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Saturday, 6 July 2019

ओल्ड रिव्यू-सलमान का धोबी पछाड़-‘सुल्तान’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
सामने पर्दे पर सलमान खान हों तो आप फिल्म में क्या देखना चाहेंगे?
अगर आप सलमान खान के फैन हैं तो इस सवाल का सिर्फ एक ही जवाब हो सकता है-सलमान खान।
तो बस खुश हो जाइए, यह फिल्म आपके लिए ही है।

अब रही बात उनकी जो किसी फिल्म को उस फिल्म के लिए देखते हैं और आंख मूंद कर यूं ही किसी के फैन नहीं हो जाते। तो सुनिए, यह खेल पर आधारित फिल्म नहीं है। हां इसमें कुश्ती है, फिल्म के नायक और नायिका पहलवान हैं और कुश्ती करना, जीतना, मैडल लाना ही उनका सपना है। बावजूद इसके इस फिल्म को एक स्पोर्ट्स-फिल्म नहीं कह सकते। मुख्यतः यह एक लव-स्टोरी है जिसमें छिछोरा नायक पहलवान नायिका को प्रभावित करने के फेर में पहलवानी करने लगता है और फिर उसके हाथों बेइज्जत होकर इसी काम को सीरियसली ले लेता है। फिर कुछ ऐसा होता है कि वह पहलवानी छोड़ देता है। इसके बाद वह लौटता है तो किसी और को नहीं बल्कि अपने-आप को जीतने के लिए।

Saturday, 22 December 2018

रिव्यू-धुएं की लकीर छोड़ती 'ज़ीरो'

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पहले ही सीन में जब मेरठ का बउआ सिंह अखबार की  एक खबर सुनाने के एवज में अपने दोस्तों पर 500 रुपए के नोटों की पूरी गड्डी लुटा देता है तो पता चल जाता है कि आप एक 'फिल्म' देखने आए हैं। फिल्म-जिसका वास्तविकता से कोई नाता नहीं होता, वही वास्तविकता जो निर्देशक आनंद एल. राय और लेखक हिमांशु शर्मा की जोड़ी अपनी कई फिल्मों में देकर तारीफें और कामयाबी बटोर चुकी है। लेकिन इस बार इन्हें सुपरस्टार शाहरुख खान का साथ मिला है और अफसोस, कि इन जैसे लोग भी स्टार वाली चुंधियाहट से बच न सके। वैसे, फिल्म की कहानी 'फिल्मी' होते हुए भी बुरी नहीं है। बल्कि इस कहानी के 'हटके' होने की तारीफ होनी चाहिए और इस पर फिल्म बनाने और उसमें काम करने का जोखिम उठाने के लिए शाहरुख खान की उससे भी ज़्यादा। लेकिन 'हटके' वाली कहानियों के लिए जिस तरह की 'हटके' वाली स्क्रिप्ट की दरकार होती है, वो इस फिल्म में नहीं है और इसके लिए कसूरवार आनंद व हिमांशु की जोड़ी को ही ठहराया जाना चाहिए। कमाल यह नहीं कि आनंद, हिमांशु और शाहरुख पहली बार साथ आए हैं, कमाल तो यह है कि ये तीनों साथ आ कर भी वो कमाल नहीं कर पाए हैं, जिसकी इनसे उम्मीद थी।

Saturday, 29 September 2018

रिव्यू-‘सुई धागा’ में सब बढ़िया है

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
दिल्ली से सटा यू.पी. का कोई कस्बा। एक बिल्कुल ही आम परिवार। अभावों से जूझता। रहने को ढंग की जगह, सुविधाएं, जेब भर पैसा, कायदे का काम। फिर भी सब बढ़िया है। बीवी ममता के कहने पर मौजी भैया नौकरी छोड़ कर लग गए अपना ही कुछकरने। ढेरों अड़चनें आईं। कुछ अपनों ने साथ छोड़ा तो कुछ परायों ने हाथ बंटाया। लेकिन हिम्मत हारी दोनों ने और जुटे रहे। अंत में तो इन्हें जीतना ही हुआ।

अभावग्रस्त और बिल्कुल नीचे से उठ कर कुछ बड़ा हासिल करने की अंडरडॉगकिस्म की कहानियां दर्शकों को हमेशा से लुभाती रही हैं। लेकिन यह कहानी सिर्फ मौजी और ममता की ही नहीं है। उनकी हिम्मत, संघर्ष, मेहनत से कुछ बड़ा हासिल करने की ही नहीं है। बल्कि यह अपने भीतर और भी बहुत कुछ ऐसा समेटे हुए है जिसके बारे में मुख्यधारा का सिनेमा आमतौर पर बात नहीं करता है। या कहें कि बॉक्स-ऑफिस के समीकरण उसे ऐसा करने से रोकते हैं।

Saturday, 30 June 2018

रिव्यू-‘संजू’-अधूरी हकीकत बाकी फसाना

-दीपक दुआ... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
फिल्म के अंदर का संजय दत्त बड़े ज़ोर से यह चाहता है कि उसकी बायोग्राफी यानी आत्मकथा एक नामी राइटर लिखे ताकि उसमें कुछ सलीका हो और लोग उस पर ज़्यादा यकीन करें। थोड़ी ना-नुकर के बाद वह राइटर राज़ी होती है तो संजू उसे अपनी ज़िंदगी के कुछचैप्टर सुनाता है। जी हां, ‘कुछचैप्टर। सारे नहीं। बाकी के वह सुनाता नहीं और ही वह राइटर उनके बारे में पूछती है। ज़ाहिर है ऐसे में जो किताब बन कर सामने आएगी, वह सच्ची तो हो सकती है, संपूर्ण नहीं।

इस फिल्म के साथ भी यही हुआ है। यह तय है कि निर्देशक राजकुमार हिरानी संजू के पास यह ऑफर लेकर तो नहीं गए होंगे कि बाबा, चलो तुम्हारी जिंदगी पर एक फिल्म बनाते हैं। ऑफर संजू (और उनकी इमेज को लेकर उनसे भी ज़्यादा सतर्क रहने वाली उनकी पत्नी मान्यता) की तरफ से आया होगा कि राजू भाई, कुछ कीजिए न। पेशी, पनिशमेंट, पेरोल, प्रायश्चित, पश्चाताप, सब हो गया। बस, एक बायोपिक बन जाए जो लोगों के ज़ेहन में दस्तावेज की तरह दर्ज़ हो जाए तो मज़ा जाए।