Wednesday, 8 March 2017

स्वरा भास्कर-मेरे लिए सिनेमा सिर्फ एंटरटेनमैंट, एंटरटेनमैंट और एंटरटेनमैंट नहीं हैं


-दीपक दुआ...

स्वरा भास्कर से मैं बरसों से बात करता रहा हूं। मेरे लिए वह हमेशा एक फोन कॉल की दूरी पर रही हैं। बेहद काबिल, सौम्य और समझदार स्वरा और मैं अब तक कितनी बार बतियाए होंगे, यह गिन पाना मुश्किल है। हालांकि हम दोनों आमने-सामने सिर्फ दो बार मिले हैं और दोनों ही बार अविनाश दास के सिने बहस तलबमें। अब स्वरा उन्हीं अविनाश की फिल्म अनारकली ऑफ़ आरामें रही हैं। महीना भर पहले उनसे लंबी बातचीत हुई जिसके कुछ हिस्से हरिभूमिमें छपे और काफी सारे रेल बंधुमें। पूरी बातचीत यहां पढ़िए-

-‘अनारकली ऑफ़ आराक्या है?
-‘अनारकली ऑफ आराबिहार के आरा जिले की एक गायिका है जो आर्केस्ट्रा पार्टी में द्विअर्थी गाने गाती है। और जैसा कि इस तरह की गायिकाओं के साथ होता है, इसे भी बुरे चरित्र वाली समझा जाता है जबकि ऐसा है नहीं। हालात तब बिगड़ जाते हैं जब एक दिन अनारकली एक ताकतवर व्यक्ति के हाथों यौन प्रताड़ना का शिकार बनती है। लेकिन इसके बाद वह घुटने टेकने की बजाए उसके खिलाफ लड़ाई शुरू कर देती है।

-यह फिल्म कहना क्या चाहती है?
-यह फिल्म असल में यह मैसेज दे रही है कि समाज में हर व्यक्ति बराबर है और किसी के चरित्र को उसके काम से नहीं आंकना चाहिए। अगर कोई इंसान इस किस्म का काम करता है जो दूसरों की नजर में नीचा है या कमतर है या जिसे समाज अच्छी नजर से नहीं देखता है तो इससे लोगों को उसके चरित्र पर उंगली उठाने का हक नहीं मिला जाता।

-‘पिंकजैसी खुशबू है इस कहानी में?
-‘पिंकभी यही बात कर रही थी कि अगर कोई लड़की बोलती है तो उसका मतलब ही होता है। लेकिन उस फिल्म में जो लड़कियां हैं वे इस समाज की नार्मल लड़कियां हैं। अनारकली ऑफ़ आराइस मायने में ज्यादा साहसी फिल्म है कि एक ऐसी लड़की की कहानी है जो नार्मल नहीं है, जो ज्यादातर लोगों की नजरों में शरीफ नहीं मानी जाती है, जिसके काम को ज्यादातर लोग हेय दृष्टि से देखेंगे। यह एक मुश्किल किरदार है क्योंकि यह लड़की बेचारी नहीं है। यह डर्टी पिक्चरकी विद्या बालन के किरदार जैसा एक मुश्किल किरदार है क्योंकि यह एक चालूकिस्म की औरत का किरदार है जिसके साथ कोई हमदर्दी नहीं दिखाना चाहेगा।

-तो कितनी सफलता के साथ आप इस मुश्किल किरदार को निभा पाईं?
-हम कलाकारों के लिए यही सबसे खूबसूरत चुनौती होती है कि हमें करने के लिए कोई मुश्किल चीज मिले। इस लड़की का जो अंतर्द्वंद्व है, इसकी जो पीड़ा है, इसकी जो लड़ाई है उसे सामने लाने के लिए हमारी पूरी टीम ने बहुत मेहनत की और मुझे लगता है कि हम काफी सफल भी रहे हैं।

