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Thursday, 27 May 2021

रिव्यू-निःशब्द करती ‘हैंडओवर’

किसी अखबार में छपा कि बिहार के एक गांव में एक मां ने गरीबी से तंग आकर अपनी बच्ची बेच दी। मीडिया में खबर उछली तो बवाल हो गया। सरकार हिलने लगी। तुरंत एक अफसर को भेजा गया कि बच्ची को तलाशो और जाकर उसकी मां को हैंडओवर कर दो। अफसर ने हुक्म बजाया। पर क्या इससे समस्या सुलझ गई? क्या बच्ची सचमुच बेची गई थी? क्या मां वाकई दोषी थी? क्या बच्ची वापस लाने का सरकार का कदम सही था? यह फिल्म इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करती है, एक सार्थक कोशिश।

Friday, 25 May 2018

रिव्यू-सच के पोखरण में फिल्मी ‘परमाणु’


-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
1998 में पोखरण में हुए परमाणु परीक्षण कितने जरूरी थे? उनसे हमारे देश की सामरिक ताकत कितनी बढ़ी? और क्या उसी वजह से 1999 में हमें कारगिल झेलना पड़ा? इस किस्म के सवाल राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्रों में बहस का मुद्दा हो सकते हैं। लेकिन यह फिल्म ऐसी किसी बहस में पड़े बिना सीधे-सीधे यह दिखाती है सुबह के अखबार में जब आप ऐसी कोई खबर पढ़ते हैं कि भारत ने परमाणु परीक्षण कियातो इसके पीछे असल में कितने सारे लोगों की दिमागी और शारीरिक मेहनत लगी होती है। कितने सारे लोगों ने उसमें अपने और अपनों के सपनों की आहुति दी होती है। और बस, यहीं आकर यह एक ज़रूरी फिल्म हो जाती है।