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Friday, 16 July 2021

रिव्यू-प्याली में ‘तूफान’

 -दीपक दुआ...  (This review is featured in IMDb Critics Reviews)   
छिछोरे नायक को नायिका की बात दिल पर लगती है तो वह पहलवानी करने लगता है। दोनों शादी भी कर लेते हैं। फिर कुछ ऐसा होता है कि वह पहलवानी छोड़ देता है। कुछ अर्से बाद वह लौटता है तो किसी और को नहीं बल्कि अपने-आप को जीतने के लिए।
 
ओह, सॉरी! यह तो सलमान खान वालीसुल्तानकी कहानी सुना दी। अब फरहान अख्तर वालीतूफानकी कहानी सुनिए।
 

Wednesday, 13 March 2019

रिव्यू-भटकी हुई फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
मुंबई की एक झोंपड़पट्टी में रहने वाले हज़ारों लोगों की बस्ती में हल्केहोने के लिए कोई टॉयलेट नहीं है। औरतें रोज़ मुंह अंधेरे डब्बे उठा कर एक साथ जाती हैं। एक दिन सरगम अकेली जाती है और कोई उसका रेप कर देता है। सरगम का बेटा और कोई रास्ता देख दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री को अपनी चिट्ठी देता है। कुछ दिन बाद उसकी बस्ती में टॉयलेट बन जाता है।

भई वाह, कितनी सीधी, सरल, सुंदर, कहानी है। लेकिन इसी कहानी को आप पर्दे पर देखिए तो लगता है कि डायरेक्टर ने सीधे-सीधे बात कहने की बजाय जलेबियां क्यों बना दीं? ओह सॉरी, ‘शिटवाली फिल्म में मिठाइयों की बात नहीं।

Friday, 3 August 2018

रिव्यू-सपनों के पन्ने पलटता ‘फन्ने खां’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
फन्ने खां खुद तो बड़ा गायक बन नहीं पाया लेकिन अपनी बेटी लता को बड़ी गायिका बनाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार है। एक दिन उसकी टैक्सी में नामी सिंगर बेबी सिंह बैठती है और वो उसे किडनैप कर लेता है। फिरौती में वह चाहता है कि उसकी बेटी को गाने का मौका दिया जाए। लेकिन पासा पलट जाता है और...!

Friday, 7 October 2016

रिव्यू-‘मिर्ज़्या’ में न वादियां न नदियां, है तो सिर्फ कोहरा

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critic Reviews)
अरे गुलज़ार साहब यह आपने क्या कर दिया?

राकेश ओमप्रकाश मेहरा गुलज़ार को अपना गुरु मानते हैं। दोनों की कृतियों के करोड़ों चाहने वाले भी हैं। ऐसे में अगर गुरु-चेला मिल कर कोई फिल्म ला रहे हों तो उससे बड़ी-बड़ी आशाएं लगना स्वाभाविक है। पर अफसोस, यह जोड़ी इन आशाओं को कुचलती है और मुझ जैसे अपने ढेरों प्रशंसकों को बुरी तरह से निराश करती है।
माना कि मिर्ज़ा-साहिबां की कहानी सदियों से कही-सुनी जाती रही है लेकिन आप यह कैसे मान कर चल रहे हैं कि थिएटर में आने वाले हर दर्शक को यह कहानी पता होगी और वह आपके दिखाए को खुद--खुद समझता चला जाएगा? ओह हो, आपने यह फिल्म सिर्फ बुद्धिजीवी दर्शकों के लिए बनाई है...! चलिए, यही सही। लेकिन ये वाले दर्शक भी तो सवाल पूछेंगे कि अचानक इन दोनों में इतना प्यार कैसे हो गया कि इन्होंने दुनिया से बगावत करके साथ जीने-मरने का सिर्फ इरादा कर लिया बल्कि उस इरादे को पूरा करने के लिए सब छोड़-छाड़ कर निकल भी पड़े?

