राजस्थान की कथा-भूमि बहुत उर्वरक है। लेकिन नामालूम कारणों से हिन्दी सिनेमा यहां उपजी कहानियों के प्रति उदासीन रहा है। यह फिल्म इस सन्नाटे को कम करती है। राजस्थान में बसे चरणसिंह पथिक (जिनकी कहानी पर विशाल भारद्वाज ‘पटाखा’ बना चुके हैं) की कहानी पर राजस्थान के ही फिल्मकार गजेंद्र एस. श्रोत्रिय की बनाई यह फिल्म सिनेमा में गांव, गांव की कहानी और ग्रामीण किरदारों की कमी को दूर करने की छोटी ही सही,
मगर सार्थक कोशिश लगती है। शेमारू मी पर इस फिल्म को सिर्फ 89 रुपए में देखा जा सकता है।
Sunday, 15 November 2020
रिव्यू-अपने भीतर के ‘कसाई’ से रूबरू करवाती कहानी
Saturday, 7 November 2020
वेब रिव्यू-कमज़ोर, लाचार, लचर ‘बेबस’
-दीपक दुआ...
शहर में चुनाव होने वाले हैं। राजनीति के दो माहिर खिलाड़ी इस बार ज़रा घबराए हुए से हैं क्योंकि हर तरफ समाजसेवी मोनिका देवी के चर्चे हैं। ये दोनों मिल कर विचार करते हैं कि मोनिका देवी को रास्ते से कैसे हटाया जाया। उसी रात कोई मोनिका देवी को उनके घर से उठा ले जाता है। कौन है वो?
किस के इशारे पर हुआ यह अपहरण? क्या इसके पीछे कोई और भी राज़ है?
Monday, 2 November 2020
वेब रिव्यू-थोड़ी क्रैक, थोड़ी डाउन ‘क्रैकडाउन’
दुश्मन गैंग का एक बंदा मर गया तो पुलिस वालों ने उसके किसी हमशक्ल को ट्रेनिंग देकर उनके गैंग में भेज दिया। एक न एक दिन तो उसकी पोल खुलनी ही थी। क्यों, याद आ गई न अमिताभ बच्चन वाली ‘डॉन’? आने दीजिए, हमारे फिल्मी लेखकों को इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं होती कि आप उनकी लिखी कहानी के बारे में क्या सोचते हैं। उन्हें तो बस मनोरंजन परोसना होता है, चाहे इस शक्ल में परोसा जाए या उस शक्ल में। और इस वेब-सीरिज़ में तो इस्लामी आतंकवादी हैं,
उन्हें पकड़ते रॉ के एजेंट हैं, इस पकड़म-पकड़ाई में कभी वे जीतते हैं तो हार भी जाते हैं। भई, अगला सीज़न भी तो बनाना है न।
Friday, 16 October 2020
रिव्यू-आशा और निराशा के बीच झूलती ‘अटकन चटकन’
झांसी के पास जमुनिया नाम के एक गांव का 11 बरस का लड़का गुड्डू। उसे हर चीज़ में संगीत सुनाई देता है। मां नहीं है और बाप शराबी। झांसी में एक चाय की दुकान पर काम करते-करते वह तानसेन संगीत महाविद्यालय में शिक्षा पाने का सपना देखता है। लेकिन उसकी प्रतिभा देख कर तानसेन वाले ही इसकी शरण में चले आते हैं। अपने कुछ साथियों के साथ मिल कर वह एक कंपीटिशन में तानसेन वालों को जितवा देता है।
Sunday, 4 October 2020
रिव्यू-डॉली किट्टी के खोखले सितारे
दिल्ली से सटा नोएडा और उससे सटा ग्रेटर नोएडा। अपने परिवार संग रहती डॉली। बिहार से उसकी कज़िन किट्टी भी आ बसी उसके यहां। दोनों उड़ना चाहती हैं। अपनी अधूरी तमन्नाएं, दमित इच्छाएं पूरी करना चाहती हैं। करती भी हैं और नारी ‘मुक्त’ हो जाती है।
राईटर-डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव अपनी फिल्मों के ज़रिए ‘नारी मुक्ति’ का झंडा उठाए रहती हैं। अपनी पिछली फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ में भी वह यही कर रही थीं। चार औरतों की कहानी के बरअक्स उन्होंने उस फिल्म में भी नारी की अधूरी, दबी हुई इच्छाओं को दिखाने का प्रयास किया था। लेकिन तब भी और अब तो और ज़्यादा, वह अपने इस प्रयास में विफल रही हैं। और इसका कारण यह है कि अलंकृता अपने मन में यह छवि बिठा चुकी हैं कि नारी तभी ‘मुक्त’ हो सकती है जब वह पुरुष की सब बुराइयां, सारी कमियां अपना ले। उस फिल्म के रिव्यू में मैंने यही लिखा था (यहां क्लिक करें) कि ‘‘ क्या फ्री-सैक्स, शराब-सिगरेट, फटी जींस और अंग्रेजी म्यूजिक अपनाने भर से औरतें आजाद हो जाएंगी? आजादी के ये प्रतीक क्या इसलिए, कि यही सब पुरुष करता है?
अगर ऐसा है तो फिर औरत यहां भी तो मर्द की पिछलग्गू ही हुईं? फिल्मकारों को नारीमुक्ति की इस उथली और खोखली बहस से उठने की जरूरत है।’’
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