Sunday, 22 January 2017

नरेंद्र झा-करता हूं किरदार में उतरने की कोशिश


-दीपक दुआ...

बिहार के मधुबनी से दिल्ली आकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से इतिहास की पढ़ाई करने के बाद नरेंद्र झा ने पलटी मारी और अभिनय को अपना कैरियर बनाने में जुट गए। छोटे पर्दे पर रावणसे पहचान मिली और फिर हैदर’, ‘घायल वन्स अगेन’, ‘फोर्स 2’ जैसी फिल्में करने के बाद अब वह 26 जनवरी के मौके पर एक ही दिन रिलीज हो रहीं रईसऔर काबिलमें रहे हैं। उनसे हुई एक बातचीत के प्रमुख अंश-

-जे.एन.यू. की पढ़ाई और उसके बाद मुंबई की उड़ान। यह सफर कैसा रहा?
-असल में मैं जब पढ़ रहा था तो उस समय यही सोचा था कि या तो सिविल सर्विस में जाएंगे या लैक्चरशिप करेंगे। लेकिन एक्टिंग का कीड़ा बचपन से मेरे अंदर था। स्कूल में, कॉलेज में मैं अक्सर स्टेज पर नाटक किया करता था। तो जब यह लगा कि पढ़ाई-लिखाई वाली लाइन में नहीं जाना है और यार-दोस्त भी यह सलाह देने लगे थे कि तुम एक्टर बनो तो मैंने सबसे पहले अपने पिता जी से सलाह ली और उन्होंने यही कहा कि जो करो, पूरी तैयारी के साथ करो और उसी के बाद मैंने दिल्ली के श्रीराम सैंटर में अभिनय के कोर्स में दाखिला लिया था।

-लेकिन आमतौर पर तो परिवार वाले एक्टिंग को कैरियर बनाने को लेकर हतोत्साहित ही करते हैं?
-हां, ऐसा होता है लेकिन मैं शायद इस मामले में सौभाग्यशाली रहा। और चूंकि मैं चार भाइयों में सबसे छोटा हूं तो मुझे हमेशा घर में सभी का स्नेह और समर्थन मिला। भाइयों ने भी मेरे फैसले को स्वीकारा और इसीलिए तो मुझे कभी दुविधा हुई और ही असुविधा।

-मुंबई आते समय कोई बैकअप प्लान भी था या बस, यूं ही गए?
-सच कहूं तो कुछ नहीं सोचा था। मुंबई में मेरे एक कजिन रहते थे और मैं आकर उनके पास ठहर गया। कुछ महीने तो इस शहर और यहां के माहौल को समझने में लग गए और उसके बाद मॉडलिंग का मेरा सफर जो शुरू हुआ तो इस रफ्तार से हुआ कि मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। इसके बाद मुझे टी.वी. सीरियल मिलने लगे और फिर फिल्में। बस, तब से अब तक यह सफर जारी है और कभी किसी बैकअप प्लान की जरूरत ही महसूस नहीं हुई।

-यानी आप यह तय करके नहीं आए थे कि मुंबई जाकर मॉडलिंग करनी है, टी.वी. में काम करना है या फिल्मों में?
-जी बिल्कुल। मुझे जो काम मिलता गया मैं उसी को पूरे समर्पण और मेहनत से करता चला गया। मुझे अक्सर लोग पूछते हैं कि फिल्मों में आने में मैंने इतनी देर क्यों लगा दी तो मेरा जवाब होता है कि इतने बड़े कालखंड में क्या देर और क्या सवेर। और असल बात तो यह है कि मुझे टी.वी. पर इतना सारा काम और इतने अच्छे पैसे मिल रहे थे कि फिल्मों की तरफ मेरा ध्यान गया ही नहीं।

-इस सफर ने आपको आत्मविश्वास भी तो तो भरपूर दिया होगा?
-हां, और यही वजह है कि अब मेरे सामने चाहे कोई भी एक्टर खड़ा हो, मुझे यह नहीं लगता कि अरे यह तो बहुत बड़ा दिग्गज है या यह तो बहुत बड़ा स्टार है। मेरे अब तक के काम ने मुझे इतनी हिम्मत तो दे दी है कि मैं किसी के भी सामने और किसी के भी साथ बिना किसी झिझक के काम कर सकता हूं।

