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Wednesday, 16 June 2021

रिव्यू-हिम्मत, लगन और जुनून की कहानी है ‘साइना’

 -गति उपाध्याय... (This review is featured in IMDb Critics Reviews)
किसी खिलाड़ी के नाम में अगर कई फर्स्ट जुड़े हों और वो खिलाड़ी महिला भी हो तो उस पर बायोपिक बनाना सिनेमा की ही नहीं, देश की भी ज़रूरत होती है। भारत में सबसे ज़्यादा आउटडोर खेला जाने वाला इनडोर गेम है बैडमिंटन। इससे भी ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि एक अरब होने के पहले तक देश में इस लोकप्रिय खेल में सिर्फ एक सितारा था-प्रकाश पादुकोण, बाद में पुलेला गोपीचंद, बस। अमोल गुप्ते की यह फिल्म इसलिए भी ज़रूरी थी कि हाथ में शटल उठा चुके तमाम युवा और बच्चे यह जान सकें कि-
 शहज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल बर्क,
 वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले
 

Sunday, 8 December 2019

रिव्यू-पति पत्नी और मसालेदार वो

रिव्यू-पति पत्नी और मसालेदार वो (Featured in IMDb Critics Reviews)
-दीपक दुआ...
1978 में आई बी.आर. चोपड़ा जैसे दिग्गज निर्देशक की फिल्म पति पत्नी और वोमें पति संजीव कुमार अपने ऑफिस की जवां सेक्रेटरी रंजीता से अपनी पत्नी विद्या सिन्हा की बीमारी का बहाना करके अफेयर चलाता है। उस फिल्म के इस रीमेक में कानपुर में सरकारी नौकरी कर रहा इंजीनियर कार्तिक आर्यन अपनी पत्नी भूमि पेढनेकर के किसी और के साथ अफेयर होने की बात कह कर अनन्या पांडेय की नजदीकियां हासिल करता है। एक कामयाब फिल्म का रीमेक बने और आज के दर्शकों की मसालेदार मनोरंजन पाने की चाहत को ध्यान में रख कर बने तो वह कामयाब होगी ही, क्लासिक भले ही न हो पाए। वैसे भी अब क्लासिक फिल्में किसे चाहिएं? जब दर्शक जंक-फूड से खुश हों तो फिल्म वाले भी क्यों ज़ोर लगाएं।

Saturday, 16 November 2019

रिव्यू-मसालों की बौछार में रपट कर ’मरजावां’

-दीपक दुआ...  (Featured in IMDb Critics Reviews)
चेतावनी : मसालेदार, चटपटी, बे-दिमाग फिल्में देखने, पसंद करने वाले ही आगे पढ़ें। बाकी लोग यहीं से पलट लें वरना रपट जाएंगे।

मुंबई अंडरवर्ल्ड का डॉन नारायण अन्ना। उसके बेटे जैसा हीरो रघु जो उसके एक इशारे पर जान ले-ले, दे-दे। इस बात से खफा उसका असली बेटा विष्णु रघु को दुश्मन मान बैठा है। रघु पर फिदा तवायफ आरज़ू। लेकिन रघु का दिल आया कश्मीर से आई ज़ोया पर। ज़ोया उसे सुधारना चाहती है। रघु-विष्णु की भिड़ंत में बेकसूर लोग मरने लगे तो रघु बागी हो उठा। लेकिन अन्ना के नमक ने उसे रोक लिया। आखिर एक दिन रघु ने बुरे लोगों को मार ही डाला।

Saturday, 18 May 2019

रिव्यू-रिश्तों का रंगीन पंचनामा-‘दे दे प्यार दे’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Review)
18 साल पहले अपने बीवी-बच्चों को छोड़ कर लंदन बसे 50 साल के बुड्ढेहीरो को एक 26 साल की लड़की मिलती है। शुरूआती लुका-छुपी के बाद ये दोनों शादी करने को राज़ी हो जाते हैं। हीरो उसे इंडिया में अपनी फैमिलीसे मिलवाने लाता है। दिक्कत यहां आकर शुरू होती है। हीरो की बेटी और बाप उसे दुत्कारते हैं। हीरो का बेटा अपनी होने वाली मांपर ही फिदा हो जाता है। हीरो की बीवी और हीरो की होने वाली बीवी के बीच एक अघोषित जंग छिड़ जाती है। हीरो बेचारा अब असमंजस में है कि पुराने रिश्ते निभाए या नए रिश्ते को थामे।

Friday, 3 August 2018

रिव्यू-सपनों के पन्ने पलटता ‘फन्ने खां’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
फन्ने खां खुद तो बड़ा गायक बन नहीं पाया लेकिन अपनी बेटी लता को बड़ी गायिका बनाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार है। एक दिन उसकी टैक्सी में नामी सिंगर बेबी सिंह बैठती है और वो उसे किडनैप कर लेता है। फिरौती में वह चाहता है कि उसकी बेटी को गाने का मौका दिया जाए। लेकिन पासा पलट जाता है और...!

