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Thursday, 24 October 2019

रिव्यू-‘मेड इन चाइना’-चाईनीज़ शफाखाने का चिंदी चूरण

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चीन से सरकारी दौरे पर गुजरात आया एक अफसर यहां का एक सूप पीकर मर जाता है। सी.बी.आई. के लोग सूप बेचने वाले डॉक्टर (बोमन ईरानी) और उसे बनाने वाले रघु (राजकुमार राव) तक पहुंचते हैं। आरोप लगता है कि इस सूप में चीन से मंगवाए गए बाघ के शरीर के हिस्से हैं। तब रघु उन्हें पूरी कहानी बताता है कि कैसे हर धंधे में नाकाम होने के बाद उसने इस मैजिक सूपका कारोबार शुरू किया जिससे मर्दों की पॉवर’ बढ़ती है। कैसे उसने इस काम में डॉक्टर और बाकी लोगों को जोड़ा। कैसे इन लोगों ने आम जनता में फैली भ्रांतियों को दूर करने का काम किया, वगैरह-वगैरह। पर क्या सचमुच इस सूप में कुछ आपत्तिजनक था? क्या सचमुच वह अफसर इस सूप की वजह से ही मरा? और क्या सच में यह सूप वायग्रा से कई गुना ज़्यादा ताकतवर है?

Friday, 24 May 2019

रिव्यू-भाता है वह ‘मोदी’ तो भाएगी यह ‘मोदी’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Review)
जिस फिल्म का नाम पी एम नरेंद्र मोदीहो और जिसमें करोड़ों लोगों के प्रिय (और करोड़ों के अप्रिय भी) नेता नरेंद्र मोदी की जीवन-यात्रा दिखाई गई हो तो दर्शक उसमें क्या देखना चाहेंगे? इस सवाल के दो जवाब हो सकते हैं। पहला यह कि मोदी-समर्थक इस फिल्म में मोदी की महिमा का मंडन और उनका प्रशस्ति-गान देखना चाहेंगे और दूसरा यह कि मोदी-विरोधी इसे... देखना ही क्यों चाहेंगे? तो कुल जमा निष्कर्ष यह कि जब यह फिल्म देखनी ही मोदी समर्थकों ने है तो इसमें ऐसा कुछ क्यों डालना जो मोदी-विरोधियों को खुश करे? और जब इसे मोदी-विरोधियों ने देखना ही नहीं है तो क्यों इसमें ऐसी चीज़ें भरपूर मात्रा में डाली जाएं जो मोदी-समर्थकों को रास आएं? और जब रास आने वाली चीज़ें ही डालनी हैं तो फिर क्या तो सिर, क्या पैर, क्या तो लॉजिक और क्या तथ्य!

Friday, 25 May 2018

रिव्यू-सच के पोखरण में फिल्मी ‘परमाणु’


-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
1998 में पोखरण में हुए परमाणु परीक्षण कितने जरूरी थे? उनसे हमारे देश की सामरिक ताकत कितनी बढ़ी? और क्या उसी वजह से 1999 में हमें कारगिल झेलना पड़ा? इस किस्म के सवाल राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्रों में बहस का मुद्दा हो सकते हैं। लेकिन यह फिल्म ऐसी किसी बहस में पड़े बिना सीधे-सीधे यह दिखाती है सुबह के अखबार में जब आप ऐसी कोई खबर पढ़ते हैं कि भारत ने परमाणु परीक्षण कियातो इसके पीछे असल में कितने सारे लोगों की दिमागी और शारीरिक मेहनत लगी होती है। कितने सारे लोगों ने उसमें अपने और अपनों के सपनों की आहुति दी होती है। और बस, यहीं आकर यह एक ज़रूरी फिल्म हो जाती है।

Friday, 5 August 2016

रिव्यू-द ‘झंड’ ऑफ माइकल मिश्रा

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
अरशद सर आपको एक फिल्म में लेना है, कहानी यह है कि...!
अरे छोड़ यार, पैसे कितने दोगे, यह बोलो...?
अदिति मैम, आप अरशद वारसी की हीरोइन होंगी, कहानी...!
छोड़िए भी, पैसे बताइए...!
बोमन सर, आपको और आपके बेटे को एक साथ लेंगे।
ओह गुड, डन। पैसे बोलो...!
प्रोड्यूसर जी, अरशद-अदिति-बोमन राजी हो गए हैं। कहानी सुन लीजिए...।
अरे छोड़ यार, पैसे बोल कितने लगेंगे...?