-अविनाश फिल्म इंडस्ट्री में बिल्कुल नए हैं। उन जैसे अनाड़ी निर्देशक के साथ फिल्म करने का जोखिम कैसे उठाया आपने?
-मैं थोड़ी पागल हूं न। मुझे ऐसी चीजें पसंद आती हैं जिन्हें करके मुझे रचनात्मक संतुष्टि मिले। मैं मानती हूं कि अविनाश जी के साथ काम करना जोखिम भरा था लेकिन उन्होंने इस फिल्म की इतनी प्रभावशाली स्क्रिप्ट लिखी थी कि मुझसे मना नहीं किया जा सका। अविनाश जी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि फिल्म की बेहतरी के लिए वह दूसरों से सुझाव और मदद लेने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। यह फिल्म करने के पीछे एक निजी वजह यह भी थी कि मेरी जड़ें भी बिहार से जुड़ी हुई हैं और हमारी फिल्मों में बिहार की जो कहानियां आती हैं उनमें अपराध, राजनीति, हिंसा आदि ही दिखाई जाती है जबकि इस फिल्म में एक सकारात्मक कहानी है कि एक लड़की ऐसे समाज में रह कर भी अन्याय के खिलाफ लड़ती है।

-यह फिल्म शुरू होने से पहले आपने जिक्र किया था कि अनारकली के किरदार में जो अश्लीलता और बोल्डनैस है उसे देखते हुए आप इसे करने से झिझक रही हैं। तो कैसा अनुभव रहा इसे करने का?
-यह किरदार इस मायने में बोल्ड था कि एक औरत जो अपनी रोजी-रोटी के लिए अश्लील किस्म के गाने गाती है और जिसे सभ्य समाज अच्छी नजर से नहीं देखता है। तो मुझे झिझक यह थी कि कहीं यह सी-ग्रेड बन कर रह जाए। लेकिन यहां मैं निर्माता संदीप कपूर की तारीफ करना चाहूंगी कि उन्होंने अविनाश जी को जो टीम चुनने दी उम्दा सह-निर्देशक, संगीतकार, सिनेमाॅटोग्राफर और संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी जैसे कलाकार थे तो इन सबने मिल कर इस फिल्म को कहीं से भी दोयम दर्जे की नहीं बनने दिया।

-कुछ ऐसी ही चीज राजकुमार संतोषी की लज्जामें भी तो थी?
-मुझे लगता है कि लज्जाकी दुनिया बहुत अलग थी। लज्जामें माधुरी दीक्षित जी रामलीला में काम करती थीं जबकि अनारकली की गिनती सभ्य समाज में नहीं की जाती है और इसीलिए मैं बार-बार इस किरदार को एक मुश्किल किरदार कह रही हूं।

-इस किरदार के लिए अपने स्तर पर आपने क्या तैयारी की?
-मैं दो-तीन बार आरा गई। मैं ऐसी महिलाओं से मिली जो वास्तव में ऐसे गाने गाती हैं। मेरे पास उनके गानों की, उनसे बातचीत की रिकाॅर्डिंग हैं। आप शायद यकीन करें कि अनारकली के सारे कास्ट्यूम की शाॅपिंग मैंने आरा से की। मैंने खुद को इस काम के लिए वही बजट दिया जो शायद अनारकली खुद को देती। दो-तीन सौ की साड़ी और 40-50 रुपए मीटर के कपड़े वाले सूट मैंने इस रोल के लिए बनवाए। लेकिन इन सबसे ऊपर सबसे बड़ी चीज होती है आपका अपने किरदार पर भरोसा। मुझे अनारकली पर, उसकी इस कहानी पर भरोसा था और इसी भरोसे ने ही मेरे काम को सहज बनाया। अविनाश जी के नए होने के कारण मुझे उन पर शक होना चाहिए था लेकिन उनकी लिखी स्क्रिप्ट ने मुझे इसका मौका ही नहीं दिया।

-24 मार्च को आपकी फिल्म के साथ अनुष्का शर्मा की फिल्लौरीकी टक्कर हो रही है। इस पर आप क्या कहेंगी?
-‘फिल्लौरीएक बहुत बड़ी फिल्म है और हमारी फिल्म उसके मुकाबले काफी छोटी है। इन दोनों में टक्कर का कोई सवाल ही नहीं है। मेरे मन में कोई कंपीटिशन नहीं है क्योंकि मेरा मानना है कि हर फिल्म की अपनी एक नियति होती है। मैंने फिल्लौरीका ट्रेलर देखा है जो मुझे बहुत ही अच्छा लगा। अनुष्का शर्मा और दिलजीत दोसांझ मुझे बहुत ज्यादा पसंद हैं। मैं खुद इस फिल्म को देखना चाहती हूं और मैं चाहूंगी कि अनुष्का भी मेरी फिल्म देखें क्योंकि हम लोग एक ऐसी कहानी लेकर रहे हैं जिसे लाना ही अपने-आप में एक दुस्साहस है।