-लेकिन कभी यह ख्याल मन में नहीं आया कि मुंबई की सड़कों पर लगे फिल्मों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स में मेरा भी चेहरा दिखे?
-अगर कहूं कि यह ख्याल मुझे कभी नहीं आया तो यह झूठ होगा। लेकिन एक सच यह भी है कि जो बड़े-बड़े टी.वी. सीरियल में कर रहा था और उनमें जो शीर्षक भूमिकाएं मैं निभा रहा था, वह मेरी इस इच्छा की पूर्ति कर रहे थे। रावणमें मैं रावण बना था और पूरे मुंबई में हर तरफ मेरे होर्डिंग्स और पोस्टर लगा करते थे। फिर मैंने अपने अंदर इस सच को हमेशा स्वीकारा है कि इंसान को जब जो मिलना होगा, तभी मिलेगा और उतना ही मिलेगा।

-‘रईसऔर काबिलके अपने किरदारों के बारे में बताएं?
-‘रईसमें मैं मुंबई के एक ऐसे डॉन का किरदार कर रहा हूं जो रईस यानी शाहरुख खान को शरण देता है और कहानी में उसकी बहुत अहमियत है क्योंकि बहुत सारे मायनों में वह इस कहानी को आगे ले जाने में मदद करता है। काबिलमें मैं एक पुलिस अफसर बना हूं जो इस कहानी में हुए मुकदमे की अपनी तरह से भी जांच कर रहा है।

-कभी ऐसा महसूस होता है कि चमकते सितारों वाली फिल्म के असली आधार स्तंभ तो असल में आप जैसे वे कलाकार हैं जिन्हें हम सपोर्टिंग कलाकार कहते हैं?
-अब सच तो यही है कि जिस फिल्म में सपोर्टिंग किरदार और उन्हें निभाने वाले कलाकार मजबूत होते हैं उस फिल्म को लोग ज्यादा पसंद भी करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि सितारों के कारण ही किसी फिल्म का ढांचा खड़ा होता है और फिर उसे हम जैसे कलाकारों के सपोर्ट की जरूरत पड़ती है।

-‘मोहेंजो दारोमें आपके काम को सराहा गया लेकिन आपका गैटअप ऐसा था कि आप पहचाने ही नहीं गए। तो यह कसक मन में नहीं आई कि लोगों ने तो आपको पहचाना ही नहीं?
-जब आप खुद को अपने डायरेक्टर के हाथों में सौंप देते हैं तो उसके बाद आपको उसके किसी निणर्य पर सवाल उठाने का हक नहीं रहता। बतौर कलाकार हम खुद को अपने डायरेक्टर को सौंप देते हैं और उसके बाद किसी कसक को मन में लाने का सवाल ही नहीं उठता।

-किसी किरदार के लिए खुद को तैयार करने की आपकी प्रक्रिया कैसी रहती है?
-जब मुझे कोई किरदार दिया जाता है और वह स्क्रिप्ट और उसके डायलॉग मुझे मिलते हैं तो मैं उसे कई बाद पढ़ता हूं। दस बार, बीस बार, पचास बार और जैसे-जैसे मैं उसे पढ़ता जाता हूं वैसे-वैसे वह किरदार मेरे सामने आकार लेने लगता है। एक काम मैं और करता हूं कि जैसा वह किरदार होता है, वैसे ही किरदारों को मैं अपने आसपास खोजता हूं, लोगों को ऑब्जर्व करता हूं और कोशिश करता हूं कि जो देखूं, उसे आत्मसात करके उस किरदार में ला पाऊं।


 -किसी फिल्म को करते समय बॉक्स-ऑफिस के नजरिए से भी सोचते हैं?
-बिल्कुल सोचता हूं और दुआ भी करता हूं कि जो फिल्म मैं करूं वह खूब अच्छी बने ताकि लोग उसे देखने आएं और निर्माता को मुनाफा हो क्योंकि निर्माता जिंदा रहेंगे तो और अच्छी फिल्में बनेंगी और तभी हम जैसे कलाकारों को काम मिलेगा।
 
-क्या रंगमंच से अभी भी जुड़े हुए हैं?
-मन तो बहुत करता है कि जुड़ा रहूं लेकिन अब समय का थोड़ा-सा अभाव रहता है।

-आपको नहीं लगता कि रंगमंच से आने वाले आप जैसे कलाकार इसे बस एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं और फिर झटक देते हैं?
-बात तो सही है लेकिन ऐसा जान-बूझकर नहीं होता है। रंगमंच की अपनी एक दुनिया है जो काफी सारा समय और समर्पण मांगती है और यह भी एक सच है रंगमंच उसके बदले में उतना पैसा नहीं दे पाता है। मैं मुंबई आकर काफी समय तक रंगमंच से जुड़ा रहा और अभी भी मेरी इच्छा है कि फिर से नाटक किए जाएं लेकिन मुझे यह भी पता है कि अगले कुछ समय तक मैं इस इच्छा को पूरा करने का समय नहीं निकाल पाऊंगा।

