-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पहले ही सीन में जब मेरठ का बउआ सिंह अखबार की एक खबर सुनाने के एवज में अपने दोस्तों पर 500 रुपए के नोटों की पूरी गड्डी लुटा देता है तो पता चल जाता है कि आप एक 'फिल्म' देखने आए हैं। फिल्म-जिसका वास्तविकता से कोई नाता नहीं होता, वही वास्तविकता जो निर्देशक आनंद एल. राय और लेखक हिमांशु शर्मा की जोड़ी अपनी कई फिल्मों में देकर तारीफें और कामयाबी बटोर चुकी है। लेकिन इस बार इन्हें सुपरस्टार शाहरुख खान का साथ मिला है और अफसोस, कि इन जैसे लोग भी स्टार वाली चुंधियाहट से बच न सके। वैसे, फिल्म की कहानी 'फिल्मी' होते हुए भी बुरी नहीं है। बल्कि इस कहानी के 'हटके' होने की तारीफ होनी चाहिए और इस पर फिल्म बनाने और उसमें काम करने का जोखिम उठाने के लिए शाहरुख खान की उससे भी ज़्यादा। लेकिन 'हटके' वाली कहानियों के लिए जिस तरह की 'हटके' वाली स्क्रिप्ट की दरकार होती है, वो इस फिल्म में नहीं है और इसके लिए कसूरवार आनंद व हिमांशु की जोड़ी को ही ठहराया जाना चाहिए। कमाल यह नहीं कि आनंद, हिमांशु और शाहरुख पहली बार साथ आए हैं, कमाल तो यह है कि ये तीनों साथ आ कर भी वो कमाल नहीं कर पाए हैं, जिसकी इनसे उम्मीद थी।
पहले ही सीन में जब मेरठ का बउआ सिंह अखबार की एक खबर सुनाने के एवज में अपने दोस्तों पर 500 रुपए के नोटों की पूरी गड्डी लुटा देता है तो पता चल जाता है कि आप एक 'फिल्म' देखने आए हैं। फिल्म-जिसका वास्तविकता से कोई नाता नहीं होता, वही वास्तविकता जो निर्देशक आनंद एल. राय और लेखक हिमांशु शर्मा की जोड़ी अपनी कई फिल्मों में देकर तारीफें और कामयाबी बटोर चुकी है। लेकिन इस बार इन्हें सुपरस्टार शाहरुख खान का साथ मिला है और अफसोस, कि इन जैसे लोग भी स्टार वाली चुंधियाहट से बच न सके। वैसे, फिल्म की कहानी 'फिल्मी' होते हुए भी बुरी नहीं है। बल्कि इस कहानी के 'हटके' होने की तारीफ होनी चाहिए और इस पर फिल्म बनाने और उसमें काम करने का जोखिम उठाने के लिए शाहरुख खान की उससे भी ज़्यादा। लेकिन 'हटके' वाली कहानियों के लिए जिस तरह की 'हटके' वाली स्क्रिप्ट की दरकार होती है, वो इस फिल्म में नहीं है और इसके लिए कसूरवार आनंद व हिमांशु की जोड़ी को ही ठहराया जाना चाहिए। कमाल यह नहीं कि आनंद, हिमांशु और शाहरुख पहली बार साथ आए हैं, कमाल तो यह है कि ये तीनों साथ आ कर भी वो कमाल नहीं कर पाए हैं, जिसकी इनसे उम्मीद थी।
