1999 में
हुई कारगिल
की लड़ाई
में भारत
ने क्या
खोया, क्या
पाया और
किस कीमत
पर पाया,
यह हम सब जानते
हैं। उस
युद्ध में
जान लड़ाने
और जान
गंवाने वाले
वीरों की
कहानियों को
सिनेमा में
भी दिखाया
गया जिनमें
से एक
‘एल.ओ.सी.
कारगिल’ ही
अब तक
सबसे प्रभावी
कही जा
सकती है।
करण जौहर
के बैनर
से अमेज़न
प्राइम पर
आई यह
फिल्म ‘शेरशाह’
भी उससे
ऊपर नहीं
उठ पाई
है। दरअसल
वॉर-हीरोज़
की कहानियों
का एक
तय ढर्रा
बना दिया
गया है।
उनका बचपन,
रोमांस, सेना
में जाने
की ललक
और सेना
में रह
कर दिखाए
गए शौर्य
के इर्द-गिर्द
ही ये
कहानियां घूमती
हैं। यह
फिल्म भी
वैसी ही
है।
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Thursday, 12 August 2021
Wednesday, 15 May 2019
रिव्यू-फिल्म नहीं, लानत है ‘स्टूडैंट ऑफ द ईयर 2’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
चलो-चलो एक फिल्म बनाएं। कुछ चमकदार चेहरे जुटाएं। उन चेहरों पर मेकअप की परतें चढ़ाएं। उन्हें रंगीन कपड़े पहनाएं। माहौल को चकाचौंध बनाएं। रही कहानी की बात,
तो उसे भूल जाएं। चलो,
पब्लिक को बेवकूफ बनाएं। चलो-चलो एक फिल्म बनाएं।
2012 में आई ‘स्टुडैंट ऑफ द ईयर’ की ही तरह इस फिल्म में भी भरपूर रंगीनियत है। देहरादून के एक शानदार कॉलेज में दोस्ती-दुश्मनी निभाते युवाओं की कहानी है। एक तरफ हर हुनर में माहिर अपना गरीब हीरो है। दूसरी तरफ कॉलेज के सबसे हैंडसम और अमीर लौंडे (ज़ाहिर है कॉलेज के ट्रस्टी के बेटे) में भी हर हुनर है। डांस, रोमांस, गाना-बजाना,
पीटना,
कबड्डी वगैरह-वगैरह। गरीब की गर्लफ्रैंड इस अमीर पर मरती है और अमीर की नकचढ़ी बहन को गरीब अपनी तरफ खींच लेता है। पढ़ाई-वढ़ाई इस कॉलेज में होती नज़र नहीं आती। टीचर यहां के जोकरनुमा हैं। मोबाइल फोन पूरी फिल्म में किसी के पास नहीं दिखता। नेटवर्क प्रॉब्लम होगी शायद।
Sunday, 21 April 2019
रिव्यू-सिनेमा की हीरा मंडी में जन्मी एक नाजायज़ फिल्म-'कलंक'
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
प्यार, नफरत, गुस्सा, घृणा, त्याग, ममता, हास्य, वगैरह-वगैरह जैसी बहुत सारी फीलिंग्स किसी कहानी को पढ़ते-देखते समय हमारे मन में उपजती है। पर क्या आप यकीन करेंगे कि 'कलंक' देखते समय किसी किस्म का कोई भाव ही नहीं उपजता। इस कदर भावशून्य कहानी है कि फ़िल्म शुरू होने के बाद फ़िल्म से, खुद से, ज़िंदगी से भरोसा उठने लगता है। मन होता है कि थिएटर में सो जाएं, या बेहतर होगा कि ऐसी फ़िल्म देखने से तो अच्छा है, मर ही जाएं...!
प्यार, नफरत, गुस्सा, घृणा, त्याग, ममता, हास्य, वगैरह-वगैरह जैसी बहुत सारी फीलिंग्स किसी कहानी को पढ़ते-देखते समय हमारे मन में उपजती है। पर क्या आप यकीन करेंगे कि 'कलंक' देखते समय किसी किस्म का कोई भाव ही नहीं उपजता। इस कदर भावशून्य कहानी है कि फ़िल्म शुरू होने के बाद फ़िल्म से, खुद से, ज़िंदगी से भरोसा उठने लगता है। मन होता है कि थिएटर में सो जाएं, या बेहतर होगा कि ऐसी फ़िल्म देखने से तो अच्छा है, मर ही जाएं...!Friday, 20 July 2018
रिव्यू-‘धड़क’ न तो ‘सैराट’ है न ‘झिंगाट’
-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
ऊंची जात की अमीर लड़की। नीची जात का गरीब लड़का। आकर्षित हुए, पहले
दोस्ती, फिर प्यार कर बैठे। घर वाले आड़े आए तो दोनों भाग गए। जिंदगी की कड़वाहट को करीब से देखा, सहा
और धीरे-धीरे सब पटरी पर आ गया। लेकिन...!
इस कहानी में नया क्या है, सिवाय
अंत में आने वाले एक जबर्दस्त ट्विस्ट के? कुछ
भी तो नहीं। फिर इसी कहानी पर बनी मराठी की ‘सैराट’
कैसे इतनी बड़ी हिट हो गई कि तमाम भाषाओं में उसके रीमेक बनने लगे। कुछ बात तो जरूर रही होगी उसमें। तो चलिए, उसका
हिन्दी रीमेक भी बना देते हैं। कहानी को महाराष्ट्र के गांव से उठा कर राजस्थान के उदयपुर शहर में फिट कर देते हैं। हर बात, हर
संवाद में ओ-ओ लगा देते हैं। थारो, म्हारो,
आयो, जायो, थे,
कथे, कोणी, तन्नै,
मन्नै जैसे शब्द डाल देते हैं (अरे यार, उदयपुर
जाकर देखो, लोग
प्रॉपर हिन्दी भी बोल लेते हैं। और हां, यह
‘पनौती’ शब्द
मुंबईया है, राजस्थानी
नहीं)। हां, गानों
के बोल हिन्दी वाले रखेंगे और संगीत मूल मराठी फिल्म वाला(ज्यादा मेहनत क्यों करें)। ईशान खट्टर और जाह्नवी कपूर जैसे मनभावन चेहरे, शानदार
लोकेशंस, रंग-बिरंगे सैट, उदयपुर
की खूबसूरती... ये सब मिल कर इतना असर तो छोड़ ही देंगे कि पब्लिक इसे देखने के लिए लपकी चली आए।
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