-इस साल आप और किन फिल्मों में नजर आएंगी?
-गौरव सिन्हा की एक कॉमेडी फिल्म आपके कमरे में कोई रहता हैमें आऊंगी। यह एक कन्फ्यूजन से भरी कॉमेडी है जिसकी स्क्रिप्ट सुनते हुए मैं लगातार हंसती रही थी। इसमें मेरा किरदार एक शहरी कामकाजी लड़की का है जो बहुत सेंसिबल है लेकिन जब अपने पर पड़ती है तो उससे ऐसी-ऐसी बेवकूफियां होती हैं कि आप हंसते ही रह जाएंगे। इसके बाद मैं वीरे दी वेडिंगकी शूटिंग शुरू कर रही हूं जिसमें मेरे अलावा सोनम कपूर और करीना कपूर खान भी हैं। ये आज की सशक्त औरतों की कहानी है लेकिन इसमें कोई रोना-धोना नहीं मिलेगा।

-बड़े बजट की फिल्मों में आप हमेशा सपोर्टिंग रोल में रही हैं और मेन लीड के रोल आपको अलग किस्म के सिनेमा में मिले हैं। अपने कैरियर की इस तस्वीर को आप कैसे देखती हैं?
-यह बात सही है कि मेरी जो फिल्में ब्लॉकबस्टर हुईं उनमें मैं साइड रोल में थी लेकिन एक एक्टर को इन सब बातों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता और ही पड़ना चाहिए। मुझे कोई गम नहीं है क्योंकि मैं जानती हूं कि रांझणामें बिंदिया ही सबसे मजेदार कैरेक्टर थी या प्रेम रतन धन पायोमें चंद्रिका का किरदार काफी स्ट्रांग था। मैं खुश हूं ऐसे रोल करके। पर साथ ही मुझे यह भी लगता है कि अब मैं ऐसे मकाम पर पहुंच चुकी हूं जहां मुझे ऐसी फिल्में मिल रही हैं जिनकी कहानी मेरे इर्द-गिर्द है चाहे वह निल बटे सन्नाटाहो या अनारकली ऑफ़ आरा
 
-क्या आपको लगता है कि सिनेमा हमारे सामाजिक हालात बदलने में भी मददगार हो सकता है?
-सिनेमा हमेशा से मददगार रहता आया है। हर दौर में ऐसी फिल्में आती रही हैं, रही हैं और आएंगी जिन्होंने अपने मौजूदा हालात पर टिप्पणी की है, लोगों की सोच पर असर डाला है और उन्हें बदलने में सार्थक भूमिका निभाई है। मुझे लगता है कि सिनेमा में बहुत ताकत है। मैं इस बात में बिल्कुल यकीन नहीं करती कि सिर्फ फूहड़ दिखना और जिसे हम पॉपकॉर्न एंटरटेनमैंट कहते हैं, वही सिनेमा है। मेरे लिए सिनेमा के मायने एंटरटेनमैंट, एंटरटेनमैंट और एंटरटेनमैंट से काफी हट कर है।
 

Saturday, 4 March 2017

बॉक्स-ऑफिस-फरवरी-2017--जॉली ने जीता बॉक्स-ऑफिस का मुकदमा


-दीपक दुआ...

फरवरी के महीने में अक्षय कुमार की जॉली एलएलबी 2 ने दर्शकों के दिल जीते। हरिभूमि में महीने के पहले शुक्रवार को छपने वाले अपने कॉलम बॉक्स-ऑफिस में पढ़िए फरवरी में आईं फिल्मों का हाल।
एक साथ दो-दो बड़ी फिल्में जाएं तो उसके बाद वाले शुक्रवार को नई फिल्मों को थिएटर ही नहीं मिल पाते। फरवरी की शुरूआत में यही हुआ। 26 जनवरी पर रईसऔर काबिलने आकर थिएटरों में कब्जा जमाया हुआ था सो फरवरी के पहले शुक्रवार को अलिफऔर ना राजा ना रानीजैसी छोटे बजट की फिल्में ही सकीं। इनमें से जैगम इमाम की अलिफने मुस्लिम समुदाय में शिक्षा पर जोर देने की वकालत की लेकिन आम दर्शकों के टेस्ट की फिल्म होने के चलते यह सिर्फ चंद बुद्धिजीवी दर्शकों तक ही सिमट कर रह गई। इसी हफ्ते आई जैकी चान और सोनू सूद वाली डब फिल्म कुग फू योगा' में रोमांच और रफ्तार तो थे लेकिन बेदम कहानी के चलते दर्शकों ने इसे भी किनारे कर दिया। चीन में सुपरहिट होने और एक सप्ताह में तकरीबन 943 करोड़ रुपए इक्ट्ठे करने वाली इस फिल्म को भारत में अंग्रेजी और हिन्दी संस्करणों से इतनी कलैक्शन भी नहीं हुई कि कहीं इसका जिक्र होता।

