छत्तीसगढ़ का एक छोटा-सा शहर। यहां हर कोई हर किसी को जानता है। लेकिन बिल्लू यानी प्रेम कुमार यादव को अपनी खुद की पहचान बनानी है। सो,
पिता की तरह जंगल विभाग की चपरासीगिरी न करके वह शहर से बाहर वाली सड़क पर पान का खोखा लगा लेता है। सड़क वीरान है और बिल्लू का धंधा भी। पर तभी सामने वाले इकलौते घर में रहने आए इंजीनियर साहब की जवान होती लड़की के चक्कर में शहर भर के लौंडे-लपाड़ों की भीड़ वहां लगने लगती है। बिल्लू का धंधा चमकने लगता है और उसके अरमान भी। पहचान तो खैर, उसकी बन ही जाती है।
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Wednesday, 15 July 2020
रिव्यू-छोटे शहर की लवली-सी कहानी ‘चमन बहार’
छत्तीसगढ़ का एक छोटा-सा शहर। यहां हर कोई हर किसी को जानता है। लेकिन बिल्लू यानी प्रेम कुमार यादव को अपनी खुद की पहचान बनानी है। सो,
पिता की तरह जंगल विभाग की चपरासीगिरी न करके वह शहर से बाहर वाली सड़क पर पान का खोखा लगा लेता है। सड़क वीरान है और बिल्लू का धंधा भी। पर तभी सामने वाले इकलौते घर में रहने आए इंजीनियर साहब की जवान होती लड़की के चक्कर में शहर भर के लौंडे-लपाड़ों की भीड़ वहां लगने लगती है। बिल्लू का धंधा चमकने लगता है और उसके अरमान भी। पहचान तो खैर, उसकी बन ही जाती है।Friday, 25 May 2018
रिव्यू-सच के पोखरण में फिल्मी ‘परमाणु’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
1998 में पोखरण में हुए परमाणु परीक्षण कितने जरूरी थे? उनसे हमारे देश की सामरिक ताकत कितनी बढ़ी? और क्या उसी वजह से 1999 में हमें कारगिल झेलना पड़ा? इस किस्म के सवाल राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्रों में बहस का मुद्दा हो सकते हैं। लेकिन यह फिल्म ऐसी किसी बहस में पड़े बिना सीधे-सीधे यह दिखाती है सुबह के अखबार में जब आप ऐसी कोई खबर पढ़ते हैं कि ‘भारत ने परमाणु परीक्षण किया’ तो इसके पीछे असल में कितने सारे लोगों की दिमागी और शारीरिक मेहनत लगी होती है। कितने सारे लोगों ने उसमें अपने और अपनों के सपनों की आहुति दी होती है। और बस, यहीं आकर यह एक ज़रूरी फिल्म हो जाती है।
1998 में पोखरण में हुए परमाणु परीक्षण कितने जरूरी थे? उनसे हमारे देश की सामरिक ताकत कितनी बढ़ी? और क्या उसी वजह से 1999 में हमें कारगिल झेलना पड़ा? इस किस्म के सवाल राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्रों में बहस का मुद्दा हो सकते हैं। लेकिन यह फिल्म ऐसी किसी बहस में पड़े बिना सीधे-सीधे यह दिखाती है सुबह के अखबार में जब आप ऐसी कोई खबर पढ़ते हैं कि ‘भारत ने परमाणु परीक्षण किया’ तो इसके पीछे असल में कितने सारे लोगों की दिमागी और शारीरिक मेहनत लगी होती है। कितने सारे लोगों ने उसमें अपने और अपनों के सपनों की आहुति दी होती है। और बस, यहीं आकर यह एक ज़रूरी फिल्म हो जाती है।
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