-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
स्कूल-कॉलेज के ज़माने की दो सहेलियां किसी बात पर ऐसी बिगड़ीं कि दुश्मन बन गईं। लेकिन शादी के बाद भी रहती एक-दूसरे के पड़ोस में हैं। यहां से शिफ्ट होकर दोनों नए घर में गईं तो वो घर भी चिपके हुए निकले। वाह रे राईटर साहब, आपकी समझदानी को म्यूजियम में रखूं। खैर...! किस बात पर ये दोनों ऐसी पक्की दुश्मन बनी थीं, यह पूरी फिल्म में सामने नहीं आता। और जब अंत में सामने आता है तो दिल ढूंढता है चुल्लू भर पानी, कि मुंह धो कर नींद भगा लें। दिक्कत यह है कि इन दोनों के बेटे-बेटी को एक-दूजे से प्यार हो जाता है। क्यों और कैसे? यह राईटर साहब नहीं बताना चाहते, उनकी मर्ज़ी। अब इन दोनों ने आपस में करनी है शादी लेकिन अपनी-अपनी मम्मियों के आगे इनकी ही नहीं इनके बापों की भी नहीं चलती। इनकी मम्मियों की तो... जय।
स्कूल-कॉलेज के ज़माने की दो सहेलियां किसी बात पर ऐसी बिगड़ीं कि दुश्मन बन गईं। लेकिन शादी के बाद भी रहती एक-दूसरे के पड़ोस में हैं। यहां से शिफ्ट होकर दोनों नए घर में गईं तो वो घर भी चिपके हुए निकले। वाह रे राईटर साहब, आपकी समझदानी को म्यूजियम में रखूं। खैर...! किस बात पर ये दोनों ऐसी पक्की दुश्मन बनी थीं, यह पूरी फिल्म में सामने नहीं आता। और जब अंत में सामने आता है तो दिल ढूंढता है चुल्लू भर पानी, कि मुंह धो कर नींद भगा लें। दिक्कत यह है कि इन दोनों के बेटे-बेटी को एक-दूजे से प्यार हो जाता है। क्यों और कैसे? यह राईटर साहब नहीं बताना चाहते, उनकी मर्ज़ी। अब इन दोनों ने आपस में करनी है शादी लेकिन अपनी-अपनी मम्मियों के आगे इनकी ही नहीं इनके बापों की भी नहीं चलती। इनकी मम्मियों की तो... जय।