फरवरी का दूसरा हफ्ता अक्षय कुमार की शानदार फिल्म जॉली एलएलबी 2’ लेकर आया। निर्देशक सुभाष कपूर ने इस फिल्म के बड़े बजट और भव्य कैनवास का फायदा उठाते हुए इस बार सिस्टम पर करारी चोट की और तीखेपन के साथ अपनी बात रखी। दर्शकों ने भी इस फिल्म का भरपूर सम्मान करते हुए इसे सिर-माथे पर जगह दी। वीकएंड में करीब 48 करोड़ और पहले सप्ताह में लगभग 78 करोड़ रुपए जमा करने के बाद भी यह फिल्म रुकी नहीं और बहुत जल्द सौ करोड़ी क्लब में शामिल होकर सुपरहिट का खिताब ले उड़ी। इसी सप्ताह आई गुरमीत राम रहीम सिंह की फिल्म हिन्द का नापाक को जवाब-एमएसजी लायन हार्ट-2’ को सिर्फ उत्तर भारत में बाबा के अनुयाइयों द्वारा ही देखा गया। हॉरर नाइटका कहीं नाम भी नहीं सुना गया।

तीसरे शुक्रवार को निर्देशक संकल्प रेड्डी ने नेवी ऑपरेशन पर बनी भारत की पहली फिल्म गाजी अटैकदी। अपनी इस पहली ही फिल्म में संकल्प ने 1971 में पाकिस्तानी पनडुब्बी गाजी के नष्ट होने की घटना को एक काल्पनिक कहानी का हिस्सा बना कर सचमुच एक सराहनीय फिल्म दी। बिना रोमांस और गानों की इस फिल्म को अच्छा सिनेमा देखने वालों ने सराहा लेकिन टिकट-खिड़की पर पैसे लुटाने वाले आम दर्शक वर्ग ने इससे दूरी बनाए रखी जिस वजह से यह फिल्म एक सप्ताह में करीब 12 करोड़ रुपए ही बटोर पाई। रनिंग शादीका आइडिया जितना दिलचस्प था, इसकी स्क्रिप्ट उतनी ही कच्ची निकली और यही कारण है कि शानदार कॉमेडी बन सकने वाली यह फिल्म अधपकी रह गई और दर्शकों भी इससे दूर ही रहे। एक हफ्ते में मात्र 60 लाख की इसकी कलैक्शन ने इस पर सुपर फ्लॉप का धब्बा लगाया। अरशद वारसी-नसीरुद्दीन शाह वाली इरादामें ईको-टेरररिज्म की बात की गई। इस अलग किस्म की थ्रिलर फिल्म को बनाने वालों का इरादा तो नेक था लेकिन कच्चेपन और डिटेलिंग की कमी के चलते यह ज्यादा ऊपर नहीं उठ पाई और बॉक्स-ऑफिस पर भी हल्की ही रही। एक हफ्ते में सिर्फ 58 लाख ही यह जमा कर पाई।

आखिरी हफ्ते में विशाल भारद्वाज ने रंगूनमें दूसरे विश्व-युद्ध के बैकड्रॉप में जो खिचड़ीनुमा कहानी परोसी उसकी काफी आलोचना हुई। सैफ, कंगना और शाहिद के उम्दा अभिनय के चलते इसे शुरूआती रिस्पांस तो अच्छा मिला और विशाल के प्रशंसकों ने भी इसकी तरफ रुख किया लेकिन देखने के बाद निराश होकर लौटे दर्शकों ने दूसरों को इससे दूर रहने की ही सलाह दी। पहले दिन की इसकी कलैक्शन करीब 6 करोड़ रही। तीन दिन में करीब 18 करोड़ की कलैक्शन के बाद सोमवार को यह सिर्फ सवा करोड़ की बटोर पाई और फिर ठंडी पड़ती चली गई। इसके साथ आई नाना पाटेकर वाली वेडिंग एनिवर्सरीका खुल का प्रचार ही नहीं हो पाया। मोना डार्लिंगऔर 9 ओ क्लॉक के तो नाम भी सुनने में नहीं आए।