चलिए यह भी मान लेते हैं कि आपने वक्त के हिसाब से इस कहानी के किरदारों और घटनाओं को बदल डाला। लेकिन इसे बदलते समय आपने दर्शकों की समझ को हल्का समझने की ज़ुर्रत कैसे कर ली? साहिबां अब किसी और से सिर्फ प्यार कर बैठी है बल्कि उस प्यार के अहसास को समझती भी है। फिर अचानक उसे अपने बचपन के दोस्त की याद कैसे आने लगती है? अचानक उस दोस्त के मिलने पर उसके दिल में दोस्ती की बजाय प्यार कैसे उपजने लगता है? प्यार उपजा भी तो ऐसा कि उसकी अक्ल पर पर्दा पड़ गया और वह दीवानों की तरह आत्मघाती राह पर चल पड़ी? चलो, वह तो बेवकूफ निकली, क्या मिर्ज़ा को भी अक्ल नहीं थी कि वह क्या करने जा रहा है और उसका क्या हश्र होगा? पीछे एक और लड़की मिर्ज़ा के प्यार में मर गई, उसके बारे में किसी ने सोचा क्या? मुमकिन है इश्क करने वालों को कुछ और सूझता हो लेकिन उनके इश्क की महक अगर पर्दे से उतर कर देखने वालों के दिलों को छुए, उनमें दर्द जगाए, कसक उठाए, टीस मारे, उन्हें उत्तेजित, रोमांचित, उद्वेलित करे, तो क्या फायदा?

और मेहरा साहब, माना कि आप इस बार कुछ हट कर दिखाने जा रहे थे। दो युगों की अलग-अलग, मगर एक जैसी कहानियां दिखाते हुए आपने कैमरे और स्पेशल इफैक्ट्स की मदद से शानदार लोकेशंस पर आंखों को सुहाने वाले भव्य दृश्य गढ़े और गीत-संगीत का सहारा लेते हुए किसी म्यूज़िकल ओपेरा की फीलिंग लाने की कोशिश की। लेकिन हटते-हटते इतना भी क्या हटना कि कहानी मनोरंजन के दायरे से निकल कर बोरियत की सरहद पर जा पहुंचे और सूखी रेत में उसका कत्ल हो जाए? और गीत-संगीत भी कैसा, जिसमें पंजाबियत तो है मगर उसकी सौंधी महक नहीं। फिर लद्दाख और राजस्थान की लोकेशंस से इस संगीत का मेल होता भी तो नहीं दिखा।

किसी फिल्म से एक नामी स्टार-पुत्र और फिल्मी परिवार की ही किसी पुत्री का कैरियर लांच हो रहा हो तो उस फिल्म में दम हो हो, उनके किरदारों में दमखम होना लाजिमी है। लेकिन यह फिल्म इस मोर्चे पर भी नाकाम रही है। अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन कपूर और बीते जमाने की अभिनेत्री उषा किरण की पोती सैयामी खेर के किरदार अमूमन सपाट रहे हैं। इनमें उतार-चढ़ाव होते तो इनकी अभिनय-क्षमता के विभिन्न पक्ष निकल कर सामने पाते। इनसे बेहतर किरदार तो सैयामी से शादी करने जा रहे अनुज चौधरी को मिल गया जिन्होंने इसका भरपूर फायदा भी उठाया। अंजलि पाटिल भी छोटी-सी भूमिका में अपनी मौजूदगी दर्शा गईं। चरित्र-कलाकार साधारण रहे। दरअसल फिल्म का लेखन-पक्ष काफी कमज़ोर है जो इसे एक भव्य, मगर खोखली फिल्म बनाता है। इसे देख कर आज की पीढ़ी अगर यह पूछने लगे कि आखिर मिर्ज़ा-साहिबां की कहानी में है ही क्या? तो इसके कसूरवार गुलज़ार और मेहरा, दोनों होंगे। और हां, अपने फिल्मकारों के पास अगर नायक-नायिका के प्यार जताने के तरीके के तौर पर सिर्फ और सिर्फ लिप-किस्स ही रह गई है तो उन्हें अपनी कल्पनाशक्ति पर शक करना शुरू कर देना चाहिए।

गुलज़ार साहब, आपके लिखे हुए शब्दों में हमने प्यार करने, जताने, समझने, महसूसने के ढेरों ढंग और ढब देखे हैं। आप ही की माचिसकी वीरां जब मरती है तो मेरे आंसू नहीं रुकते। लेकिन अफसोस, इस बार आप चूक गए। फिल्म खत्म होने के बाद अगर एक भी संवाद, एक भी दृश्य मेरे अंदर पैठ कर संग-संग बाहर नहीं निकला तो बताइए, किसका कसूर है? जवाब दीजिए, गुलज़ार साहब...!
अपनी रेटिंग-दो स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज़ से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)