-आने वाली अपनी फिल्मों में से किसी खास का जिक्र करना चाहेंगे?
-एक फिल्म है जिसे जयदीप चोपड़ा ने निर्देशित किया है ‘2016- एंड यह एक अलग किस्म की फिल्म है और मुझे उम्मीद है कि जो लोग सिनेमा में कुछ नया और अनोखा देखना पसंद करते हैं, वे इसे काफी पसंद करेंगे।

Saturday, 21 January 2017

रिव्यू-कम मीठी कम कड़क ‘कॉफ़ी विद् डी’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
डी यानी अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद इब्राहिम दुनिया भर के लोगों, सरकारों और मीडिया के लिए एक अलग ही किस्म के आकर्षण का केंद्र रहा है। इस शख्स से जुड़े सच्चे-झूठे किस्सों को लेकर अगर रचने बैठें तो ढेरों किस्म की कहानियां बुनी जा सकती हैं। यह फिल्म भी ऐसा ही कुछ कर रही है जिसमें अपने टी.वी. चैनल की रेटिंग बढ़ाने के लिए एक पत्रकार डी से जुड़ी झूठी कहानियां चैनल पर दिखाता है ताकि डी उसे खुद बुला कर अपना इंटरव्यू दे। मामला रोचक लगता है। दिलचस्प बात यह है कि पत्रकार का किरदार असल पत्रकार अर्णब गोस्वामी सरीखा है जो अपने टी.वी. शोज में इंटरव्यू देने वाले पर बुरी तरह हावी हो जाते हैं। इसके अलावा भी कई रोचक चीजें फिल्म में हैं। बावजूद इसके यह फिल्म पूरी तरह से रोचक नहीं बन पाई है क्योंकि इसकी स्क्रिप्ट और डायरेक्शन में वह पैनापन नहीं है जो इस किस्म की कहानियों के लिए जरूरी होता है।

कुछ बरस पहले ऐसी ही कहानी पर तेरे बिन लादेनआई थी जिसमें एक पाकिस्तानी टी.वी. पत्रकार नकली लादेन का इंटरव्यू लेता है और दुनिया उसे असली समझ लेती है। लेकिन वह फिल्म पूरी तरह से हास्य और तंज की पटरी पर टिकी रही थी जबकि यह फिल्म लड़खड़ाती दिखाई देती है। सिनेमाई ढांचे का सीधा-सा मंत्र है कॉमेडी करो तो जम कर करो और अगर चोट मारनी है तो जोरदार मारो। यह फिल्म इसी असमंजस का शिकार नजर आती है कि इसे कॉमेडी फिल्म बनाया जाए या हार्ड-हिटिंग। इसकी स्क्रिप्ट का कई जगह ढीला पड़ना, लंबे और बेवजह आने वाले सीन फिल्म को कमजोर बनाते हैं।

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि फिल्म पूरी तरह से पैदल है। हर कुछ देर बाद कोई न कोई सीन आकर हंसा जाता है। हास्य के जरिए कुछ सार्थक कहने की कोशिश भी दिखाई देती है। लेकिन ये चीजें बस टुकड़ों-टुकड़ों में ही अच्छी लगती हैं और लंबे समय तक असर नहीं छोड़ पातीं। ऊपर से कुछ बातें सेंसर ने उड़ा दीं तो कुछ दुबई से आए फोन ने और इसकी वजह से बार-बार म्यूट होते और आवाज बदल कर आते संवाद मजा और कम करते हैं।

