हुई तो धीरे-धीरे सच सामने आने लगा। उन मनहूस दंगों की पहली बरसी पर रिलीज़ हुई डॉक्यूमेंट्री ‘दिल्ली रायट्स-ए टेल ऑफ बर्न एंड ब्लेम’ सच की उन्हीं दबी-छुपी परतों को सामने लाने का काम कर रही है जिन्हें पहले मुख्यधारा मीडिया के एक वर्ग और उसके बाद सोशल मीडिया के सिपाहियों ने या तो सामने नहीं आने दिया या फिर उन परतों में से सिर्फ उन्हीं को खोला जिनसे उनके खुद के हित सध रहे थे।

Sunday, 1 December 2019

इफ्फी-सुनहरे बरस में फिल्मोत्सव की धूम

-दीपक दुआ...
1952 में शुरू हुए भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) ने इस बरस अपने 50वें संस्करण में कदम
रखा। इस सुनहरे मौके पर इफ्फी की रंगत कुछ अलग ही रही। 20 नवंबर की शाम करण जौहर के संचालन और अमिताभ बच्चन रजनीकांत जैसे दो महानायकों की उपस्थिति में इस समारोह की रंगारंग शुरूआत हुई। देश-विदेश की ढेरों उत्कृष्ट फिल्मों के प्रदर्शन के साथ-साथ सिनेमा से जुड़ी बहुतेरी गतिविधियां से यह उत्सव लबरेज रहा।
बदला रंग बदला रूप
1952 से लेकर अब तक इफ्फी के रूप-रंग में कई किस्म के बदलाव हुए हैं। पहले यह महोत्सव घुमंतू था। हर साल देश के अलग-अलग शहरों में होता था। लेकिन 2004 से यह गोआ में जाकर जम चुका है और अपनी एक अलग पहचान भी हासिल कर चुका है। गोआ में भी यह पहले 23 नवंबर से 3 दिसंबर तक होता था। फिर यह 20 से 30 नवंबर तक होने लगा और 2016 से इसे 20 से 28 नवंबर तक आयोजित किया जाने लगा।

Wednesday, 16 May 2018

‘किताब’ पुकारती है पाठकों को

-दीपक दुआ...
एक पहाड़ी शहर में एक पुरानी लाइब्रेरी। बूढ़ा लाइब्रेरियन। ढेरों पाठक। किताबों की संगत में सब खुश। वक्त बीतता है। लाइब्रेरी में अब कम लोग आते हैं। अंत में सिर्फ एक लड़की। एक दिन वो भी आना बंद कर देती है। लोग अब लैपटॉप, मोबाइल में मसरूफ हैं। उन्हें किताबों का साथ नहीं चाहिए। लाइब्रेरियन उस लड़की से मिलने जाता है। वह लौटती भी है। लेकिन...!

यह कहानी है एक शॉर्ट-फिल्म किताबकी जो बताती है कि अब लोग किताबों और लाइब्रेरियों से विमुख होते जा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि किताबों की पुकार सुनाती यह फिल्म खुद मूक है। करीब 25 मिनट की इस फिल्म में सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक और विज़ुअल्स के जरिए ही निर्देशक कमलेश के. मिश्रा ने अपनी बात को प्रभावी तरीके से रखा है। हां, दो-एक जगह कुछ कविताएं जरूर हैं जो इस प्रभाव को और गाढ़ा करती हैं। हालांकि यह भी सच है कि यह फिल्म किसी एक किताब की बजाय किताबों, या कहें कि लाइब्रेरियों से दूर होते लोगों की बात ज्यादा करती है और इस नज़रिए से देखें तो इसका नाम किताबकी बजाय किताबेंहोता तो इसकी थीम से ज्यादा जुड़ पाता।

कुछ ही महीने पहले दिवंगत हुए अभिनेता टॉमऑल्टर ने बूढ़े लाइब्रेरियन के किरदार में खासा असर छोड़ा। अदाकारा पूजा दीक्षित भी अपने काम को बखूबी कर गईं। कैमरे और लाइटिंग से दृश्य-संयोजन प्रभावशाली बन पाया है। कमलेश के लेखन और निर्देशन की छाप फिल्म को जरूरी गहराई और ऊंचाई देती है। अंत में फिल्म भावुक करती है और एक पाॅज़िटिव नोट पर खत्म होती है। 

दिल्ली के फिल्म्स डिवीज़न सिनेप्लेक्स में क्षमता से ज्यादा दर्शकों की मौजूदगी में हुए सारांश प्रोडक्शंस की इस फिल्म के प्रीमियर से पहले इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बढ़ते प्रभाव में किताबों का अस्तित्वविषय पर एक परिचर्चा हुई जिसमें लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने कहा, ‘किताब से बड़ा कोई साथी नहीं, कोई हमदर्द नहीं। किताब की संस्कृति बनी रहेगी चाहे कितने ही नए साधन जाएं क्योंकि हमारे सोचने के नजरिए को ताकत किताब से ही मिलेगी। किताबें जिंदा रहनी चाहिएं, जिंदा रहेंगी।इस मौके पर सुलभ स्वच्छता एवं सामाजिक सुधार आंदोलन के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने कहा, ‘गैजेट, किताब को रिप्लेस नहीं कर सकता। गैजेट पूरक हो सकते हैं लेकिन पढ़ने का जो आनंद, जो रस किताब से आता है, वह किसी और चीज से नहीं सकता। गैजेट को चलने के लिए कोई सहारा चाहिए होता है, किताबें बिना सहारे के चलती हैं।
 
इस चर्चा में निर्देशक कमलेश के. मिश्रा ने कहा, ‘एक बार एक बड़ी लाइब्रेरी में नामी लेखकों की किताबों पर जमी धूल देख कर मुझे किताबों की पीड़ा, कराह सुनाई दी और तभी यह कहानी मेरे मन में आई और मैंने यह फिल्म बनाई।कमलेश बताते हैं कि इस फिल्म को कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सवों में सम्मानित किया जा चुका है और उनका इरादा है कि विभिन्न संस्थानों, लाइब्रेरियों में इसके शोज़ आयोजित किए जाएं ताकि लोग इसके बहाने किताबों से जुड़ सकें।

(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)