Friday, 6 April 2018

रिव्यू-छल और कपट का खेल-‘ब्लैकमेल’

-दीपक दुआ... (Featured in IMDb Critics Reviews)
पति एक दिन जल्दी घर गया तो देखा कि पत्नी अपने प्रेमी के साथ बिस्तर में है। पैसे की तंगी झेल रहा पति प्रेमी को ब्लैकमेल करने लगा। मगर प्रेमी खुद अपनी पत्नी के पैसों पर पल रहा है। तो वह अपनी प्रेमिका यानी ब्लैकमेलर की पत्नी को ही ब्लैकमेल करने लगा। पत्नी पैसे कहां से लाती। उसने झूठ बोल कर पति से मांगे। पति तो पहले ही उसके प्रेमी से मांग रहा था।

कहानी दिलचस्प लगती है। है भी। इसके साथ जोड़े गए दूसरे प्लॉट भी दिलचस्प हैं। मसलन पति के ऑफिस की एक लड़की भी उसे ब्लैकमेल कर रही है। उसे ढूंढने निकला जासूस भी उसे ब्लैकमेल कर रहा है। उधर प्रेमी और उसकी अमीर पत्नी का अलग एंगल है और इधर पति के ऑफिस की भी अपनी कहानी है। कहानी उलझी हुई होने के बावजूद कन्फ्यूज नहीं करती है। फिल्म दिखाती है कि यहां कोई दूध का धुला नहीं है और जिसे मौका मिल रहा है वह दूसरे को ब्लैकमेल कर रहा है। लेकिन जिस तरह से डायरेक्टर ने दर्शकों को बहुत ज्यादा समझदार मानते हुए कई जगह कहानी के सिरे खुले छोड़ दिए कि वे इसे खुद समझ जाएंगे, वे दिक्कत पैदा करते हैं। पति और पत्नी के संबंध ठंडे क्यों हैं? क्यों पति ऑफिस के बाद भी वहां बैठ कर टाइम पास करता है? पति-पत्नी आपस में ठीक से बात तक नहीं करते लेकिन ऑफिस से निकलने से पहले वह रोज उसे मैसेज भेज कर बताता है कि मैं रहा हूं, क्यों? उसे किसी दूसरे मर्द के साथ देखने के बाद बैकग्राउंड में जो गाना बजता है उसके शब्द इन दोनों के संबंधों की उष्मा से मेल नहीं खाते। और अंत में अचानक से कहानी जैसे खत्म हो जाती है, दर्शक बेचारा ठगा-सा रह जाता है। निर्देशक अभिनय देव इसे दिल्ली बैलीवाले फ्लेवर से परे ले जाते तो यह एक धांसू फिल्म हो सकती थी।

दरअसल इस किस्म की कहानियां तेज रफ्तार के साथ पैनापन, चुटीलापन, कसावट और रोमांच मांगती हैं। इस फिल्म में ये सब कुछ है मगर अपर्याप्त है और सही जगह पर नहीं है। हां, दिलचस्प किरदारों और कलाकारों की एक्टिंग के मामले में ये कम नहीं है। इरफान, दिव्या दत्ता, अरुणोदय सिंह, प्रभा बनीं अनुजा साठे और जासूस चावला बने गजराज राव बेमिसाल रहे हैं। एक गाने में आईं उर्मिला मातोंडकर झुर्रियां ही दिखा गईं। हर फिल्म में किसी एक हिट पंजाबी गाने का बुखार टी सीरिज के सिर चढ़ गया लगता है।
अपनी रेटिंग-ढ़ाई स्टार
(दीपक दुआ फिल्म समीक्षक व पत्रकार हैं। 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय। मिजाज से घुमक्कड़। अपने ब्लॉग सिनेयात्रा डॉट कॉम (www.cineyatra.com) के अलावा विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज पोर्टल आदि के लिए नियमित लिखने वाले दीपक रेडियो व टी.वी. से भी जुड़े हुए हैं।)