सुनील ग्रोवर साबित करते हैं कि वह सिर्फ गुत्थी या डॉ. मशहूर गुलाटी ही नहीं हैं बल्कि मौका मिले तो वह इनसे हट कर भी कुछ कर सकते हैं लेकिन दिक्कत यह रही कि उनका किरदार शुरू में ज़ोरदार होते हुए बाद में कमजोर पड़ जाता है। डी बने जाकिर हुसैन जंचते हैं और सुनील उनके सामने फीके-से लगने लगते हैं। क्लोज-अप में सुनील नहीं जंचते। पंकज त्रिपाठी और राजेश शर्मा हर बार की तरह उम्दा काम कर गए। दीपानिता शर्मा और अंजना सुखानी के किरदार ही बिल्कुल हल्के थे। फिर भी अंजना अपने रोल को कायदे से कर गईं। म्यूजिक कुछ खास नहीं रहा। असल में पूरी फिल्म ही कुछ खास नहीं रही जबकि ऐसी ही फिल्में होती हैं जो कायदे से बुनी-बनाई जाएं तो बड़े बजट और चमकते चेहरों वाली फिल्मों को चुनौती देकर दिलों में उतर सकती हैं। पहली बार निर्देशन के मैदान में उतरे विशाल मिश्रा थोड़े और संभल कर चलते तो यह एक कमाल की फिल्म हो सकती थी। मगर अभी तो यह वाली कॉफ़ी कम मीठी, कम कड़क और हल्की झाग वाली ही है।
अपनी रेटिंग-दो स्टार

Friday, 13 January 2017

रिव्यू-ओके ‘जानू’ टाटा बाय बाय...!

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
आज की युवा पीढ़ी। एक तरफ रिश्ते दूसरी तरफ कैरियर। एक तरफ प्यार दूसरी तरफ सपने। इससे जुड़ें या उसको लपकें। इससे बंधें या उस तरफ दौड़ लगाएं।
युवाओं की इस कन्फ्यूजन को लेकर अब तक 256 दफा तो फिल्में बन ही चुकी होंगी। तो फिर इस फिल्म में नया क्या है? जवाब है-कुछ नहीं। कुछ तो नया होगा-कहानी, पटकथा, प्रेजेंटेशन, भावनाएं, सीख, सैटअप...? अजी बोला न-कुछ भी नया नहीं है इसमें।
 
इससे पहले शाद अली मणिरत्नम निर्देशित तमिल फिल्म अलाइपायुदेको हिन्दी में साथियानाम से बना चुके हैं। ये दोनों ही फिल्में उम्दा थीं। लेकिन ओके जानूमणिरत्नम की जिस ओ काधल कनमणिपर बनी है वह हिट होने के बावजूद कोई बहुत बेहतरीन फिल्म नहीं थी। शाद ने या इसके निर्माताओं करण जौहर और मणिरत्नम ने इसमें हिन्दी के दर्शकों के लिए क्या खास देख कर इसके रीमेक के लिए जुगत लड़ाई, यह वही बेहतर बता सकते हैं।

हम दोस्ती करेंगे, सैक्स करेंगे, लेकिन एक-दूसरे पर हक नहीं जताएंगे और शादी नहीं करेंगेका नारा बुलंद करके एक-दूसरे के करीब आने वाले लड़के-लड़की के बीच प्यार उपजने और फिर शादी करने की बासी कढ़ी को यहां धीमी आंच पर उबाला गया है। बस, यही धीमी आंच ही इस फिल्म की सबसे बड़ी दुश्मन है जो इस कढ़ी को कायदे से उबलने ही नहीं देती। फिल्म इस कदर सपाट है कि थोड़े ही वक्त के बाद इससे उकताहट होने लगती है। बीच-बीच में होठों पर हल्की मुस्कुराहटें जरूर आती रहती हैं और एक बड़ी बात यह भी कि यह फिल्म कहीं फूहड़ नहीं होती, सिवाय हम्मा हम्मा...वाले उस गाने के जिसमें आदित्य और श्रद्धा ने बेहद घटिया डांस किया है। मणिरत्नम की ही बाॅम्बेमें ए.आर. रहमान के बनाए हम्मा हम्मा...वाले गाने को इतने घटिया तरीके से रीमिक्स करने की बजाय यहां जस का तस रख दिया जाता तो कहीं बेहतर होता।

आदित्य राय कपूर और श्रद्धा कपूर की लव-स्टोरी से बेहतर तो पर्दे पर नसीरुद्दीन शाह और लीला सैमसन की प्रेम-कहानी लगती है। इन दोनों ने काम भी बहुत खूब किया है। प्यारे तो आदित्य और श्रद्धा भी लगे हैं लेकिन इनके किरदारों में ही दम नहीं था तो ये बेचारे उसमें कहां से जान डालते। गुलजार-रहमान की जोड़ी का बनाया गीत-संगीत भी साधारण रहा है और एक-दो को छोड़ बाकी गाने आकर कहानी की पहले से ही धीमी रफ्तार को और मंद करते हैं। साल की इस पहली बड़ी फिल्म पर पैसे और वक्त लगाने की बजाय इसे दूर से ही ओके, टाटा, बाय-बाय करने में ही समझदारी होगी।
अपनी रेटिंग-दो स्टार