बरसों पहले ए.के. यानी अनुराग कश्यप ने ए.के. यानी अनिल कपूर को ले कर एक फिल्म एनाउंस की थी जिसका नाम था-ए.के यानी ‘आल्विन कालीचरण’। किन्हीं कारणों से वो फिल्म बन नहीं पाई। इस दौरान अनिल कपूर अनुराग जैसे डार्क फिल्में बनाने वालों से खुद को दूर रखते हुए मनोरंजक फिल्मों के स्टार बने रहे और अनुराग कश्यप अनिल जैसे लोगों को गरियाते हुए अपनी तरह के स्टार बन गए। यह फिल्म इन दोनों के मौजूदा स्टेट्स से शुरू होती है। अनुराग को अनिल से आज भी खुन्नस है। वह उनके साथ काम करना चाहते हैं लेकिन अनिल उन्हें वक्त नहीं दे रहे हैं। एक दिन अनुराग अनिल की बेटी सोनम को किडनैप कर लेते हैं और अनिल को मजबूर करते हैं कि वह कल सुबह से पहले अपनी बेटी को तलाशें और इस पूरी रात में एक कैमरा उन्हें लगातार शूट करता रहेगा। क्या होता है इस एक रात में? कितना सच (या झूठ) छुपा है इन दोनों की इस भिड़ंत में?
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Sunday, 10 January 2021
Friday, 7 February 2020
रिव्यू-रंगीनियों के अंधेरे में गुम ‘मलंग
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
आमतौर पर ‘मलंग’
अपनी धुन में मस्त रहने वाले लोगों को कहा जाता है। यह कहानी भी ऐसे ही कुछ लोगों की है जो अपने-आप में मस्त हैं। लेकिन एक जगह आकर इनकी राहें टकरा जाती हैं और तब शुरू होता है एक खूनी खेल। जेल से छूटा अद्वैत (आदित्य रॉय कपूर) 24 दिसंबर की रात को एक-एक करके कुछ पुलिस अफसरों को मार रहा है। क्यों...? ज़ाहिर है इसका कारण उसके अतीत में है। उसकी प्रेमिका सारा (दिशा पाटनी) बार-बार उसे याद आती है। क्यों...? पुलिस इंस्पैक्टर माइकल (माइकल)
और अगाशे (अनिल कपूर) उसे रोकने में लगे हैं। अचानक वह सैरेंडर कर देता है। क्यों...?
आमतौर पर ‘मलंग’
अपनी धुन में मस्त रहने वाले लोगों को कहा जाता है। यह कहानी भी ऐसे ही कुछ लोगों की है जो अपने-आप में मस्त हैं। लेकिन एक जगह आकर इनकी राहें टकरा जाती हैं और तब शुरू होता है एक खूनी खेल। जेल से छूटा अद्वैत (आदित्य रॉय कपूर) 24 दिसंबर की रात को एक-एक करके कुछ पुलिस अफसरों को मार रहा है। क्यों...? ज़ाहिर है इसका कारण उसके अतीत में है। उसकी प्रेमिका सारा (दिशा पाटनी) बार-बार उसे याद आती है। क्यों...? पुलिस इंस्पैक्टर माइकल (माइकल)
और अगाशे (अनिल कपूर) उसे रोकने में लगे हैं। अचानक वह सैरेंडर कर देता है। क्यों...?Friday, 20 September 2019
रिव्यू-एंटरटेनमैंट की पिच पर चला ट्रैक्टर-‘द ज़ोया फैक्टर’
-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
25 जून,
1983-इंडियन टीम ने क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता और ठीक उसी दिन सोलंकी परिवार में एक लड़की ज़ोया जन्मी। क्रिकेट के दीवाने पिता ने उसे लकी-चार्म मान लिया। बड़ी होकर काम के सिलसिले में यह लड़की इंडियन क्रिकेटर्स से मिली और हारती हुई टीम जीतने लगी। सबने मान लिया कि ज़ोया का लक-फैक्टर ही टीम को जिता रहा है। पर क्या सचमुच ऐसा है...?
25 जून,
1983-इंडियन टीम ने क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता और ठीक उसी दिन सोलंकी परिवार में एक लड़की ज़ोया जन्मी। क्रिकेट के दीवाने पिता ने उसे लकी-चार्म मान लिया। बड़ी होकर काम के सिलसिले में यह लड़की इंडियन क्रिकेटर्स से मिली और हारती हुई टीम जीतने लगी। सबने मान लिया कि ज़ोया का लक-फैक्टर ही टीम को जिता रहा है। पर क्या सचमुच ऐसा है...?
कहानी दिलचस्प है, हट कर है,
और शायद इसीलिए 2008 में आया अनुजा चौहान का लिखा अंग्रेज़ी उपन्यास ‘द ज़ोया फैक्टर’ (अंग्रेज़ीदां पाठकों ने) काफी पसंद किया था। बरसों तक विज्ञापनों की दुनिया में काम करने और क्रिकेटर्स के अजीबोगरीब अंधविश्वासों को करीब से देखने वाली अनुजा ने इस उपन्यास में यह सवाल उठाया था कि क्या महज़ किसी एक शख्स के लक-फैक्टर से टीम इंडिया की परफॉर्मेंस बदली जा सकती है?
साथ ही हर चमत्कार को नमस्कार करने की आम लोगों की प्रवृत्ति को भी उन्होंने कटघरे में खड़ा किया था। पर क्या यह ज़रूरी है कि किसी बेस्टसेलर उपन्यास पर बनी फिल्म भी उतनी ही उम्दा और बेस्ट हो...?
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